भारत भाग्य विधाता

EDITOR: Blithering Idiotess

हमारे देश में जयंतियों और पुण्यतिथियों की बाढ़ सी आ गयी है। हो भी क्यों न, जनसंख्या इतनी ज़्यादा है कि हर 100 में से एक आदमी किसी ने किसी विधा का प्रेरणास्त्रोत हो सकता है। लेकिन हमारे देश में कुछ ऐसे लोग भी हुए हैं, जो सही मायने में जयंती और पुण्यतिथि वाले रुतबे के लायक हैं।

आज बात उनकी, जो अपने समय से बहुत आगे थे। आज बात उनकी, जिन्होंने कुछ ऐसा लिखा जिसे सुनकर, आप का बाप भी चाहे तो आपको खड़े होने से नहीं रोक सकता। जी हाँ, बात उनकी, जिन्हें गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर, या रवीन्द्रनाथ टैगोर कहा जाता है।

सफ़ेद दाढ़ी, लम्बे बाल, हाथ में किताब लिए हुए – हमारे मन में यही तस्वीर बनती है टैगोर की। जब भी उन्हें देखा है तो ऐसे ही वेश में देखा है। मानो, पैदा ही दाढ़ी के साथ हुए हों। पर वो कहते हैं न, लम्बी दाढ़ी तजुर्बे और बुद्धि का प्रतीक है। टैगोर की रचनाएं, उनकी बुद्धिमत्ता एवं तजुर्बे का ही नतीजा है। इंटरनेट पर जब पढ़ा तो मालूम चला कि उन्होंने 8 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी। 16 साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हो गयी। कोई शक नहीं था कि यही रबीन्द्रनाथ ठाकुर बाद में एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता बने।

मुझे बंगाली नहीं आती, इसीलिए इनकी ज़्यादातर रचनाएं पढ़ नहीं पाया। लेकिन जितने दोस्त बांग्ला बोलते और पढ़ते हैं, उनसे टैगोर के बारे में बात करके पता चलता है कि उन्होंने बांग्ला साहित्य को कितना कुछ दिया है। हर कवि की किसी एक विषय पर मज़बूत पकड़ होती है और उसकी ज़्यादातर रचनाएं एक ही तरह की होती हैं। जब मैंने टैगोर के बारे में लोगों से सवाल किया तो पता चला कि टैगोर का कोई एक मज़बूत विषय नहीं था। टैगोर ने सभी तरह की मानवीय भावनाओं को छुआ है, जिसमें आध्यात्मिक, प्रेम, रुदन, आनंद, राष्ट्रप्रेम आदि सम्मिलित है। यहीं नहीं, उनकी कई रचनाएं प्रकृति से प्रेरित हैं, जैसे “आकाश भोरा सुरजो तारा”, “आनंदो लोके मोंगल लोके ” आदि।

बंगाली नामों को हिंदी में लिखते हुए कहीं भूल हो जाए तो माफ़ कीजियेगा, क्योंकि मैंने इनके अंग्रेजी संस्करण पढ़े हैं। कहीं भी हिंदी में अनुवाद मिला ही नहीं।

खैर, अब बात करता हूँ उस सब की जिसे मैंने पढ़ा है।

‘क़ाबुलीवाला’ याद है? मैंने ये कहानी शायद दसवीं में पढ़ी थी। आज भी मेरे अंदर कोई अद्भुत साहित्यिक प्रतिभा नहीं है, तो दसवीं में तो मैं साहित्य के मामले में ढोर था। ऐसे में भी, मुझे ‘क़ाबुलीवाला’ के पठान का किरदार इतना ज़्यादा छुआ कि उस चक्कर में 1961 में  इसी नाम से बनी फ़िल्म देख डाली। ज्ञात हो कि ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ इसी फ़िल्म का गाना है।

बलराज साहनी काबुलीवाले का क़िरदार निभाते हुए ये गीत अपने देश के लिए(क़ाबुल/अफ़ग़ानिस्तान के लिए) गा रहे होते हैं। लेकिन आज हम ये गीत हमारे देश के लिए गाते हैं। जब तक पता नहीं था, मुझे लगता था कि ये गीत भी किसी ने भारत के लिए ही गाया होगा।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि लोग किसी के लिए लिखे गीत को किसी और के लिए समर्पित समझ लेते हैं। मेरे कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ने हमें बताया था कि ‘जन गण मन’ असलियत में भारत के लिए नहीं लिखा गया था। रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे 1911 में जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर लिखा था। उन्होंने ये भी बताया कि इस गीत में ‘अधिनायाक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ जैसे शब्द जॉर्ज पंचम लिए इस्तेमाल हुए हैं।

वो प्रोफ़ेसर विदेश से पढ़ के आये थे। अंग्रेजी भी एक दम अंग्रेज़ों की तरह ही बोलते थे। उस वक़्त हमारे पास उनकी बात मानने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। अभी कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भी यही मुद्दा उठाया।

पर थोड़ा बहुत इधर उधर हाथ पैर मारा तो समझ आया कि मेरे प्रोफेसर और कल्याण सिंह दोनों ही बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देने वाले सनकी हैं।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने जन गण मन 1908 में लिखना शुरू कर दिया था। शांति निकेतन में अब भी वह जगह सुरक्षित है जहां बैठ कर टैगोर ने इसके कुछ अंश लिखने शुरू किये। जिन्हें गणित नहीं आती उनके लिए बता दूँ, 1911 और 1908 के बीच 3 साल का अंतर है। जॉर्ज पंचम का दूर दूर तक कोई नामोंनिशान नहीं था जब टैगोर ने ये गीत लिखना शुरू किया।

1911 में कांग्रेस राजनीति में अपना स्थान बनाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने तय किया कि जॉर्ज पंचम से मैत्रीय संबंध बनाये जाएंगे। इसके लिए एक समारोह का आयोजन किया गया जिसकी शुरुआत टैगोर ने राष्ट्रगान से की। उसके बाद जॉर्ज पंचम से मैत्रीय सम्बन्ध बनाने की ओर कदम बढ़ाते हुए एक लेख पढ़ा गया और उसके ठीक बाद रामभुज चौधरी ने ‘बादशाह हमारा’ गीत प्रस्तुत किया जो कि जॉर्ज पंचम के लिए लिखा गया था।

यही नहीं, टैगोर ने खुद इस मुद्दे पर सफाई देते हुए कहा था,”एक ब्रिटिश अफसर मेरा दोस्त था, जिसने मुझे ब्रिटिश सम्राट का गुण-गान करते हुए एक कविता लिखने के लिए कहा। इस बात से रुष्ट हो मैंने ‘जन गण मन’ में ‘भारत भाग्य विधाता’ के बारे में लिखा कि ये देश आदि काल से अपना भाग्य खुद लिख रहा है। वो ‘भारत भाग्य विधाता’ जॉर्ज पंचम तो कतई नहीं हो सकते।” यही नहीं, 1939 में उन्होंने ये तक कह दिया,”जॉर्ज चौथा हो या पांचवा , मैं उसके बारे में क्यों लिखूंगा। इस बात का जवाब देना मेरा अपमान है।”

अगर आप इस गीत को पूरा पढ़ें, तो आखिरी अंतरे में टैगोर ने लिखा है,”निद्रितो भारतो जागो” मतलब सोता हुआ भारत जाग गया है। मैं समझता हूँ कि अगर टैगोर ने जॉर्ज पंचम के सामने ये पंक्ति सुनाई होगी तो साफ़ है कि वो उनकी प्रशंसा नहीं कर रहे थे। वो तो जॉर्ज पंचम की कह के ले रहे थे। टैगोर एक बहादुर कवि थे। जिन्होंने जॉर्ज पंचम के सामने खड़े होकर भारत के स्वाभिमान की बात की।

मुझे समझ नहीं आता कि लोग बिना समझे इतनी बड़ी बात कैसे बोल सकते हैं। जन-गण-मन हमारा राष्ट्रगान है। जिन्होंने इसे देश के राष्ट्रगान के रूप में चुना, वो मेरे कॉलेज के प्रोफेसर और कल्याण सिंह से बहुत बड़े थे। शायद उनके इन आरोपों के पीछे की असली वजह उनके और टैगोर के राष्ट्र के विचार को लेकर मतभेद है।

1908 में टैगोर ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था,”देशप्रेम हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं हो सकता। मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में गिलास नहीं खरीदूंगा और जब तक ज़िंदा हूँ तब तक मानवता के ऊपर देशप्रेम की जीत नहीं होने दूंगा।” उन्होंने ये भी कहा कि “जब मुल्क से प्यार का मतलब भक्ति या पवित्र कार्य में बदल जाए तो विनाश निश्चित है। मैं देश को बचाने के लिए तैयार हूँ लेकिन मैं किसकी पूजा करूँगा ये मेरा अधिकार है जो देश से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

ये बातें टैगोर ने तब कही, जब भारत खुद एक राष्ट्र बनने की राह पर था। लेकिन टैगोर को इस बात की सोच भी थी कि आज़ादी के बाद किन दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा – “आज़ाद देशों में ज़्यादातर लोग आज़ाद नहीं है। वे कुछ लोगों द्वारा तय किये गए लक्ष्यों की तरफ बढ़ते रहते हैं। वे अपनी भावनाओं की लहर को एक भंवर में बदल देते हैं। उसी भंवर की गतिशीलता में एक शराबी की तरह झूमते हैं और इसे ही आज़ादी मान लेते हैं। लेकिन दुर्भाग्य उनका मौत के रूप में प्रतीक्षा कर रहा है। मानव का सच नैतिक सत्य ही होता है। उसकी मुक्ति आध्यात्मिक जीवन में होती है।”

जब मैं छोटा था तो सीमा पर दुश्मन से लड़ना ही जीवन का सबसे बड़ा सच लगता था। आज जब टैगोर की बातें समझ आने लगी हैं तो पता चलता है कि जितना ज़रूरी देश को दुश्मन से बचाना है, उतना ही ज़रूरी देश को भीतरी कुरीतियों से बचाना भी है। जो लोग टैगोर की रचनाओं के इर्द गिर्द षड्यंत्रों का ढांचा बुनते हैं, जो लोग उनकी लिखी रचनाओं में बसे देशप्रेम पर सवाल उठाते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि टैगोर ने जलियाँवाला बाग़ के हत्याकांड के पश्चात उसी जॉर्ज पंचम के द्वारा दी गयी ‘नाइट’ की उपाधि को वापस कर दिया गया।

कई बार सुना है कि ज़िन्दगी में कुछ ऐसा करो कि आप हमेशा के लिए अमर हो जाओ। जब भी ‘जय हे, जय हे, जय हे’ गाता हूँ, मन ही मन टैगोर को धन्यवाद करता हूँ।

“भले ही संयुक्त राष्ट्र घोषित करे या न करे, हमारा राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ विश्व का सबसे अच्छा राष्ट्रगान है और रहेगा।”

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