चोमूनामा 3

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सामाजिक तौर तरीके, रूढ़ियाँ, अंधविश्वास; यकायक नहीं उभरते। इनका भी समय के साथ विकास होता है, स्वरूप में बदलाव आता है। आज के ‘चोमूओं’ और ‘कूल डूड्स’ की लड़ाई कोई नयी नहीं है। दोनों पक्षों के लोग वही हैं, वहीं हैं, बस उनका बाहरी आवरण बदल गया है।

पुराने ज़माने में गाँव के लड़के शहर ‘घूमने’ आते थे। उनके हम-उम्र शहर के लड़कों से जो उनका संबंध था, आज चोमूओं का कूल डूड्स के साथ भी कुछ वैसा ही नाता है। शहरी तौर तरीकों से अंजान होने के बहाने उनका मज़ाक बनाना बस एक छलावा होता था। शहर के कूल डूड्स खुद के दंभ को गाँव के चोमूओं की काबीलियत, शारीरिक बल और मौलिक विचारों तले दबने से बचाने के लिये ऐसा करते थे।

आज भी बिल्कुल वही हालात हैं। खुद के ओछेपन, वैचारिक हीनता और कमजोरी को छिपाने के लिये ‘कूल डूड्स’ चोमूओं पर दिखावट की तलवार से प्रहार करते हैं, जिसका जवाब आज भी चोमूओं के पास नहीं है। आप कितना भी नकार लें, लेकिन सच यही है कि वर्तमान ‘कूल डूड्स’ ही हमारे समाज के पतन के कारक हैं।

अब हम ये सब जानकर चुप तो बैठने से रहे। इसलिये हमारे यहाँ आजकल एक नयी प्रथा शुरू हुई है। कहीँ पर भी जब किसी महानुभाव की इज़्जत उतारनी हो, तो उन्हें ‘कूल डूड’ बोला जाने लगा है। कहीँ ना कहीँ इसका श्रेय (सच कहें तो पूरा श्रेय) हमको जाता है। शुरूआत में ‘चोमू’ को खुद की परिभाषा बनाने से शुरू हुआ मेरा यह व्यंग्य, शायद ‘शायद’ कुछ गम्भीर हुआ है।

“शायद…”

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