गालियाँ और “कूलनेस”

EDITOR: Aditya Prakash Singh

माँ और बहन एक ज़माने में हमारी मर्यादा का प्रतीक थी। महाभारत में कुंती हो, या फ़िर श्री कृष्ण का चीरहरण रोक कर बहन की लाज रखना। ये सब कहानियाँ कहीं ना कहीं भारतीय विचारधारा की नींव से जुड़ी हैं, जहाँ माताओं और बहनों को एक समय पूजनीय माना जाता था।

फिर आये डबल कोटेड “कर्मकाण्ड”(डबल कोटेड पर गौर कीजिये)। किसी एक जाति विशेष के लोगों ने अपनी सुदृढ सामाजिक हैसियत को आर्थिक और राजनैतिक रूप से बढाने के लिये धर्म के नाम पर लोगों को इस्तमाल करना शुरू किया। इससे जन्म हुआ हमारे वर्तमान पितृसत्तात्मक समाज का, जहाँ माँ और बहन को बस एक बोझ माना जाने लगा।

प्रगति हुई, समय बदला, और ‘महिला सशक्तिकरण’ का प्रभाव दिखना शुरू हुआ। पर आज के समय में सशक्त होती महिलाओं के साथ ही सामाजिक परिस्थितियों में भी एक नयी चीज़ जुड़ गयी है। एक शब्द- ‘गालियाँ’, जिनका इस्तेमाल हमारे ‘युवा’ कौड़ियों के भाव कर रहे हैं। कमाल की बात है कि आधुनिक ‘नारी’ भी इनके इस्तेमाल से अछूत नहीं है।

आप पितृसत्ता का विरोध करती हैं, लेकिन ऐसी गालियाँ देने से नहीं झिझकती जिनमें माँ बहन की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। क्यों? कइयों का कहना होता है कि वे अपने ‘दोस्तों’ के साथ ‘मज़ाक में’ या ‘यूँ ही’ गालियाँ देते हैं। कोई और मज़ाक नहीं मिला? इसके अलावा अगर संस्कार और तहजीब की बात करें, तो ‘कूल डूड्स’ और ‘आधुनिक नारी’ का कुछ एक ही जैसा हश्र होता है। आप जो दिखाते हैं, समाज वही देखता है। अगर आप दारू पीकर लड़कियों को छेड़ते हैं, तो ये ‘कूल’ होना नहीं होता। कुछ ऐसे ही पूरे समाज को किसी चीज़ के लिये दोष देने से पहले खुद को भी देख लेना चाहिये। अगर नहीं, तो ये ‘आधुनिक नारी’ कूल डूड्स के समकक्ष ‘हॉट चिक्स’ ही कहलाएँगी।

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