मैं कूल हूँ


THE EDITING STARTUP

“अबे हट! मैं क्यों टाइम वेस्ट करूँ हिन्दी-विन्दी जान कर? इन्ग्लिश का टाइम है ब्रो, हिन्दी यूज़लैस है। इस पर टाइम वेस्ट ना कर। कूल बन, ‘कूल’।” ऐसा कहना था मेरे रूमी भाई साहब का। पर हम भी तो कम बड़े जिद्दी है नहीं, अड़े रहे। “भाई मान लिये इंग्लिश ज़रूरी है, पर मातृभाषा जानना भी तो जानना ज़रूरी है। तुम्हारी कौन सी है?” मेरे ऐसा कहने पर श्रीमान के सर पर बल पड़ गये, भौंएँ संकुचित हो गयीं उनकी। हम भी अपना सर पीट लिये कि किससे पाला पड़ा है।

“भाई मातृभाषा मतलब मदरटंग, ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’, समझे?” ये सुनकर श्रीमान का चेहरा सामान्य हुआ। “अरे तो सीधे सीधे ऐसे नहीं बोल सकता? हिन्दी है मेरी फ़र्स्ट लैंग्वेज।” अब हमको मौका मिला अपना प्वाइंट मारने का। “कहने का मतलब तुमको अपनी ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’ भी लिखनी नहीं आती?” हम पूछे श्रीमान से। सवाल सुनकर वो हमको ऐसा लुक दिये जैसे हम पूछ दिये हों कि पानी गीला क्यों होता है।

“औब्वियसली ब्रो, अब कंपनी वाले मेरे को मदरटंग में थोड़ी ना जॉब देंगे। सब इंग्लिश में होता है अब। क्यों टाइम एण्ड एफ़ोर्ट वेस्ट करूँ हिन्दी पढने में? इट्स यूज़लेस।” ऐसा बोलकर हम पर ‘हे हे हे हे’ कर के हँसने लगे। “तू चोमू है ना, हिन्दी पढ़। कुरते पायजामे में हिन्दी बोलकर जॉब लेना।” एक और ठहाका लगाया साहब ने और किट उठा कर क्रिकेट खेलने निकल गये।

ये सिर्फ मेरे रूममेट की कहानी नहीं है, आजकल मुश्किल से ही कोई ऐसा मिलता है जो किसी भी तरह से मातृभाषा ‘अच्छी’ लिख सकता हो। “भारतीय युवा” (डबल कोट्स पर ध्यान दें) हिन्दी को ‘पिछड़ा’ होने की निशानी मानता है। लेखक अजीत भारती की भाषा में ‘अंग्रेज़ों की टट्टी चाटने’ में हम खुद को बड़ा “कूल” समझते हैं।

ये कहीं से भी गलत नहीं है कि अंग्रेज़ी ज़रूरी है आज के ज़माने मेें। लेकिन इस चक्कर में हम खुद की मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। ये तो वैसी बात हुई, जबतक बच्चे हैं, माँ बाप की उंगली पकड़ कर चले। और जब ज़रूरत नही रही, माँ बाप ‘यूज़लैस’ हो गये और घर में प्रेमिका को घुसा के माँ बाप को ‘पिछड़ा’ और ‘अनकूल’ बोल कर बाहर फेंक दिया।

माने या ना मानें, हमारे युवा; खासकर महानगरों के युवा ऐसे ही होते जा रहे हैं। “मैं कूल हूँ” का टैग लगा कर हमारे इतिहास को यूज़लैस बताते हुए आगे निकल जाना ही अब कूल है।

ऐसा है, तो हम तो सीना ठोक कर खुद को चोमू बोलते हैं।

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