चोमूनामा 2


आज कूल डूड़स के बारे में बात नहीं करनी। आज बात करते हैं उनके ‘पोलर अपोज़िट्स’-चोमूओं की। यूँ तो चोमू कभी भी, ध्यान रखें; कभी भी खुद को कूल डूड्स से कम नही मानते, पर कुछ ऐसी चीज़ें हैं जहाँ चोमू भी चुप रह जाते हैं। उनमे से एक है ‘प्रेमिका’।

सौ चिट्ठियाँ: पार्ट 1


“क्या बकवास है! ऐसी चिट्ठियाँ हमें हर रोज़ मिलती हैं। इसलिए ही तो हमने तुम्हारी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया था।” अतुल ने कहा।
“जी। इस घटना के बाद मैंने सिर्फ एक ही चिट्ठी भेजी थी। बाकि की 99 चिट्ठियां, इसके मिलने के बाद भेजी।”

रोंदू


मुझे इस बारे में कोई तकनीकी जानकारी नहीं है, पर मेरे अनुसार रोना दो तरह का होता है – एक वो रोना, जिसमें अत्यधिक ख़ुशी, अत्यधिक ग़म, या किसी भी तरह के भावनात्मक चरमोत्कर्ष पर आँखों से आंसू निकल आते हैं।

कलियुग की दोस्ती- गालियों की रासलीला


लेकिन ये लौंडे और मोहतरमाएँ यहाँ ‘हॉल्ट’ हो जाएँ तब तो! पर इतने में हमारे ‘कूल डूड्स’ और ‘हॉट चिक्स’ खुश हो जाएँ ये संभव कहाँ। इन लोगों को तबतक खुशी नहीं मिलती जबतक ये हरेक लाइन में कम से कम एक बार किसी की माँ-बहन एक न कर दें।

डरपोक


इंसान को जब तक अपनी कमियों का न पता चले, तब तक वो कमज़ोर रहता है। लेकिन जब इंसान को अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी का पता लग जाए, तब भी वह तबाह हो जाता है। इस डर में, कि कहीं उसका डर सच न हो जाए। मेरा सबसे बड़ा डर यही है कि मेरा सबसे बड़ा डर कहीं सच न हो जाए।

मोड़-ऐ-मुलाकात


मगर सोचो, इसी भागती दौड़ती जिंदगी में अगर कभी हम और तुम टकरा गये फिर से तो? जी हाँ, ठीक वैसे ही, जैसे सेकंड की सुई टकराती है मिनट की सुई से पल भर के लिए। सेकंड की सुई तो मिनिट की सुई से 60 जगह मिलती है, हम और तुम कहाँ कहाँ मिल सकते हैं… सोचो तो जरा!

इस दुनिया में शोर बहुत है।


पक्ष और विपक्ष को बांटने के लिए अब कोई लकीर खींचने की ज़रूरत नहीं है। आपकी ख़ामोशी कोही आपका विरोध समझ लिया जाता है। हमारा देश 1947 में जितना बँटा था, उससे ज़्यादा आज बँटा है। 47 में अशिक्षा थी, सामाजिक कुरीतियां थी,तकनीकी तौर पर पिछड़ापन था।