6 प्वाइंटर – 9 प्वाइंटर


THE EDITING STARTUP

रिज़ल्ट आ गया इस सेमेस्टर का। जहाँ देखो वहाँ हड़कम्प मचा है। कोई पास हो जाने पर खुशियाँ मना रहा है तो कोई टॉप ना होने पर गम के आँसू बहा रहा है। पर एक बात तो पक्की है, ‘रिज़ल्ट’ ज़रूर आ गया है।

अब हमारे एक साथी हैं, जिन्होंने अपना पूरा समय बड़ी शिद्दत के साथ शरलॉक और ब्रेकिंग बैड को दिया। उनका 6.3 आया है। एक सिंगल पोज़िशन में बैठ कर सबको गरिया रहें हैं, कन्टिन्युअसली। ‘सालों को कोई काम नहीं मिलता? जब देखो तब किताबों में घुसे रहते हैं। मेरा रिजल्ट तो इन्ही ने खराब कराया है।’ मतलब कि सही है। खुद घुसे रहो ‘लैपी’ के पिछवाड़े में, और मौके पर पूरी गल्ती दूसरों के मत्थे मढ दो। सही है।

एक और साथी है हमारे। पूरे सेमेस्टर में तीन दिन क्लास गये हैं। बाकी टाइम दिन भर सोना और रात भर हॉस्टल वाई-फाई का बर्बरता से शोषण करना, यही इनकी दिनचर्या, ‘रूटीन’ रही है पूरे सेमेस्टर। ‘भाई ये फ़ुद्दू सी चीज़ें मण्णे ना पढनी। मैं तो एयरोस्पेस पढने आया हूँ।’ पूछने पर यही जवाब रहता है उनका। रिज़ल्ट का रत्ती भर असर नहीं पड़ा जवाब पर। अब अरबपति बाप की औलाद हो, तो ना पढो वो भी चलता है।

क्लास टॉपर को ही ले लीजिये हमारे। रिज़ल्ट के बाद सर पकड़ कर सीढियों पर बैठा था। पूछने पर चेहरा ‘माइनस’ में मूव कर गया बंदे का। ‘भाई, बस 8 सब्जेक्ट्स में ‘O’ आया है। 4 बाकी रह गये। अब तो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा मैं।’ ये लीजिये। लड़के को 9.66 GPA आया है, पर फिर भी संड़ रहा है। मतलब हद्द होती है भाई! 

खैर, दीज़ वेयर सम टिपिकल एग्ज़ाम्पल्स ऑफ हाऊ पीपल रिएक्ट टू देयर रिज़ल्ट्स। हर किसी का बर्ताव कहीं ना कहीं उसके जीवन के प्रति उसकी सोच को उजागर करता है। अब ऐसे में हम और आप कहाँ है, और हमारी सोच हमारे जीवन को किस दिशा में ले जा रही हैं ये हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता।

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