तन्हाई की गूँज


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मैं भी कभी अकेली थी। मैं भी कभी तन्हा थी।
अकेलेपन का सहारा ही बस अब रह गया था ज़िन्दगी में।

एक आवाज़ मेरी भी थी, एक ख्वाब मेरा भी था।
जाने अनजाने में ही मैंने अपनी पहचान ढूंडली थी।
उस गूँज में जिसकी न आवाज़ था, न कोई धुन ।

आवाज़ मैं अपनी कहाँ ढूंढ़ती, मेरी तरह मेरे रस्ते भी खोए हुए थे ।
न मंज़िल का पता था, न इस रस्ते का और न ही मेरे इस सफ़र का।

अपने आप को शायद खोना इसे कहते हैं।

मैंने अपने आपसे अब कह लिया था की मुझे अपने आप को ढूँढना होगा और मैं अपनी पहचान को इस तन्हाई के गूँज में ढूढंथी हुई चले जा रही हूँ।

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