एक कविता मेरी भी


काव्य लिखत है आज हमारे सारे बच्चे, 

क्या खूब लिखत है! दिल हैं इनके सबसे सच्चे। 

दिल है इनके सच्चे, लेखनी बहुत है भारी,

गद्य हो चुका बहुत, अब हैं पद्य की बारी। 

कहे पंकज कविराय, आज कुछ हम भी लिखेंगे,

सबने अपनी कह दी, अब कुछ  हम भी कहेंगे। 

 

“दो बैलों की कथा” उसने हमें ऐसी सुनाई,

हीरा-मोती से सबकी पहचान कराई। 

पहचान कराई उसने, साथ ही ये समझाया,

पशु हुए तो क्या, उन्हें भी स्नेह ही भाया।

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

पशु हो या हो मानव, सबको प्रेम से भर दो। 

 

बाबा भारती ने है हमको यही सिखाया,

“जीत” उसी की हुई है जिसने “हार” को पाया। 

खड़गसिंह के मन को बदला अच्छाई से,

पाया सुलतान को वापस अपनी सच्चाई से। 

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

जितने भी है बुरे, सभी को अच्छा कर दो। 

 

कितना कुछ है लिखा उन्होंने, अमर हो गए,

हिंदी के फूलों के वो तो भ्रमर हो गए। 

भ्रमर हो गए, गद्य का ऐसा रस है निकाला,

तभी तो मैं हूँ लेखक अपनी हिंदी वाला। 

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

हमें चाहिए फिर से, एक और प्रेमचंद कर दो। 

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