वो मेरे भगवान नहीं

EDITOR: Aditya Prakash Singh

बारूदों के जलने से ही जिनकी पूजा होती है
कैसे वे खुश होते हैं धरती माता जब रोती है
और धरम के नाम पे बकरा जब कट जाता है
सत्य अहिंसा और धर्म का पाठ धरा रह जाता है
कर्म कांड के कचरे का अब गंगा बोझ उठाती है
आडम्बर के कारण ही तो झोपड़ियां जल जाती है
इन्हें कौन बताये मंदिर मस्ज़िद नफरत के पैगाम नहीं
और खून से जिसकी रोटी सिकतीं वो मेरे भगवान नहीं
वो मेरे भगवान नहीं।

तलवारों की नोकों पे अब धर्म दिखाई देते हैं
संग्रामो के शंखनाद और बिगुल सुनाई देते हैं
चुपके चुपके मंदिर में गीता भी अश्रु बहाती है
जब मंदिर से नफरत की ज्वाला सुलगायी जाती है
चरमपंथ के पंथी जन को धर्म सिखाने आते हैं
ढोंगी और पाखंडी सारे अब बाबा बन जाते हैं
इन्हें कौन बताये ज्ञान ध्यान सब बिकने के सामान नहीं
और जो बाज़ारों में बिकते हों वो मेरे भगवान नहीं
वो मेरे भगवान नहीं।

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