मैं कूल हूँ


माने या ना मानें, हमारे युवा; खासकर महानगरों के युवा ऐसे ही होते जा रहे हैं। “मैं कूल हूँ” का टैग लगा कर हमारे इतिहास को यूज़लैस बताते हुए आगे निकल जाना ही अब कूल है।

तन्हाई की गूँज


आवाज़ मैं अपनी कहाँ ढूंढ़ती, मेरी तरह मेरे रस्ते भी खोए हुए थे ।
न मंज़िल का पता था, न इस रस्ते का और न ही मेरे इस सफ़र का।

6 प्वाइंटर – 9 प्वाइंटर


रिज़ल्ट आ गया इस सेमेस्टर का। जहाँ देखो वहाँ हड़कम्प मचा है। कोई पास हो जाने पर खुशियाँ मना रहा है तो कोई टॉप ना होने पर गम के आँसू बहा रहा है। पर एक बात तो पक्की है, ‘रिज़ल्ट’ ज़रूर आ गया है।

चोमूनामा 2


आज कूल डूड़स के बारे में बात नहीं करनी। आज बात करते हैं उनके ‘पोलर अपोज़िट्स’-चोमूओं की। यूँ तो चोमू कभी भी, ध्यान रखें; कभी भी खुद को कूल डूड्स से कम नही मानते, पर कुछ ऐसी चीज़ें हैं जहाँ चोमू भी चुप रह जाते हैं। उनमे से एक है ‘प्रेमिका’।

​सांड बचाओ आंदोलन


जल्लीकट्टू का आयोजन पुराने समय में अपनी वीरता साबित करने के लिए किया जाता था। मुझे ऐसा लगता है कि वीरता दिखाने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ में एक सांड को छोड़ना उचित नहीं है। वीरता दिखानी ही है तो शहर की गौशाला के बीचों बीच खड़े हो जाइये, अपने पूरे शरीर पर रोटियां लपेट लीजिये, और “हियो” “हियो” चिल्लाइये।

सौ चिट्ठियाँ: पार्ट 1


“क्या बकवास है! ऐसी चिट्ठियाँ हमें हर रोज़ मिलती हैं। इसलिए ही तो हमने तुम्हारी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया था।” अतुल ने कहा।
“जी। इस घटना के बाद मैंने सिर्फ एक ही चिट्ठी भेजी थी। बाकि की 99 चिट्ठियां, इसके मिलने के बाद भेजी।”

रोंदू


मुझे इस बारे में कोई तकनीकी जानकारी नहीं है, पर मेरे अनुसार रोना दो तरह का होता है – एक वो रोना, जिसमें अत्यधिक ख़ुशी, अत्यधिक ग़म, या किसी भी तरह के भावनात्मक चरमोत्कर्ष पर आँखों से आंसू निकल आते हैं।