फ्यूज़ लड़ी


EDITOR: ADITYA PRAKASH

बाज़ार में दीवाली की रौनक छायी है। सड़कों पर फिर से भीड़ उमड़ आयी है। जिन दुकानों को आम दिनों में लोग देखते भी नहीं थे, आज उनमें ग्राहकों की भीड़ लगी है। घर की सफाई में लोग व्यस्त है। कबाड़ियों की भी मौज है। साफ़ सफाई में पुराने अखबार, गत्ते बहुत मिल रहे हैं आजकल। चीनी सामान का बहिष्कार हुआ या नहीं पता नहीं, पर रंग बिरंगी लाइट लगाने की उत्सुकता लोगों में कम नहीं हुई।

रमेश भी शाम होते होते इन चमकीली रोशनियों को देख कर हैरान था। उसे ये देख कर अचम्भा हो रहा था कि ऊँची इमारतों पर लगी रंग बिरंगी रोशनियां एक-एक कर के जल रही हैं। आँखों को सुकून देने वाला ये नज़ारा उसे घर वापस लौटने से रोक रहा था। फिर शामू ने आवाज़ लगायी, “जनाब, चलना नहीं है? शाम हो गयी, भूख लगी है।”

रमेश ने अपना थैला उठाया और चल पड़ा। रास्ते में उसे कई ऐसे घर मिले जहां रोशनियां जगमगा रही थी।

शहर के बाहर एक मैदान को झुग्गी झोपड़ियों वालों ने अपना घर बना लिया था। रमेश भी अपनी माँ के साथ वहीँ रहता था। शाम को खाना खाते हुए उसने माँ से पूछा, “हम भी कल घर में रौशनी करेंगे। ”

“कहाँ से करेगा रोशनी? ये बल्ब लगा है न। वो तो मेहेरबानी हो शमशेर भाईसाहब की जो बिजली का जुगाड़ कर दिया। एक तार हमें भी दे दी। तू खाना खा। और सुन, कल कुर्ता पजामा पहन लेना और कबाड़ उठाने मत जाना। यहीं रह कर, सबके साथ खेलना। रात को खील और पतासों से पूजा करके थोड़े बहुत पठाके जला लेना। शमशेर भाईसाहब लाएं हैं सब बच्चों के लिए।”
“ठीक है।” रमेश ने उँगलियों में खाने का एक कौर भरा और खाने लगा।
अगले दिन जब माँ उठी तो देखा कि कुर्ता पजामा वहीँ पड़ा था। रमेश सुबह सुबह ही कहीं निकल गया।

बस्ती में रौनक थी। बच्चे इधर उधर भागते हुए खेल रहे थे। इधर उधर से पठाकों की आवाज़ भी आ रही थी। यहां रमेश की माँ परेशान हो रही थी। बच्चे कई बार आकर पूछ चुके थे कि रमेश कहाँ गया। शमशेर भाईसाहब भी आये थे पूछने। पर रमेश का कहीं अता पता ही नहीं।

“अंकल जी, कुछ कबाड़ है?” रमेश ने एक बड़े से घर के बाहर से आवाज़ लगाईं।
“नहीं, बच्चे। जो था वो तो पहले ही निकाल दिया। सफाई तो कब की हो चुकी, अब तो सजाने में व्यस्त है।” एक आदमी ने कहा।

रमेश आगे बढ़ा। एक-एक घर का दरवाज़ा खटखटा कर पूछता कि कहीं किसी को कोई कबाड़ तो नहीं बेचना। धूप चढ़ गयी थी। दीवाली के जश्न में सिर्फ कुछ घंटे बाक़ी थे। रमेश के माथे पर पसीने की बूंदे ठीक उसी तरह बह रही थी जैसे उसके अंदर की उम्मीदें ढल रही थी।

रमेश ने हर पॉश इलाके में जाकर आवाज़ें लगाई। दरवाज़े खटखटाये। पर उसे कुछ मिला ही नहीं। रमेश हिम्मत हार कर वापस उसी इमारत के सामने फुटपाथ पर जाकर बैठ गया। शाम ढल आयी थी। पटाखों की आवाज़ें तेज़ हो चली थी। ईमारत की रोशनियां जगमगाने लगी। रमेश अपने हाथों को कमर के पीछे ज़मीन पर रख कर रोशनियों को देख रहा था। बहुत मन था उसका, कि ऐसी एक लड़ी अपनी झोपडी पर भी लगाए।

अचानक सामने वाली इमारत की एक लड़ी के कुछ बल्ब बुझ गए। कुछ लोग ईमारत से बाहर निकले, और लड़ियों की तरफ देखा। फिर एक नौकर को इशारा करते हुए कहा कि उस लड़ी को उतार दे। थोड़ी ही देर में रमेश ने देखा, कि उस फ्यूज लड़ी को हटाया जाने लगा। रमेश ने बिना इधर उधर देखे सड़क के उस पार दौड़ लगा दी। वहां खड़े एक आदमी से बोला-

“अंकल, दीवाली की शुभकामनाईयें।”
“आपको भी, बेटा!”
“अंकल ये लाइट को क्या हुआ?”
“बेटा, चीनी माल है। कोई एक तार ख़राब हो गया जिससे आधे बल्ब फ्यूज हो गए हैं। अब बाकी लड़ियों के साथ ये आधी फ्यूज़ लड़ी का क्या काम?”
“मैं कबाड़ वाला हूँ। आप ये मुझे बेच दीजिये। आप बताइये इसके कितने रुपये लेंगे?”
“बेटा, दीवाली की पूजा का वक़्त है। इस वक्त तुझसे क्या पैसे लूँ। खराब लाइट है। तू ऐसे ही ले जा।”

रमेश वापस बस्ती में आ गया। माँ ने आते ही उसको खूब डांटा। पर वो हंसे जा रहा था। उसने माँ से कहा कि आप पूजा की तैयारी शुरू करो।

रमेश ने शमशेर काका को आवाज़ दी। शमशेर और रमेश ने आपस में कुछ बात की। फिर रमेश भाग कर वापस आया और अपने थैले में से वो लड़ी निकाली। बाहर शमशेर अपने औज़ारों का बक्सा लेकर आ गया। रमेश ने लड़ी झोपडी के ऊपर टांग दी। शमशेर ने उनकी झोपडी में जाने वाली बिजली की तार में एक कट लगाया और उस लड़ी की तारों को उससे लपेट कर टेप से चिपका दिया।

जैसे ही रमेश ने बल्ब जलाने वाला खटका दबाया, लड़ी भी जगमगा उठी। सारी बस्ती के लोग उसकी झोपडी के बाहर इकट्ठे हो गए और रमेश की तारीफ करने लगे।

रमेश ने अपना कुर्ता पजामा पहना और माँ के साथ पूजा की। फिर रात भर अपनी झोपडी के बाहर बैठ कर उस लड़ी को जगमगाते हुए देखता रहा।

एक फ्यूज़ लड़ी ने रमेश की दीवाली में रोशनी भर दी थी।

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