हार से प्यार

EDITOR: Aditya Prakash Singh

हम सब ज़िन्दगी में जीतना चाहते हैं। हर मोड़, हर कदम, सबसे आगे निकलना चाहते हैं। कूल बनने की कोशिश मत करिये। आप भी ऐसे ही हैं। बहस में, झगडे  में, पढाई में, खेल में, हर चीज़ में… बस आगे निकलना चाहते हैं हम। 

जब आप किसी टीवी शो में एक प्रतिभागी को गाते हुए सुनते हैं, थोड़ी देर बाद आप खुद को उसकी जगह रख कर सोचने लगते हैं। आप उसैन बोल्ट से तेज़ दौड़ना चाहते हैं। फेल्प्स से तेज़ तैरना चाहते हैं। हम लोग चाहते हैं कि हमारी वेबसाइट बहुत सारे पैसे कमाने लगे। लेकिन वो क्या है न, समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिला। 

मैं भी रेस का घोडा था। चाबुक पड़ने पर बहुत तेज़ दौड़ता था। दांव लगते थे मुझ पर। फिर एक दिन, भागते भागते साँस फ़ूलने लगी। पैर जवाब दे गए। मैं वहीँ बैठ गया। रेस पूरी ही नहीं की। सब लोग जीतने वाले घोड़े की पीठ थपथपा रहे थे। और मैं हांफता हुआ, नम होती आँखों से उसे देख रहा था। नहीं, उस घोड़े को नहीं। अपनी हार को। 

जैसे जैसे वो मेरी तरफ बढ़ने लगी, मैं पीछे होने लगा। जब हिल भी नहीं पाया तो आँखे बंद कर ली। मैं हार नहीं देखना चाहता था। थोड़ी देर बाद आँख खोली तो हार वहीँ थी। ठीक सामने। आखिर मैंने हार के सामने हार मान ही ली। 

हार का सहारा लेकर धीरे धीरे चलना शुरू किया। लगा कि वो मुझसे दोस्ती करना चाहती है। पहली बार एक ऐसी “चीज़” जो स्त्रीलिंग है, मुझसे दोस्ती करना चाहती थी। मैं मना नहीं कर पाया। हार मुझे अपने साथ घुमाने ले गयी। रास्ते में बहुत सारे लोग मिले, जो उसे जानते थे। कुछ ऐसे लोग थे जो उससे दूर भागने की कोशिश कर रहे थे। वो बस उन्हें देख कर मुस्कुरा दी और एक दिन मिलने का वादा किया। 

एक लड़का था। छत पर खड़ा था। हार को पास आता देखकर कूद गया। मर गया। मैंने हार की तरफ देखा, तो उसकी आँखों में आंसू थे। मैंने सोचा, यही मौका है बेटा। मैंने उसे गले लगा लिया। वो समझ गयी थी। हँस दी! मैंने कहा, बेटा, हँसी तो फंसी। 

हार एक दम पागल थी। कुछ करने से पहले सोचती नहीं थी। उसके चक्कर में बहुत सारी गलतियां की। जिन चीज़ों से डर लगता था, वो सब किया। अकेलेपन में खुल कर हँसा। खुद पर हँसा। लोगों को माफ़ किया। सब से सच कह दिया। थोड़ा मुश्किल था, लेकिन हार को साथ खड़ा पा कर हिम्मत मिल गयी। 

लेकिन अब तो हद ही हो गयी। हार ने हाथ पकड़ा और ले जाकर फिर उसी रेस में खड़ा कर दिया। मैंने उसे देखा। फिर आँखें बंद कर ली। आँख खुली तो फिर वहीँ तालियों का शोर। फिर वही रेस, वही घोड़े। बस इस बार एक ही फर्क था। घोडा भी मैं ही था, चाबुक भी मैं और चाबुक चलाने वाला भी मैं। 

गोली चली। रेस शुरू हुई। मैंने तेज़ी से कदम ज़मीन पर मार दिए। न ही मुझे रेस में भागने वाले और घोड़े दिख रहे थे। न ही ताली बजाने और सट्टा लगाने वाले अमीर लोग। इस बार उन सब के चहरे याद आ रहे थे, जिनसे हार ने मुझे मिलाया था। 

एक औरत, पति नहीं था उसका। अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए लोगों के घर साफ़ सफाई करती थी। हर दिन हार से मिलती थी वो। लेकिन फिर मुस्कुरा कर अपनी बेटी के लिए खाना बनाने चली जाती थी। 

एक लड़का था। एक लड़की से बहुत प्यार करता था। पर पैसे नहीं थे उसके पास। हर दिन नौकरी की तलाश में भटकता था। शाम को फिर हार से मिलता। हार उसके बालों पर हाथ फिराती। फिर वो अपने प्यार को देखने उसके घर के बाहर खड़ा हो जाता था। दोनों नज़रों नज़रों में सब बातें करते थे। 

एक आदमी था। सड़क किनारे ठेला लगाता था। दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने में दिन बीत जाता था। शाम को फिर हार से मिलता था। मुस्कुराता था। फिर घर वापस लौटता, सबको खाना खिलाता था। अपनी बीवी की गोद में सिर रख कर सो जाता था।

ऐसे बहुत से लोग थे। जिन्होंने हार से दोस्ती कर ली थी। ज़िन्दगी में एक ही चीज़ का तो डर था। हार का सामना करना पड़ा तो क्या होगा। अब जब सामना हो गया, तो हार से डरना बंद कर दिया। दोस्ती हो गयी हार से। प्यारी है वो। कभी साथ नहीं छोड़ती। हमेशा चाहती है कि आपको जीत मिले। 

दौड़ते दौड़ते रुक गया। इस बार हाँफते हुए नहीं। ये रेस मेरी थी ही नहीं। चाबुक के डर से जो भागे, वो घोडा नहीं गधा है। रेस के ठीक बीचोंबीच खड़े होकर आगे देखा, लोग दौड़ते हुए आगे निकल रहे थे। धूल उड़ रही थी। पीछे देखा, दूर से हार खड़ी मुस्कुरा रही थी। प्यार हो गया था हार से। 

उसका हाथ पकड़ कर बाहर टहलते हुए मैंने पूछा,”मैं हारना नहीं चाहता।” उसने जवाब दिया,”मैं तो तुम्हारी जीत हूँ। रेस की हार, ज़िन्दगी की जीत। सब मैं ही तो हूँ।” हाथों में हाथ डाले हम दोनों चले जा रहे थे। आखिर मेरी खुशियों की चाबी, मेरी हार में ही छुपी थी। 

एक राह पर चलने के लिए, एक सफर को पूरा करने के लिए, सबसे ज़रूरी है हमसफ़र का होना। यूँ देखोगे तो मैं अकेला ही चलता दिखाई दूंगा। वो सब लोग, अकेले ही अपनी राह पर चलते दिखाई देते हैं। लेकिन हम सब के साथ हार है। एक हमसफ़र की तरह। तो सोच क्या रहे हो? ये तो मेरी हार की कहानी थी। जाकर अपनी हार को ढूंढो। तुम हार के पीछे, हार तुम्हारे पीछे… टू मछ फ़न! 

और याद रखना। हार को उल्टा पढोगे तो राह दिखाई देगी। बस देखने का नजरिया ही तो बदलना है। 

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