खुशी से जीने का affidavit

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सुबह ठीक 6.00 बजे अलार्म की घंटी बजती है। यश झटके के साथ उठता है। उसका हाथ सीधा अपने फ़ोन पर जाता है। आधी खुली आँखों से वो किसी तरह अलार्म को बंद करता है। एक बार फिर कमरे में शांति छा जाती है। यश वापस से अपना मुंह तकिये में घुसा देता है। और 5 मिनट बाद फिर से अलार्म बजती है।

“What the heck!”
यश ने कहा। उसी ने रात को दो अलार्म लगायी थी क्योंकि उसे पता है अलार्म बंद करने के बाद वो फिरसे सोजायेगा। यश हमेशा ऐसा ही करता है। उसे पसंद नहीं है क़ि अलार्म की घंटी उसके सपनों के बीच बजती है जिससे वो अपना सपना पूरा नहीं करपाता। पूरे दिन दफ़्तर में उसे नींद की याद आती गयी। इस चक्कर मे उसने अपने सभी सहयोगियों को एक एक बार डपटा दिया। वापस घर लौटते हुए उसे लगा कि घर जाके दबाके सोयेगा। रास्ते में याद आया की सामने की दुकान से दूध की थैली लेनी है।

“एक Full Cream देना।” यश ने कहा।
“24 रुपये।” दुकान पर बैठे बच्चे ने कहा।
“और एक वो ऑरेन्ज वाले बिस्किट भी”।
“36 हो गए।” बच्चे ने बिना भाव बदले जवाब दिया।
यश ने उसे 50 रुपये का नोट पकड़ाया।
“1 रुपया और मिल जाएगा?” बच्चे ने फिर पूछा।
यश ने एक और रुपया उसे दे दिया।
बच्चे ने 15 रुपये वापस किये, दूध और बिस्किट एक थैली में डाला और दे दिया।

यश वापस आया। उसने दूध गरम किया और उस में बिस्किट डुबोकर खाने लगा। न जाने क्यों उसे उस बच्चे का चेहरा बार बार याद आ रहा था।
“कितना तेज़ दिमाग था उसका!” यश ने सोचा। पर एक बार फिर उसने अपना ध्यान नींद पर लगाने की कोशिश की। फिर एक बार…

वही सुबह, वही अलार्म… वही लोगों पर ग़ुस्सा। वापस आते हुए फिर वो दूध लेने गया। फिर वही बच्चा बैठा हुआ था।
पर इस बार बच्चे के हाथ में एक बहुत पुरानी सी, फटी हुई किताब थी। बच्चे ने जैसे ही यश को देखा, एक Full Cream की थैली लाके उसके सामने रख दी। फिर किताब में देखता हुआ बोला, “24 रुपये साहब।” यश ने 24 रुपये निकाल कर रख दिए। उस से रहा नहीं गया तो पूछा – “तुम… तुम्हारा नाम क्या है दोस्त?” बच्चे ने किताब से नज़रे नहीं हटाते हुए जवाब दिया- “अनिल, मेरा नाम अनिल है, साहब”।
“ये क्या पढ़ रहे हो?” यश ने पूछा।
“ये 6th क्लास की NCERT है। वो भेलपुरी वाला गगन है न, वो भेलपुरी परोसने के लिये इन्ही किताबों के पन्ने इस्तेमाल करता है।” अनिल ने यश की और पहली बार देखा।
यश को एक मासूम चेहरा और तेज़ दिमाग साफ़ दिखाई दे रहा था।
“तुम्हें पढ़ने का शौक है?” यश ने पूछा।
“हाँ। मुझे गणित बहुत अच्छा लगता है।” अनिल ने जवाब दिया।
यश अनिल की मदद करता है और उसे वो प्रश्न समझाता है जिस पर अनिल अटक गया था।
“Thank you भैया!” अनिल ने कहा।

यश वापस मुड़ता है और घर पहुँचकर दूध गर्म करने लग जाता है। उसका दिमाग अभी भी वहीँ है। अनिल के पास। उस लड़के में यश उस लड़के को देख पा रहा है जिसे वो कई साल पहले शीशे में देखता था। सब जानते हैं कि यश एक होनहार विद्यार्थी था पर अब सब कुछ खत्म हो चुका है। जबसे वो शहर आया है, उसने अपने आपको सिर्फ काम में व्यस्त रखा है। उसे अपना काम भी पसंद नहीं है। दिनभर लैपटॉप पर बैठकर PPTs बनाना उसका talent नहीं है। वो कुछ अच्छा करना चाहता है और दिक्कत ये है कि “अच्छा” का scope किसी ने define ही नहीं किया। पर अब शायद अनिल को उसकी ज़रूरत है। यश आज आराम से सोता है। सुबह की पहली अलार्म पर उठ जाता है और जल्दी से तैयार होकर दफ्तर पहुंचता है। जल्दी से अपने पूरे दिन का काम ख़त्म करता है और जल्दी निकल जाता है।

“Hi अनिल। कैसा है!” यश पूछता है।
“मैं ठीक हूँ भैया, आप कैसे हैं?” अनिल जवाब देता है और ढूध निकालने के लिए fridge खोलता है। पर यश उसे रोक देता है। वो अपने laptop bag के अंदर से एक नयी, ज़िल्द चढ़ी हुई NCERT की किताब निकलता है और उसे अनिल की तरफ बढ़ा देता है। अनिल का मुंह खुला का खुला रह जाता है। उस किताब के पहले पन्ने पर “अनिल” लिखा है। अनिल नज़रे नीचे कर के कहता है- “इस सबकी क्या ज़रूरत थी भैया। आपने कल प्रश्न हल करवा दिया था। आप बहुत अच्छे हैं।”
“क्या मैं तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ?” यश ने हिचकिचाते हुए कहा।

अनिल ने सिर हाँ में हिला दिया।
“क्या तुम मुझ से पढ़ना चाहोंगे?” यश ने हिचकिचाते हुए पूछा।
अनिल बस मुस्कुरा दिया।

उस ने अपने मामा से इजाज़त ले ली। अब हर शाम अनिल यश भैया के साथ बैठकर गणित पढता है। जब वो दोनों बोर होने लगते तो यश के “PS III” पर टेनिस खेलते थे। यश हर बार जीत जाता था तो अनिल कहता “भैया, ये वीडियो गेम तो नकली है। कभी असली वाला खेलेंगे, तब देखेंगे।” खाली वक्त में यश ने अनिल को Laptop चलाना और email करना भी सीखा दिया।
आज यश बहुत खुश है। ऑफिस में भी सबके साथ अच्छे से बातचीत हो रही है। अपना काम ख़त्म कर के वो अनिल की दुकान पर पहुंचता है। पर वहां अनिल नहीं, उसके मामा बैठे हैं।

“आइये यश सर। Full Cream लेंगे न!” अनिल के मामा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“अंकल जी, अनिल कहाँ है?” यश ने पूछा।
“वो तो चला गया जयपुर। उसकी माँ वहीँ रहती है तो उनका साथ देने के लिए भी तो कोई चाहिए था न।” मामा ने कहा।

यश धडधड़ाते हुए अपने घर में घुसता है। अपना फ़ोन स्विच ऑफ कर के टेबल पर रखता है। अपने बिस्तर पर छलांग लगा देता है और तकिये में मुंह छुपाकर दहाड़े मार कर रोता है। शायद इतना तो वो पिछले कई सालों में नहीं रोया था। सब खत्म हो गया। जब लगा कि इस शहर ने अपनाना शुरू कर दिया तो उसकी motivation काएकमात्र source भी चला गया।
रोते हुए पता ही नहीं चला क़ि यश कब सोगया। 3 बजे सुबह उसकी नींद खुली तो वो उठा। फ़ोन को ओन करने के लिए ज़ोर से button press किया। दूसरे हाथ में एक गिलास में पानी भरा और एक घूंट पानी मुंह में लिया ही था कि एकझटके से यश के मुंह से पानी का फव्वारा छुटता है।

फ़ोन पर notification आती है-
“1 new mail received from anil.fullcream@gmail.com”
यश जहाँ खड़ा था वहीँ कूद रहा है और उस notification पर tap करता है।
“Hi Bhaiya, Ek question puchna hai…tennis ke andar score 10,15, 30 and 40 hi kyu hote hain? Ye to “AP” series bhi nahi bani. -Anil”

यश बस उस email को देख रहा है, जैसे किसी ने उसे खुशी से जीने का affidavit दे दिया हो।

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