God Complex

EDITOR: Aesha Kallattuvalapil

There are people around me who whine about every little trouble they come across. Maybe you are just like them. Or not, it might be so that you are a lot tougher. Not much fazes you. You may even claim to have ‘control’ over your life. You may harbor the wee dreams of floating above your clouded emotions. But, at the end of the day, you remain what you are – A human.

People like me are rare. We don’t pop up around you very often. It’s not that we like being obscure. It’s just that the spotlight holds no appeal to us. We live our lives the way we want to. We let ourselves indulge into just the correct amount of emotion we find appropriate. We are masters of our mental state. We are entirely absolute.

I’ve forgotten the last time I lost my cool. I have to consciously make an effort to react in a way even slightly astray from the neutral. No condition, I repeat; no condition brings out the emotions out from the inner me. I’ve to choose the emotions I let flow to respond to the situation at hand. And even then, most of the time I simply don’t bother letting my emotions out.

The concept of ‘God’ eludes me. But he must feel similar to what we do – being in a position of total power, total control over oneself, ignorant of any and all dangers. That is the way God must feel. It was the reason they termed ‘God Complex’ for how we choose to behave or act.

I too, have it i.e. an absolute control over my emotions by acknowledging that I’m perfectly capable of handling any situation thrown at me.

I have God Complex.

Or maybe

Am I emotionally broken beyond repair?

गालियाँ और “कूलनेस”

EDITOR: Aditya Prakash Singh

माँ और बहन एक ज़माने में हमारी मर्यादा का प्रतीक थी। महाभारत में कुंती हो, या फ़िर श्री कृष्ण का चीरहरण रोक कर बहन की लाज रखना। ये सब कहानियाँ कहीं ना कहीं भारतीय विचारधारा की नींव से जुड़ी हैं, जहाँ माताओं और बहनों को एक समय पूजनीय माना जाता था।

फिर आये डबल कोटेड “कर्मकाण्ड”(डबल कोटेड पर गौर कीजिये)। किसी एक जाति विशेष के लोगों ने अपनी सुदृढ सामाजिक हैसियत को आर्थिक और राजनैतिक रूप से बढाने के लिये धर्म के नाम पर लोगों को इस्तमाल करना शुरू किया। इससे जन्म हुआ हमारे वर्तमान पितृसत्तात्मक समाज का, जहाँ माँ और बहन को बस एक बोझ माना जाने लगा।

प्रगति हुई, समय बदला, और ‘महिला सशक्तिकरण’ का प्रभाव दिखना शुरू हुआ। पर आज के समय में सशक्त होती महिलाओं के साथ ही सामाजिक परिस्थितियों में भी एक नयी चीज़ जुड़ गयी है। एक शब्द- ‘गालियाँ’, जिनका इस्तेमाल हमारे ‘युवा’ कौड़ियों के भाव कर रहे हैं। कमाल की बात है कि आधुनिक ‘नारी’ भी इनके इस्तेमाल से अछूत नहीं है।

आप पितृसत्ता का विरोध करती हैं, लेकिन ऐसी गालियाँ देने से नहीं झिझकती जिनमें माँ बहन की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। क्यों? कइयों का कहना होता है कि वे अपने ‘दोस्तों’ के साथ ‘मज़ाक में’ या ‘यूँ ही’ गालियाँ देते हैं। कोई और मज़ाक नहीं मिला? इसके अलावा अगर संस्कार और तहजीब की बात करें, तो ‘कूल डूड्स’ और ‘आधुनिक नारी’ का कुछ एक ही जैसा हश्र होता है। आप जो दिखाते हैं, समाज वही देखता है। अगर आप दारू पीकर लड़कियों को छेड़ते हैं, तो ये ‘कूल’ होना नहीं होता। कुछ ऐसे ही पूरे समाज को किसी चीज़ के लिये दोष देने से पहले खुद को भी देख लेना चाहिये। अगर नहीं, तो ये ‘आधुनिक नारी’ कूल डूड्स के समकक्ष ‘हॉट चिक्स’ ही कहलाएँगी।

Negative Optimism

EDITOR: Aaratrika Chatterjee

Once upon a time, there lived a sad boy. He was always unhappy, depressed, sour; it was not so because he didn’t try. He tried as hard as his age permitted. He even outdid them by a huge margin. But Alas! None of his endeavours ever turned out to be fruitful. Time passed, and he started getting more and more depressed. His mood started affecting others near him. At the end, he was left alone without a single friend or a dime of hope.

In such a dire time, he looked for peace in slumber, the eternal sleep. He decided to leave the realm of the living and fade out into the world of the dead. With such a motive in his mind, he went to visit his only friend one last time. “How have you been?” Asked our sad boy with a fake excitement in his voice. “As healthy as a bull and as happy as a dancing peacock.” Replied his friend. The sad boy hauled himself down on the bed, failing to keep his façade of happiness before his friend.

“What is wrong with you, my friend? Is some malady eating you away which I have not noticed yet?” Asked the sincere friend. He comforted the sorrowful boy who let out his long suppressed anguish. “Not a single day passes without something wrong happening to me. I have broken three phones by accident in the last three months. I have failed to score well in the last ten tests. My hair is falling; my mind is failing me. I do not like any food that goes down my throat. None of the beverages satisfy my thirst. I am always in need of one thing or other; but cannot have it no matter how much I try. My life is of no use to me or anyone else, my friend. I am going to end it for good now. For myself and for others.”

Such was the sorrow of the sad boy that he bawled like a baby. Tears pooled and fell down his eyes and the bass of his sobs tore up his friend’s mind. “Come with me, for I’ll let you see the value of your life and the worth you carry. And no. You shan’t speak a word while we travel to calm your mind.” Said his friend who was true and kind, and led his friend to a land far away, which turned out to be the land of his first night.

They came across a beggar as they entered the land of broken busts. He was old, sagging and quivered like a sapling in storm. The sad boy looked aghast for the old beggar’s ribs were on his skin and his eyes were sunken. His friend led him farther. A family of four greeted them from the side of the road. A sheet covered with holes was all they had for a roof. Three pots and a bundle was all they had. The father held a crying baby while the other two flinched in sleep. His friend led him further and they saw a homeless boy studying under a streetlight. His home was bereft of any such illumination and the light of his ambition didn’t let such a tiny inconvenience eclipse him.

As they progressed further into that land of poverty and pain, they witnessed horrible situations and people entwined within chains made of elder thorns. Their fate was as likely to change as the course of sun and yet they fought on and on without giving a second thought. The sad boy was transformed after the visit. “I grieve about things that are not in my control. I bemoan things, which do not matter in my life at all. All I see is what I cannot have. But till this day, I have failed to notice and admire what I do.” The friend smiled, for his friend had found the true path at last and he bid him good luck for the brilliant journey he would embark on.

Such is the story with us. We worry ourselves about what we do not possess. But we fail to admire what we do have, and a million others do not. Whenever in trouble, look around you at the people who have less than you, and are still happy with their lives. This is the formula of Negative Optimism.

चोमूनामा 3

The Editing Startup

सामाजिक तौर तरीके, रूढ़ियाँ, अंधविश्वास; यकायक नहीं उभरते। इनका भी समय के साथ विकास होता है, स्वरूप में बदलाव आता है। आज के ‘चोमूओं’ और ‘कूल डूड्स’ की लड़ाई कोई नयी नहीं है। दोनों पक्षों के लोग वही हैं, वहीं हैं, बस उनका बाहरी आवरण बदल गया है।

पुराने ज़माने में गाँव के लड़के शहर ‘घूमने’ आते थे। उनके हम-उम्र शहर के लड़कों से जो उनका संबंध था, आज चोमूओं का कूल डूड्स के साथ भी कुछ वैसा ही नाता है। शहरी तौर तरीकों से अंजान होने के बहाने उनका मज़ाक बनाना बस एक छलावा होता था। शहर के कूल डूड्स खुद के दंभ को गाँव के चोमूओं की काबीलियत, शारीरिक बल और मौलिक विचारों तले दबने से बचाने के लिये ऐसा करते थे।

आज भी बिल्कुल वही हालात हैं। खुद के ओछेपन, वैचारिक हीनता और कमजोरी को छिपाने के लिये ‘कूल डूड्स’ चोमूओं पर दिखावट की तलवार से प्रहार करते हैं, जिसका जवाब आज भी चोमूओं के पास नहीं है। आप कितना भी नकार लें, लेकिन सच यही है कि वर्तमान ‘कूल डूड्स’ ही हमारे समाज के पतन के कारक हैं।

अब हम ये सब जानकर चुप तो बैठने से रहे। इसलिये हमारे यहाँ आजकल एक नयी प्रथा शुरू हुई है। कहीँ पर भी जब किसी महानुभाव की इज़्जत उतारनी हो, तो उन्हें ‘कूल डूड’ बोला जाने लगा है। कहीँ ना कहीँ इसका श्रेय (सच कहें तो पूरा श्रेय) हमको जाता है। शुरूआत में ‘चोमू’ को खुद की परिभाषा बनाने से शुरू हुआ मेरा यह व्यंग्य, शायद ‘शायद’ कुछ गम्भीर हुआ है।


मैं कूल हूँ


“अबे हट! मैं क्यों टाइम वेस्ट करूँ हिन्दी-विन्दी जान कर? इन्ग्लिश का टाइम है ब्रो, हिन्दी यूज़लैस है। इस पर टाइम वेस्ट ना कर। कूल बन, ‘कूल’।” ऐसा कहना था मेरे रूमी भाई साहब का। पर हम भी तो कम बड़े जिद्दी है नहीं, अड़े रहे। “भाई मान लिये इंग्लिश ज़रूरी है, पर मातृभाषा जानना भी तो जानना ज़रूरी है। तुम्हारी कौन सी है?” मेरे ऐसा कहने पर श्रीमान के सर पर बल पड़ गये, भौंएँ संकुचित हो गयीं उनकी। हम भी अपना सर पीट लिये कि किससे पाला पड़ा है।

“भाई मातृभाषा मतलब मदरटंग, ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’, समझे?” ये सुनकर श्रीमान का चेहरा सामान्य हुआ। “अरे तो सीधे सीधे ऐसे नहीं बोल सकता? हिन्दी है मेरी फ़र्स्ट लैंग्वेज।” अब हमको मौका मिला अपना प्वाइंट मारने का। “कहने का मतलब तुमको अपनी ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’ भी लिखनी नहीं आती?” हम पूछे श्रीमान से। सवाल सुनकर वो हमको ऐसा लुक दिये जैसे हम पूछ दिये हों कि पानी गीला क्यों होता है।

“औब्वियसली ब्रो, अब कंपनी वाले मेरे को मदरटंग में थोड़ी ना जॉब देंगे। सब इंग्लिश में होता है अब। क्यों टाइम एण्ड एफ़ोर्ट वेस्ट करूँ हिन्दी पढने में? इट्स यूज़लेस।” ऐसा बोलकर हम पर ‘हे हे हे हे’ कर के हँसने लगे। “तू चोमू है ना, हिन्दी पढ़। कुरते पायजामे में हिन्दी बोलकर जॉब लेना।” एक और ठहाका लगाया साहब ने और किट उठा कर क्रिकेट खेलने निकल गये।

ये सिर्फ मेरे रूममेट की कहानी नहीं है, आजकल मुश्किल से ही कोई ऐसा मिलता है जो किसी भी तरह से मातृभाषा ‘अच्छी’ लिख सकता हो। “भारतीय युवा” (डबल कोट्स पर ध्यान दें) हिन्दी को ‘पिछड़ा’ होने की निशानी मानता है। लेखक अजीत भारती की भाषा में ‘अंग्रेज़ों की टट्टी चाटने’ में हम खुद को बड़ा “कूल” समझते हैं।

ये कहीं से भी गलत नहीं है कि अंग्रेज़ी ज़रूरी है आज के ज़माने मेें। लेकिन इस चक्कर में हम खुद की मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। ये तो वैसी बात हुई, जबतक बच्चे हैं, माँ बाप की उंगली पकड़ कर चले। और जब ज़रूरत नही रही, माँ बाप ‘यूज़लैस’ हो गये और घर में प्रेमिका को घुसा के माँ बाप को ‘पिछड़ा’ और ‘अनकूल’ बोल कर बाहर फेंक दिया।

माने या ना मानें, हमारे युवा; खासकर महानगरों के युवा ऐसे ही होते जा रहे हैं। “मैं कूल हूँ” का टैग लगा कर हमारे इतिहास को यूज़लैस बताते हुए आगे निकल जाना ही अब कूल है।

ऐसा है, तो हम तो सीना ठोक कर खुद को चोमू बोलते हैं।

He Failed & I Topped The Class


I used to be a human.
You liked me, laughed with me.
We had fun together, you and me.
It wasn’t that long a span
When I used to be a human
We enjoyed a lot, but you ran
From the truth you didn’t want to see.

I saw it & faced it, but you were not with me
I tried to tell you that you can.
When I used to be a human
The day you pushed me away as hard as you can
I was just the same, what I used to be
You let yourself drop and blamed it on me.
You toasted me on my success, in a frying pan
Once, I used to be a human.

Peer pressure isn’t an easy thing to handle. If a friend does good, the others who couldn’t blame it all upon him/her. They treat the person as if he/she isn’t even a human being.

They don’t realize what did they do wrong. They blame the person who did right for doing it.
That’s the reality.

6 प्वाइंटर – 9 प्वाइंटर


रिज़ल्ट आ गया इस सेमेस्टर का। जहाँ देखो वहाँ हड़कम्प मचा है। कोई पास हो जाने पर खुशियाँ मना रहा है तो कोई टॉप ना होने पर गम के आँसू बहा रहा है। पर एक बात तो पक्की है, ‘रिज़ल्ट’ ज़रूर आ गया है।

अब हमारे एक साथी हैं, जिन्होंने अपना पूरा समय बड़ी शिद्दत के साथ शरलॉक और ब्रेकिंग बैड को दिया। उनका 6.3 आया है। एक सिंगल पोज़िशन में बैठ कर सबको गरिया रहें हैं, कन्टिन्युअसली। ‘सालों को कोई काम नहीं मिलता? जब देखो तब किताबों में घुसे रहते हैं। मेरा रिजल्ट तो इन्ही ने खराब कराया है।’ मतलब कि सही है। खुद घुसे रहो ‘लैपी’ के पिछवाड़े में, और मौके पर पूरी गल्ती दूसरों के मत्थे मढ दो। सही है।

एक और साथी है हमारे। पूरे सेमेस्टर में तीन दिन क्लास गये हैं। बाकी टाइम दिन भर सोना और रात भर हॉस्टल वाई-फाई का बर्बरता से शोषण करना, यही इनकी दिनचर्या, ‘रूटीन’ रही है पूरे सेमेस्टर। ‘भाई ये फ़ुद्दू सी चीज़ें मण्णे ना पढनी। मैं तो एयरोस्पेस पढने आया हूँ।’ पूछने पर यही जवाब रहता है उनका। रिज़ल्ट का रत्ती भर असर नहीं पड़ा जवाब पर। अब अरबपति बाप की औलाद हो, तो ना पढो वो भी चलता है।

क्लास टॉपर को ही ले लीजिये हमारे। रिज़ल्ट के बाद सर पकड़ कर सीढियों पर बैठा था। पूछने पर चेहरा ‘माइनस’ में मूव कर गया बंदे का। ‘भाई, बस 8 सब्जेक्ट्स में ‘O’ आया है। 4 बाकी रह गये। अब तो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा मैं।’ ये लीजिये। लड़के को 9.66 GPA आया है, पर फिर भी संड़ रहा है। मतलब हद्द होती है भाई! 

खैर, दीज़ वेयर सम टिपिकल एग्ज़ाम्पल्स ऑफ हाऊ पीपल रिएक्ट टू देयर रिज़ल्ट्स। हर किसी का बर्ताव कहीं ना कहीं उसके जीवन के प्रति उसकी सोच को उजागर करता है। अब ऐसे में हम और आप कहाँ है, और हमारी सोच हमारे जीवन को किस दिशा में ले जा रही हैं ये हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता।