गालियाँ और “कूलनेस”

EDITOR: Aditya Prakash Singh

माँ और बहन एक ज़माने में हमारी मर्यादा का प्रतीक थी। महाभारत में कुंती हो, या फ़िर श्री कृष्ण का चीरहरण रोक कर बहन की लाज रखना। ये सब कहानियाँ कहीं ना कहीं भारतीय विचारधारा की नींव से जुड़ी हैं, जहाँ माताओं और बहनों को एक समय पूजनीय माना जाता था।

फिर आये डबल कोटेड “कर्मकाण्ड”(डबल कोटेड पर गौर कीजिये)। किसी एक जाति विशेष के लोगों ने अपनी सुदृढ सामाजिक हैसियत को आर्थिक और राजनैतिक रूप से बढाने के लिये धर्म के नाम पर लोगों को इस्तमाल करना शुरू किया। इससे जन्म हुआ हमारे वर्तमान पितृसत्तात्मक समाज का, जहाँ माँ और बहन को बस एक बोझ माना जाने लगा।

प्रगति हुई, समय बदला, और ‘महिला सशक्तिकरण’ का प्रभाव दिखना शुरू हुआ। पर आज के समय में सशक्त होती महिलाओं के साथ ही सामाजिक परिस्थितियों में भी एक नयी चीज़ जुड़ गयी है। एक शब्द- ‘गालियाँ’, जिनका इस्तेमाल हमारे ‘युवा’ कौड़ियों के भाव कर रहे हैं। कमाल की बात है कि आधुनिक ‘नारी’ भी इनके इस्तेमाल से अछूत नहीं है।

आप पितृसत्ता का विरोध करती हैं, लेकिन ऐसी गालियाँ देने से नहीं झिझकती जिनमें माँ बहन की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। क्यों? कइयों का कहना होता है कि वे अपने ‘दोस्तों’ के साथ ‘मज़ाक में’ या ‘यूँ ही’ गालियाँ देते हैं। कोई और मज़ाक नहीं मिला? इसके अलावा अगर संस्कार और तहजीब की बात करें, तो ‘कूल डूड्स’ और ‘आधुनिक नारी’ का कुछ एक ही जैसा हश्र होता है। आप जो दिखाते हैं, समाज वही देखता है। अगर आप दारू पीकर लड़कियों को छेड़ते हैं, तो ये ‘कूल’ होना नहीं होता। कुछ ऐसे ही पूरे समाज को किसी चीज़ के लिये दोष देने से पहले खुद को भी देख लेना चाहिये। अगर नहीं, तो ये ‘आधुनिक नारी’ कूल डूड्स के समकक्ष ‘हॉट चिक्स’ ही कहलाएँगी।


चोमूनामा 3

The Editing Startup

सामाजिक तौर तरीके, रूढ़ियाँ, अंधविश्वास; यकायक नहीं उभरते। इनका भी समय के साथ विकास होता है, स्वरूप में बदलाव आता है। आज के ‘चोमूओं’ और ‘कूल डूड्स’ की लड़ाई कोई नयी नहीं है। दोनों पक्षों के लोग वही हैं, वहीं हैं, बस उनका बाहरी आवरण बदल गया है।

पुराने ज़माने में गाँव के लड़के शहर ‘घूमने’ आते थे। उनके हम-उम्र शहर के लड़कों से जो उनका संबंध था, आज चोमूओं का कूल डूड्स के साथ भी कुछ वैसा ही नाता है। शहरी तौर तरीकों से अंजान होने के बहाने उनका मज़ाक बनाना बस एक छलावा होता था। शहर के कूल डूड्स खुद के दंभ को गाँव के चोमूओं की काबीलियत, शारीरिक बल और मौलिक विचारों तले दबने से बचाने के लिये ऐसा करते थे।

आज भी बिल्कुल वही हालात हैं। खुद के ओछेपन, वैचारिक हीनता और कमजोरी को छिपाने के लिये ‘कूल डूड्स’ चोमूओं पर दिखावट की तलवार से प्रहार करते हैं, जिसका जवाब आज भी चोमूओं के पास नहीं है। आप कितना भी नकार लें, लेकिन सच यही है कि वर्तमान ‘कूल डूड्स’ ही हमारे समाज के पतन के कारक हैं।

अब हम ये सब जानकर चुप तो बैठने से रहे। इसलिये हमारे यहाँ आजकल एक नयी प्रथा शुरू हुई है। कहीँ पर भी जब किसी महानुभाव की इज़्जत उतारनी हो, तो उन्हें ‘कूल डूड’ बोला जाने लगा है। कहीँ ना कहीँ इसका श्रेय (सच कहें तो पूरा श्रेय) हमको जाता है। शुरूआत में ‘चोमू’ को खुद की परिभाषा बनाने से शुरू हुआ मेरा यह व्यंग्य, शायद ‘शायद’ कुछ गम्भीर हुआ है।

“शायद…”


भारत भाग्य विधाता

EDITOR: Blithering Idiotess

हमारे देश में जयंतियों और पुण्यतिथियों की बाढ़ सी आ गयी है। हो भी क्यों न, जनसंख्या इतनी ज़्यादा है कि हर 100 में से एक आदमी किसी ने किसी विधा का प्रेरणास्त्रोत हो सकता है। लेकिन हमारे देश में कुछ ऐसे लोग भी हुए हैं, जो सही मायने में जयंती और पुण्यतिथि वाले रुतबे के लायक हैं।

आज बात उनकी, जो अपने समय से बहुत आगे थे। आज बात उनकी, जिन्होंने कुछ ऐसा लिखा जिसे सुनकर, आप का बाप भी चाहे तो आपको खड़े होने से नहीं रोक सकता। जी हाँ, बात उनकी, जिन्हें गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर, या रवीन्द्रनाथ टैगोर कहा जाता है।

सफ़ेद दाढ़ी, लम्बे बाल, हाथ में किताब लिए हुए – हमारे मन में यही तस्वीर बनती है टैगोर की। जब भी उन्हें देखा है तो ऐसे ही वेश में देखा है। मानो, पैदा ही दाढ़ी के साथ हुए हों। पर वो कहते हैं न, लम्बी दाढ़ी तजुर्बे और बुद्धि का प्रतीक है। टैगोर की रचनाएं, उनकी बुद्धिमत्ता एवं तजुर्बे का ही नतीजा है। इंटरनेट पर जब पढ़ा तो मालूम चला कि उन्होंने 8 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी। 16 साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हो गयी। कोई शक नहीं था कि यही रबीन्द्रनाथ ठाकुर बाद में एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता बने।

मुझे बंगाली नहीं आती, इसीलिए इनकी ज़्यादातर रचनाएं पढ़ नहीं पाया। लेकिन जितने दोस्त बांग्ला बोलते और पढ़ते हैं, उनसे टैगोर के बारे में बात करके पता चलता है कि उन्होंने बांग्ला साहित्य को कितना कुछ दिया है। हर कवि की किसी एक विषय पर मज़बूत पकड़ होती है और उसकी ज़्यादातर रचनाएं एक ही तरह की होती हैं। जब मैंने टैगोर के बारे में लोगों से सवाल किया तो पता चला कि टैगोर का कोई एक मज़बूत विषय नहीं था। टैगोर ने सभी तरह की मानवीय भावनाओं को छुआ है, जिसमें आध्यात्मिक, प्रेम, रुदन, आनंद, राष्ट्रप्रेम आदि सम्मिलित है। यहीं नहीं, उनकी कई रचनाएं प्रकृति से प्रेरित हैं, जैसे “आकाश भोरा सुरजो तारा”, “आनंदो लोके मोंगल लोके ” आदि।

बंगाली नामों को हिंदी में लिखते हुए कहीं भूल हो जाए तो माफ़ कीजियेगा, क्योंकि मैंने इनके अंग्रेजी संस्करण पढ़े हैं। कहीं भी हिंदी में अनुवाद मिला ही नहीं।

खैर, अब बात करता हूँ उस सब की जिसे मैंने पढ़ा है।

‘क़ाबुलीवाला’ याद है? मैंने ये कहानी शायद दसवीं में पढ़ी थी। आज भी मेरे अंदर कोई अद्भुत साहित्यिक प्रतिभा नहीं है, तो दसवीं में तो मैं साहित्य के मामले में ढोर था। ऐसे में भी, मुझे ‘क़ाबुलीवाला’ के पठान का किरदार इतना ज़्यादा छुआ कि उस चक्कर में 1961 में  इसी नाम से बनी फ़िल्म देख डाली। ज्ञात हो कि ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ इसी फ़िल्म का गाना है।

बलराज साहनी काबुलीवाले का क़िरदार निभाते हुए ये गीत अपने देश के लिए(क़ाबुल/अफ़ग़ानिस्तान के लिए) गा रहे होते हैं। लेकिन आज हम ये गीत हमारे देश के लिए गाते हैं। जब तक पता नहीं था, मुझे लगता था कि ये गीत भी किसी ने भारत के लिए ही गाया होगा।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि लोग किसी के लिए लिखे गीत को किसी और के लिए समर्पित समझ लेते हैं। मेरे कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ने हमें बताया था कि ‘जन गण मन’ असलियत में भारत के लिए नहीं लिखा गया था। रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे 1911 में जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर लिखा था। उन्होंने ये भी बताया कि इस गीत में ‘अधिनायाक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ जैसे शब्द जॉर्ज पंचम लिए इस्तेमाल हुए हैं।

वो प्रोफ़ेसर विदेश से पढ़ के आये थे। अंग्रेजी भी एक दम अंग्रेज़ों की तरह ही बोलते थे। उस वक़्त हमारे पास उनकी बात मानने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। अभी कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भी यही मुद्दा उठाया।

पर थोड़ा बहुत इधर उधर हाथ पैर मारा तो समझ आया कि मेरे प्रोफेसर और कल्याण सिंह दोनों ही बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देने वाले सनकी हैं।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने जन गण मन 1908 में लिखना शुरू कर दिया था। शांति निकेतन में अब भी वह जगह सुरक्षित है जहां बैठ कर टैगोर ने इसके कुछ अंश लिखने शुरू किये। जिन्हें गणित नहीं आती उनके लिए बता दूँ, 1911 और 1908 के बीच 3 साल का अंतर है। जॉर्ज पंचम का दूर दूर तक कोई नामोंनिशान नहीं था जब टैगोर ने ये गीत लिखना शुरू किया।

1911 में कांग्रेस राजनीति में अपना स्थान बनाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने तय किया कि जॉर्ज पंचम से मैत्रीय संबंध बनाये जाएंगे। इसके लिए एक समारोह का आयोजन किया गया जिसकी शुरुआत टैगोर ने राष्ट्रगान से की। उसके बाद जॉर्ज पंचम से मैत्रीय सम्बन्ध बनाने की ओर कदम बढ़ाते हुए एक लेख पढ़ा गया और उसके ठीक बाद रामभुज चौधरी ने ‘बादशाह हमारा’ गीत प्रस्तुत किया जो कि जॉर्ज पंचम के लिए लिखा गया था।

यही नहीं, टैगोर ने खुद इस मुद्दे पर सफाई देते हुए कहा था,”एक ब्रिटिश अफसर मेरा दोस्त था, जिसने मुझे ब्रिटिश सम्राट का गुण-गान करते हुए एक कविता लिखने के लिए कहा। इस बात से रुष्ट हो मैंने ‘जन गण मन’ में ‘भारत भाग्य विधाता’ के बारे में लिखा कि ये देश आदि काल से अपना भाग्य खुद लिख रहा है। वो ‘भारत भाग्य विधाता’ जॉर्ज पंचम तो कतई नहीं हो सकते।” यही नहीं, 1939 में उन्होंने ये तक कह दिया,”जॉर्ज चौथा हो या पांचवा , मैं उसके बारे में क्यों लिखूंगा। इस बात का जवाब देना मेरा अपमान है।”

अगर आप इस गीत को पूरा पढ़ें, तो आखिरी अंतरे में टैगोर ने लिखा है,”निद्रितो भारतो जागो” मतलब सोता हुआ भारत जाग गया है। मैं समझता हूँ कि अगर टैगोर ने जॉर्ज पंचम के सामने ये पंक्ति सुनाई होगी तो साफ़ है कि वो उनकी प्रशंसा नहीं कर रहे थे। वो तो जॉर्ज पंचम की कह के ले रहे थे। टैगोर एक बहादुर कवि थे। जिन्होंने जॉर्ज पंचम के सामने खड़े होकर भारत के स्वाभिमान की बात की।

मुझे समझ नहीं आता कि लोग बिना समझे इतनी बड़ी बात कैसे बोल सकते हैं। जन-गण-मन हमारा राष्ट्रगान है। जिन्होंने इसे देश के राष्ट्रगान के रूप में चुना, वो मेरे कॉलेज के प्रोफेसर और कल्याण सिंह से बहुत बड़े थे। शायद उनके इन आरोपों के पीछे की असली वजह उनके और टैगोर के राष्ट्र के विचार को लेकर मतभेद है।

1908 में टैगोर ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था,”देशप्रेम हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं हो सकता। मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में गिलास नहीं खरीदूंगा और जब तक ज़िंदा हूँ तब तक मानवता के ऊपर देशप्रेम की जीत नहीं होने दूंगा।” उन्होंने ये भी कहा कि “जब मुल्क से प्यार का मतलब भक्ति या पवित्र कार्य में बदल जाए तो विनाश निश्चित है। मैं देश को बचाने के लिए तैयार हूँ लेकिन मैं किसकी पूजा करूँगा ये मेरा अधिकार है जो देश से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

ये बातें टैगोर ने तब कही, जब भारत खुद एक राष्ट्र बनने की राह पर था। लेकिन टैगोर को इस बात की सोच भी थी कि आज़ादी के बाद किन दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा – “आज़ाद देशों में ज़्यादातर लोग आज़ाद नहीं है। वे कुछ लोगों द्वारा तय किये गए लक्ष्यों की तरफ बढ़ते रहते हैं। वे अपनी भावनाओं की लहर को एक भंवर में बदल देते हैं। उसी भंवर की गतिशीलता में एक शराबी की तरह झूमते हैं और इसे ही आज़ादी मान लेते हैं। लेकिन दुर्भाग्य उनका मौत के रूप में प्रतीक्षा कर रहा है। मानव का सच नैतिक सत्य ही होता है। उसकी मुक्ति आध्यात्मिक जीवन में होती है।”

जब मैं छोटा था तो सीमा पर दुश्मन से लड़ना ही जीवन का सबसे बड़ा सच लगता था। आज जब टैगोर की बातें समझ आने लगी हैं तो पता चलता है कि जितना ज़रूरी देश को दुश्मन से बचाना है, उतना ही ज़रूरी देश को भीतरी कुरीतियों से बचाना भी है। जो लोग टैगोर की रचनाओं के इर्द गिर्द षड्यंत्रों का ढांचा बुनते हैं, जो लोग उनकी लिखी रचनाओं में बसे देशप्रेम पर सवाल उठाते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि टैगोर ने जलियाँवाला बाग़ के हत्याकांड के पश्चात उसी जॉर्ज पंचम के द्वारा दी गयी ‘नाइट’ की उपाधि को वापस कर दिया गया।

कई बार सुना है कि ज़िन्दगी में कुछ ऐसा करो कि आप हमेशा के लिए अमर हो जाओ। जब भी ‘जय हे, जय हे, जय हे’ गाता हूँ, मन ही मन टैगोर को धन्यवाद करता हूँ।

“भले ही संयुक्त राष्ट्र घोषित करे या न करे, हमारा राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ विश्व का सबसे अच्छा राष्ट्रगान है और रहेगा।”


विनय

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राह चलते हुए कई ऐसे लोग मिलते हैं, जिनकी बाहें उनके शरीर के रेडियस में समा नहीं पाती। टी-शर्ट की बाजुओं को कन्धों तक समेट कर, बार बार अपने डोलों को निहारते हुए, रॉयल इनफील्ड के पहले से ही दमदार एग्जॉस्ट को और भी फटफटिया बनाते हुए, लम्बी दाढ़ी  और मूंछों पर तांव देते हुए, कई लोग मिल ही जाते हैं।

हमारा विनय इन सब से थोड़ा अलग है। वो अपने डोलों को नहीं निहारता क्योंकि उसके पास है ही नहीं। वो राह चलते लोगों की तरफ देख कर मुस्कुरा देता है। मूछों पर तांव नहीं देता वो, क्योंकि मूंछ थोड़ी कम ही आती है। विनय अपने नाम के अनुरूप, अवांछित पंगे लेने से बचता है।
अपनी एक्टिवा पर मद्धम मद्धम गीत गुनगुनाते हुए ऑफिस जा रहा है विनय। बगल से फट-फट करती रॉयल इनफील्ड पर एक पहलवान-नुमा व्यक्ति निकलता है। विनय का इस ओर ध्यान ही नहीं गया। वो बस मज़े से अपनी एक्टिवा चला रहा है। अगले मोड पर इनफील्ड वाले भैया ज़ोर से दायीं ओर मुड़ने के लिए हैंडल घुमाते हैं पर पीछे से आ रही विनय की एक्टिवा उनका रास्ता रोक लेती है।
“अँधा है?” पहलवान भैया ने कहा।
“नहीं। आँखें तो ठीक है। तभी तो ब्रेक लगा लिया।” विनय ने मज़ाकिया लहज़े में कहा।
पहलवान आँखें दिखाकर निकल जाता है। विनय एक बार फिर गाने पर फोकस करता है।
ऑफिस में पहुँच कर भी विनय अपने खुशनुमा माहौल को बनाये रखता है। थोड़ी देर बाद वह नीचे कॉफ़ी शॉप में जाकर कॉफ़ी आर्डर करता है और एक खाली टेबल की तरफ बढ़ता है। जैसे ही वो कुर्सी पर बैठने वाला होता है, एक लड़का और लड़की उसी टेबल पर आकर बैठ जाते हैं। विनय उस लड़के की तरफ देखता है।
“कोई दिक्कत?” पहलवान भैया पूछते हैं। ज़ाहिर है कि उन्हें अपने डोले पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा है।
“नहीं, कोई दिक्कत नहीं। मैं कहीं और बैठ जाऊंगा।” विनय ने कहा।
लड़का और लड़की आपस में कुछ खुसफुसाये और विनय की तरफ देखकर हंसने लगे। विनय उनकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया।
वो ऑफिस के बाद वापस घर आया। अपनी एक्टिवा घर के बाहर खड़ी की।
जैसे ही वह घर के अंदर आने लगा, पड़ोस के गुप्ता जी का लड़का विनय को रोक कर बोला,”भैया, पापा ने कहा है कि आप अपनी स्कूटी घर के अंदर लगा लीजिये। हमारी कार मोड़ने में दिक्कत होती है।”
विनय ने गुप्ता जी के लड़के के बालों में हाथ फिराया। चुपचाप अपनी एक्टिवा घर के अंदर खड़ी करके दरवाज़ा बंद कर लिया।
दिन ख़त्म हो गया था। बिस्तर सोने के लिए तैयार था। विनय बिस्तर पर लेटा और एक हाथ अपने माथे पर रख लिया और आँखें बंद कर ली।
थप्पड़….. लात…… मुक्का….  धाड़ धाड़ धाड़ धाड़…… 
विनय ने आखें खोली। एक लम्बी सांस ली और फिर आँखें बंद की।
इनफील्ड वाला पहलवान उसके सामने से बाइक मोड़ रहा है। विनय ने सही वक्त पर ब्रेक लगाया। इससे पहले कि पहलवान कुछ बोलता…… 
 
“हरामखोर …! ” विनय ने गाली देते हुए पहलवान के मुंह पर थप्पड़ रसीद दिए। इससे पहले पहलवान कुछ समझ पाता, विनय ने उसकी बाइक पर लात मारी और संतुलन बिगड़ने की वजह से पहलवान गिर गया। विनय ने जूते की नोक से उसके मुंह पर 3-4 बार मारा। फिर बाइक का पीछे देखने वाला शीशा घूमाना शुरू किया। थोड़ी देर में बाइक का शीशा अपने स्टैंड समेत हैंडल से अलग हो गया। 
 
विनय ने ठुड्डी से पहलवान को पकड़ा और कहा,”इन आँखों का काम ही क्या, जब बिना देखे बाइक चलानी है।” 
 
इतना कहकर वह शीशे का स्टैंड पहलवान की आँख में घुसा देता है। 
विनय अपनी आँखे खोलता है। करवट बदल कर बगल वाला तकिया अपनी बाहों में समेत लेता है। और एक बार फिर आँखें बंद करता है।
जैसे ही कॉफी शॉप में लड़का और लड़की उसी के टेबल पर बैठने की कोशिश करते हैं , विनय कुर्सी खींच देता है। जैसे ही लड़का उठ कर मारने के लिए बढ़ता है, विनय उसकी टांगों के बीच लात मारकर उसे फिर गिरा देता है। टेबल पर पड़ा फूलदान उठाता है और उसके सिर पर दे मारता है। 
फिर लड़की की तरफ मुड़ कर मुस्कुराते हुए कहता है,”दीदी, बैठिये न। कॉफ़ी नहीं पिएंगे?”
 
और वह खोलती हुई कॉफ़ी अधमरे पहलवान के मुंह पर उड़ेल देता है। 
 
विनय बिस्तर से उठ खड़ा होता है। मटके से एक गिलास पानी भरता है और एक ही घूँट में पी जाता है। फिर वापस आकर बिस्तर पर लेट जाता है और आँखें बंद कर लेता है।
विनय गली के बीचोंबीच अपनी एक्टिवा खड़ी किये हुए है। गुप्ता जी अपनी गाड़ी लेकर आते हैं और विनय को खड़ा देख कर उसे हटने का इशारा करते हैं। विनय नहीं हटता।  गुप्ता जी गाड़ी से उतरते हैं। जैसे ही वो गाड़ी से उतरे, विनय ने पास पड़ी ईंट उठायी और गाडी का सामने वाला शीशा फोड़ दिया। 
 
फिर जेब से एक सुआ निकाला, और एक एक कर सारे टायर पिचका दिए। फिर गुप्ता जी की गर्दन पकड़ कर बोनट पर लिटा दिया और कहा ,”गली तेरे बाप की है क्या बे?”
सुबह 6 बजे उसकी अलार्म बजती है। वह आराम से बिस्तर से उठता है और अंगड़ाई लेता है। फिर सामने वाली दीवार के सामने जाकर रुक जाता है और अपने हाथ जोड़ लेता है। दीवार पर उसके माँ बाप की तस्वीर टंगी है। 2 साल पहले विनय के माँ-बाप एक्टिवा पर बैठ कर बाजार गए थे। रास्ते में तेज़ी से आती हुई एक होंडा सिटी ने उन्हें उड़ा दिया। बाद में ड्राइवर ने पुलिस के सामने बयान दिया कि वह रास्ते में किसी से लड़ कर आया था। गुस्से में उसे याद ही नहीं रहा कि कब उसकी गाडी स्पीड लिमिट से कहीं आगे निकल चुकी है।
तभी से हर रात विनय सिर्फ सपनों में लोगों पर अपना गुस्सा निकालता है। वह नहीं चाहता कि असल ज़िन्दगी में वह अपना आपा खो दे और उसी तरह किसी के अपनों को उनसे छीन ले जैसे उस होंडा सिटी के ड्राइवर ने विनय से छीना था।
विनय खिड़की खोलता है तो देखता है कि गुप्ता जी का लड़का छत पर घूम रहा है। विनय की तरफ देख कर वह मुस्कुरा कर हाथ हिलाता है और कुछ बोलता है।
विनय उसके हाव भाव को समझ जाता है और उसके गुड मॉर्निंग का जवाब मुस्कुरा कर देता है।
सुबह की शान्ति और रात के तूफ़ान के बीच, विनय का हर दिन इसी तरह बीतता है।

मैं कूल हूँ


THE EDITING STARTUP

“अबे हट! मैं क्यों टाइम वेस्ट करूँ हिन्दी-विन्दी जान कर? इन्ग्लिश का टाइम है ब्रो, हिन्दी यूज़लैस है। इस पर टाइम वेस्ट ना कर। कूल बन, ‘कूल’।” ऐसा कहना था मेरे रूमी भाई साहब का। पर हम भी तो कम बड़े जिद्दी है नहीं, अड़े रहे। “भाई मान लिये इंग्लिश ज़रूरी है, पर मातृभाषा जानना भी तो जानना ज़रूरी है। तुम्हारी कौन सी है?” मेरे ऐसा कहने पर श्रीमान के सर पर बल पड़ गये, भौंएँ संकुचित हो गयीं उनकी। हम भी अपना सर पीट लिये कि किससे पाला पड़ा है।

“भाई मातृभाषा मतलब मदरटंग, ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’, समझे?” ये सुनकर श्रीमान का चेहरा सामान्य हुआ। “अरे तो सीधे सीधे ऐसे नहीं बोल सकता? हिन्दी है मेरी फ़र्स्ट लैंग्वेज।” अब हमको मौका मिला अपना प्वाइंट मारने का। “कहने का मतलब तुमको अपनी ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’ भी लिखनी नहीं आती?” हम पूछे श्रीमान से। सवाल सुनकर वो हमको ऐसा लुक दिये जैसे हम पूछ दिये हों कि पानी गीला क्यों होता है।

“औब्वियसली ब्रो, अब कंपनी वाले मेरे को मदरटंग में थोड़ी ना जॉब देंगे। सब इंग्लिश में होता है अब। क्यों टाइम एण्ड एफ़ोर्ट वेस्ट करूँ हिन्दी पढने में? इट्स यूज़लेस।” ऐसा बोलकर हम पर ‘हे हे हे हे’ कर के हँसने लगे। “तू चोमू है ना, हिन्दी पढ़। कुरते पायजामे में हिन्दी बोलकर जॉब लेना।” एक और ठहाका लगाया साहब ने और किट उठा कर क्रिकेट खेलने निकल गये।

ये सिर्फ मेरे रूममेट की कहानी नहीं है, आजकल मुश्किल से ही कोई ऐसा मिलता है जो किसी भी तरह से मातृभाषा ‘अच्छी’ लिख सकता हो। “भारतीय युवा” (डबल कोट्स पर ध्यान दें) हिन्दी को ‘पिछड़ा’ होने की निशानी मानता है। लेखक अजीत भारती की भाषा में ‘अंग्रेज़ों की टट्टी चाटने’ में हम खुद को बड़ा “कूल” समझते हैं।

ये कहीं से भी गलत नहीं है कि अंग्रेज़ी ज़रूरी है आज के ज़माने मेें। लेकिन इस चक्कर में हम खुद की मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। ये तो वैसी बात हुई, जबतक बच्चे हैं, माँ बाप की उंगली पकड़ कर चले। और जब ज़रूरत नही रही, माँ बाप ‘यूज़लैस’ हो गये और घर में प्रेमिका को घुसा के माँ बाप को ‘पिछड़ा’ और ‘अनकूल’ बोल कर बाहर फेंक दिया।

माने या ना मानें, हमारे युवा; खासकर महानगरों के युवा ऐसे ही होते जा रहे हैं। “मैं कूल हूँ” का टैग लगा कर हमारे इतिहास को यूज़लैस बताते हुए आगे निकल जाना ही अब कूल है।

ऐसा है, तो हम तो सीना ठोक कर खुद को चोमू बोलते हैं।


तन्हाई की गूँज


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मैं भी कभी अकेली थी। मैं भी कभी तन्हा थी।
अकेलेपन का सहारा ही बस अब रह गया था ज़िन्दगी में।

एक आवाज़ मेरी भी थी, एक ख्वाब मेरा भी था।
जाने अनजाने में ही मैंने अपनी पहचान ढूंडली थी।
उस गूँज में जिसकी न आवाज़ था, न कोई धुन ।

आवाज़ मैं अपनी कहाँ ढूंढ़ती, मेरी तरह मेरे रस्ते भी खोए हुए थे ।
न मंज़िल का पता था, न इस रस्ते का और न ही मेरे इस सफ़र का।

अपने आप को शायद खोना इसे कहते हैं।

मैंने अपने आपसे अब कह लिया था की मुझे अपने आप को ढूँढना होगा और मैं अपनी पहचान को इस तन्हाई के गूँज में ढूढंथी हुई चले जा रही हूँ।


6 प्वाइंटर – 9 प्वाइंटर


THE EDITING STARTUP

रिज़ल्ट आ गया इस सेमेस्टर का। जहाँ देखो वहाँ हड़कम्प मचा है। कोई पास हो जाने पर खुशियाँ मना रहा है तो कोई टॉप ना होने पर गम के आँसू बहा रहा है। पर एक बात तो पक्की है, ‘रिज़ल्ट’ ज़रूर आ गया है।

अब हमारे एक साथी हैं, जिन्होंने अपना पूरा समय बड़ी शिद्दत के साथ शरलॉक और ब्रेकिंग बैड को दिया। उनका 6.3 आया है। एक सिंगल पोज़िशन में बैठ कर सबको गरिया रहें हैं, कन्टिन्युअसली। ‘सालों को कोई काम नहीं मिलता? जब देखो तब किताबों में घुसे रहते हैं। मेरा रिजल्ट तो इन्ही ने खराब कराया है।’ मतलब कि सही है। खुद घुसे रहो ‘लैपी’ के पिछवाड़े में, और मौके पर पूरी गल्ती दूसरों के मत्थे मढ दो। सही है।

एक और साथी है हमारे। पूरे सेमेस्टर में तीन दिन क्लास गये हैं। बाकी टाइम दिन भर सोना और रात भर हॉस्टल वाई-फाई का बर्बरता से शोषण करना, यही इनकी दिनचर्या, ‘रूटीन’ रही है पूरे सेमेस्टर। ‘भाई ये फ़ुद्दू सी चीज़ें मण्णे ना पढनी। मैं तो एयरोस्पेस पढने आया हूँ।’ पूछने पर यही जवाब रहता है उनका। रिज़ल्ट का रत्ती भर असर नहीं पड़ा जवाब पर। अब अरबपति बाप की औलाद हो, तो ना पढो वो भी चलता है।

क्लास टॉपर को ही ले लीजिये हमारे। रिज़ल्ट के बाद सर पकड़ कर सीढियों पर बैठा था। पूछने पर चेहरा ‘माइनस’ में मूव कर गया बंदे का। ‘भाई, बस 8 सब्जेक्ट्स में ‘O’ आया है। 4 बाकी रह गये। अब तो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा मैं।’ ये लीजिये। लड़के को 9.66 GPA आया है, पर फिर भी संड़ रहा है। मतलब हद्द होती है भाई! 

खैर, दीज़ वेयर सम टिपिकल एग्ज़ाम्पल्स ऑफ हाऊ पीपल रिएक्ट टू देयर रिज़ल्ट्स। हर किसी का बर्ताव कहीं ना कहीं उसके जीवन के प्रति उसकी सोच को उजागर करता है। अब ऐसे में हम और आप कहाँ है, और हमारी सोच हमारे जीवन को किस दिशा में ले जा रही हैं ये हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता।