चोमूनामा 2


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ज़माना ‘कूलपंती’ की ओर बढ़ता दिख रहा है। आज का युवा ‘कूल’ बन रहा है। हम नॉर्मल वाले ‘कूल’ की बात नहीं कर रहें हैं। हम ऐसे लोगों के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो फ़ेल होने की शेखी बघारते हैं, जो सामने वाले को ‘गरिया’ के खुद को कूल समझते हैं, जो माँ बाप के पैसे की दारू सिग्रेट फूँक कर खुद को ‘कूल’ समझते हैं। मेरी डिक्शनरी में ‘कूल डूड’ & ‘हॉट चिक’ का प्रयोग ऐसे ही लोगों के लिये किया जाता है। 

आज कूल डूड़स के बारे में बात नहीं करनी। आज बात करते हैं उनके ‘पोलर अपोज़िट्स’-चोमूओं की। यूँ तो चोमू कभी भी, ध्यान रखें; कभी भी खुद को कूल डूड्स से कम नही मानते, पर कुछ ऐसी चीज़ें हैं जहाँ चोमू भी चुप रह जाते हैं। उनमे से एक है ‘प्रेमिका’। 

चोमू भी इंसान ही होते हैं, और ज़िंदगी में एक अदद लड़की की तलाश उन्हें भी होती है। पर समस्याएँ खड़ी तब होती है जब हमारा चोमू ‘मार्केट’ में उतरता है। पहली बात, तड़क भड़क से भरपूर कूल डूड्स के सामने अपना चोमू कहीं ‘इन्विज़िबल’-गायब सा हो जाता है। ‘कूल’ ज़माने के फैशन और तेईस चोंचलों की बराबरी करना उसके लिये संभव नहीं।

अगर गलती से किसी मोहतरमा को कोई चोमू पसंद भी आ गया तो चोमू बेचारा घबरा जाता है, ‘ओवरथिंकिंग’ की प्रथा को मानते हुए ‘फ़र्स्ट कॉन्टैक्ट’ करने से घबराता है। कहने का मतलब किसी भी मोहतरमा से बात की शुरूआत करने में हमारे चोमू की फट जाती है।

अगर मान लिया जाय कि किसी चमत्कार से भावी युगल के बीच संवाद शुरू हो भी जाय, को चोमू यही चाहता है कि उसे कुछ ना करना पड़े, और फिल्मी हिरोईन की तरह सरसो के खेत में बाँहे फैला कर स्लो मोशन में भागती हुई लड़की उससे प्यार का इज़हार कर दे।

इतने में ऊपर वाला भी खीज़ के चोमू से अपनी दया दृष्टि हटा लेता है, और चोमू फिर ‘सिंगल’ रह जाता है। लेकिन…

“सब समझ रहे हैं। सिग्रेट दारू अ सिक्स पैक नहीं है तब न… जिस दिन सही में तैयार होके आ जायें तो यहीं फ्लैट हो जाएगी। वैसे भी इस दिल के प्यार की हकदार कोई और है…”


सौ चिट्ठियाँ: पार्ट 1


EDITOR: ADITYA PRAKASH

रात के करीब 1 बज रहे थे। सर्दी का मौसम था तो हल्की ओंस गिर रही थी। सड़क पर कुछ कुछ देर में कोई गाडी निकल रही थी। तभी…

एक व्यक्ति जैकेट, जीन्स और गुलबंद पहन कर, पीठ पर बैग टाँगे हुए सड़क के किनारे पहुंचा। सड़क किनारे बोर्ड लगा था जिसपर लिखा था – “शिक्षामंत्री अतुल सिंह का निवास स्थान दाईं और है।”

वह दाईं ओर बढ़ा और दरवाज़े के सामने जाकर रुक गया।
“भाईसाहब!”
दरवाज़े पर बैठा गार्ड नींद में बोला,”साहब घर पर नहीं है।”
“भाईसाहब, उठिये तो। मुझे आपके साहब से ज़रूरी बात करनी है। “

गार्ड की नींद खुल चुकी थी। झल्लाते हुए उसने घडी की ओर देखा।
“रात के 1 बजे कौन सी ज़रूरी बात होती है बे! भाग यहां से।” गार्ड ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।
“आप समझने की कोशिश करें। मेरा आपके साहब से मिलना बहुत ज़रूरी है।”
गार्ड ने डंडा उठाया और धमकाते हुए बोला, “भाग यहां से। वरना टाँगे तोड़ दूंगा।”
“अरे…. सुनिये तो… भाईसाहब…..”

गार्ड ने धक्का देकर उसे गिरा दिया। वह खड़ा हुआ। गार्ड की तरफ बढ़ा। गार्ड किसी भी हमले के लिए तैयार था। ठीक गार्ड के सामने आते ही, एक दम से वह उसके बगल से दौड़ता हुआ दरवाज़े के अंदर घुस गया। गार्ड उसके पीछे भागा।
“चोर…. चोर…. घर में चोर…. घुस गया.. चोर…. “

अंदर बैठे हुए बाकी गार्ड उसके पीछे भागे। एक ने अपनी लाठी उसके पैरों की तरफ फैंकी। दोनों पैरों के बीच लाठी फंसने से वह व्यक्ति गिर पड़ा। सबने मिलकर उसे दबोच लिया। सारी धरपकड़ में मंत्री जी की नींद खुल गयी। वो अपने कमरे से बाहर आये और आँगन में पहुँच कर देखा कि एक 25-26 साल के नौजवान को सभी गार्ड पकड़ कर खड़े हैं।

“क्या हो रहा है यहां? कौन है ये?” मंत्री जी ने पूछा।
“कुछ नहीं जनाब। चोर है। घर में जबरन घुसने की कोशिश कर रहा था।” गार्ड ने कहा।
“इसे लेकर जाओ यहाँ से।” मंत्री जी मुड़े और वापस अंदर जाने लगे।
“रुकिए मंत्री जी…” लड़के की आवाज़ सुनकर मंत्री रुके।
“आपकी जान खतरे में है।” मंत्री जी के कान खड़े हो गए।
वो पीछे मुड़े।

“तुम्हारा नाम क्या है?” मंत्री जी ने पूछा।
“समर शर्मा।” लड़के ने जवाब दिया।
“तुम वही समर शर्मा हो जो…”
“जी, मैं वही समर हूँ जिसने पिछले 1 महीने में आपको 100 से ज़्यादा पत्र लिखें हैं। आपकी जान खतरे में है मंत्री जी।” लड़के ने जवाब दिया।
“लड़के को अंदर आने दो। ” मंत्री जी मुड़े और अंदर चले गए।

समर सोफे पर थोड़ा आगे की ओर खिसक कर बैठा था। हथेलियाँ आपस में गुथी हुई थी। उसके पैर हिल रहे थे। चारों तरफ मंत्री जी की तसवीरें लगी थी।
अतुल सिंह कमरे के अंदर आते हैं। उनके पीछे कमरे में उनका पीऐ जसवीर अरोड़ा और एक इंस्पेक्टर कमरे में घुसते हैं।

“वीरेन्द्र, यही वो लड़का है जिसकी चिट्ठियों के बारे में जसवीर जी ने आपको बताया था। आप तो कुछ करते नहीं। समर जी आये हैं हमारी रक्षा करने!” अतुल ने इंस्पेक्टर की ओर देखते हुए कहा।
वीरेन्द्र समर की ओर देखता है।
“आप क्या करते हैं समर जी।” वीरेन्द्र ने पूछा।
“मैं दैनिक समाचार में पत्रकार हूँ सर। कई दिनों से मैं मंत्री जी के चुनाव प्रचार को कवर कर रहा हूँ। आपकी रैलियों में आपके कारवां के साथ ही चलता हूँ। आपकी पिछली रैली में आप जब भाषण दे रहे थे, तो किसी ने मेरा बटुआ चोरी कर लिया। 5000 रुपये थे जनाब! लाइसेंस भी था। “
समर चुप हो गया।

“हाँ, हम तुम्हें तुम्हारे पैसे दे देंगे। आगे बोलो।” अतुल ने कहा।
“नहीं मंत्री जी। पैसे तो मिल गए। मतलब, वो बटुआ चोरी हुआ था। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर मिल गया। सारे पैसे, लाइसेंस… सब उसी में था।  लेकिन…”

“एक बार और तूने ये नाटकीय चुप्पी साधी, तो मैं तुझे गोली मर दूंगा।” वीरेन्द्र ने कहा।
“माफ़ कीजिये। जब वो बटुआ दोबारा मिला तो उसमें ये मिला।”

समर ने एक कागज़ वीरेन्द्र को दिखाया। वीरेन्द ने उसे पढ़ा तो उसके चहरे का रंग लाल से पीला और पीले से सफ़ेद हो गया। उसने वह कागज़ अतुल को दिखाया। कागज़ पर काले रंग की शाही से अनगढ़ अक्षरों में लिखा था –
अतुल सिंह की मौत तय है।
सिर में गोली मारूँगा उसे।
अगर चाहते हो कि एक से ज़्यादा जानें न जाएँ,तो इसे अपने अखबार में छाप देना। 

“क्या बकवास है! ऐसी चिट्ठियाँ हमें हर रोज़ मिलती हैं। इसलिए ही तो हमने तुम्हारी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया था।” अतुल ने कहा।
“जी। इस घटना के बाद मैंने सिर्फ एक ही चिट्ठी भेजी थी। बाकि की 99 चिट्ठियां, इसके मिलने के बाद भेजी।”

समर ने एक और कागज़ अतुल के हाथों में दे दिया। जसवीर और वीरेन्द्र मंत्री जी के पीछे खड़े होकर उसे पढ़ने लगे।
रोहतक की रैली में पीऐ जसवीर को मारूँगा।
उससे दुश्मनी नहीं है।
लेकिन शायद इस बार तुम्हें यकीन हो, कि मैं मज़ाक नहीं कर रहा।

“ये मुझे मेरे दफ्तर में भेजी गयी थी।” समर ने कहा।
सभी ने जसवीर की तरफ देखा। वो काँप रहा था। अतुल ने जसवीर को अपने पास बैठाया।
“परेशान मत हो जस्सी। कुछ नहीं होगा। ये सब ऐसे चलता ही रहता है। कुछ नहीं होगा तुझे।” अतुल ने समझाया।
“वीरेन्द्र इसे बाहर छोड़ के आ। इसके साथ एक पुलिस वाले को भेज।” अतुल ने वीरेन्द्र से कहा।

जसवीर और वीरेन्द्र दरवाज़े की ओर बढे।
“समर सच कह रहा है मंत्री जी।”

जसवीर अतुल की तरफ मुड़ा।
“आज जब आपका फ़ोन आया था, तो मैं जानता था कि कुछ अनहोनी होने वाली है। पिछले कुछ दिनों से मेरे घर के आसपास मैं अजनबियों को देख रहा हूँ। कई दिनों से फ़ोन पर घंटी बजती है पर उस तरफ से कोई जवाब नहीं आता। मुझे लगता है कोई मुझ पर नज़र रखे हुए है।” जसवीर ने कहा।

जसवीर की आँखों से आंसू बह रहे थे। अतुल ने जसवीर को गले लगाया और उसका हौंसला बढ़ाने की कोशिश की।
“तुझे कुछ नहीं होने दूंगा जस्सी। तू बिलकुल मेरे भाई जैसा है। वीरेन्द्र इसको छोड़ के आ। “
वीरेन्द्र जसवीर को बाहर छोड़ के आया। कमरे में अतुल और समर बैठे थे।
वीरेन्द्र ने कहा – “सर, मुझे लगता है कि समर जी अब जा सकते हैं। उनका काम हो चुका है।”
अतुल ने हाँ में सिर हिलाया। समर खड़ा हुआ और अतुल को नमस्ते करके बाहर चला गया।

“ये सब चुनाव को लेकर किया गया एक ड्रामा है।” वीरेन्द्र ने समर के जाते ही कहा।
“आप मुझे थोड़ा समय दीजिये। मैं पता लगता हूँ ये गब्बर सिंह है कौन। आप चिंता मत कीजिये।” उसने अतुल से कहा।
“वो तो ठीक है वीरेन्द्र, लेकिन जसवीर?” अतुल ने पूछा।
“जनाब, मुझे जसवीर की चिंता नहीं है। पहले ये तो पता लगा ले कि हमारे पत्रकार महोदय की बातों में कितना दम है।” वीरेन्द्र ने अतुल की तरफ मुस्कुराते हुए कहा।

“भाइयों और बहनों, आप लोगों ने पिछली बार मेरा साथ देकर, मुझ जैसे एक गरीब बाप के बेटे को शिक्षामंत्री के पद पर बिठाया। ये आपके प्यार और सम्मान का ही फल है कि आज सिर्फ हमारे राज्य में नहीं, बल्कि पूरे देश में अतुल सिंह के नाम का डंका बज रहा है।”
अतुल सिंह की रैली चल रही थी। लोग अतुल की हर बात पर तालियां बजा रहे थे। आगे खड़े कुछ कार्यकर्ता ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे। जसवीर सिंह अतुल के पीछे मंच पर खड़े थे।

“क्या हाल है पत्रकार साहब?” समर जो अतुल का भाषण रिकॉर्ड कर रहा था, पीछे मुड़ा।
इंस्पेक्टर वीरेन्द्र समर के पीछे खड़ा था। समर ने वीरेन्द्र से हाथ मिलाया।
“कैसे हैं दरोगा जी! सब ठीक ठाक?” समर ने हल्के फुल्के अंदाज़ में कहा।
“बस लगे हुए हैं आपकी चौकीदारी में। पिछले कई दिनों से आप दिल्ली बहुत जा रहे हैं। क्या बात है?” वीरेन्द्र ने पूछा।
“आप मेरी जासूसी कर रहे हैं?” समर ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा।
“अरे नहीं सर। अब अगर कोई मंत्री जी पर हमला करने की खबर पहले आपको देता है तो हमें आप पर नज़र रखनी ही पड़ेगी।” वीरेन्द्र के चहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।
“आप का जो मन आये वो करें। पर मैं चाहूंगा कि मुझसे ज़्यादा ध्यान आप मंत्री जी और उनके पीऐ पर लगाएं।” समर ने कहा।
“आप पुलिस को मत बताइये कि पुलिस क्या करे समर जी। अपना काम करिये आप।” वीरेन्द्र ने समर की तरफ गुस्से से देखा। समर वापस मंच की ओर मुड़ गया।

तभी…
एक कानफोड़ू आवाज़ ने सबको चौंका दिया। भीड़ के बीचोंबीच खड़े एक आदमी ने मंच की तरफ बन्दूक तान रखी थी। उसने एक ओर गोली मंच की ओर चलाई।

अतुल और मंच पर खड़े सभी लोग नीचे झुक गए। वीरेन्द्र और समर दोनों उस आदमी की तरफ दौड़े। भगदड़ के बीच हमलावर बहुत तेज़ी से भाग रहा था। तभी समर को एक विचार सूझा। उसने पास खड़े एक पुलिस वाले का डंडा लिया और हमलावर के पैरों के बीचोंबीच मारा। हमलावर ठीक वैसे ही लड़खड़ा कर गिर गया जैसे समर मंत्री जी के घर पर गिरा था।

वीरेन्द्र ने उस हमलावर को खूब पीटा और बन्दूक उसके सिर पर तान दी।
“सर, मुझे मत मारिये सर। मैं तो बस हवा में गोली चला रहा था, सर। एक व्यक्ति ने मुझे पैसे दिए थे हवा में दो राउंड फायर करने के लिए। उस आदमी ने रोते हुए अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाल कर दिखा दी।”
वीरेन्द्र और समर ने एक दूसरे की तरफ देखा। दोनों ने मंच की और दौड़ लगायी। अतुल को मंच के पीछे बने सुरक्षागृह में ले जाया गया था। वीरेन्द्र रास्ते में सभी को धक्का मारते हुए आगे बढ़ा और समर उसके पीछे पीछे दौड़ता चला गया। वो दोनों सुरक्षागृह के अंदर पहुंचे।

“मंत्री जी, जसवीर कहाँ है?” वीरेन्द्र ने हाँफते हुए पूँछा।
“मैंने उसे मंच से उतरने के बाद नहीं देखा।” अतुल ने कहा।
“मैंने उन्हें शौचालय की ओर जाते देखा था।” एक सुरक्षाकर्मी ने कहा।
वीरेन्द्र और समर दोनों बाहर भागे। वीरेन्द्र ने अपनी गन निकाल ली। शौचालय का दरवाज़ा अंदर से बंद था। वीरेन्द्र उसे तोड़ने की कोशिश करने लगा। तभी समर ने कहा –
“वीरेन्द्र, इधर देखो।”
उसने एक रोशनदान की ओर इशारा किया।
“मैं तुम्हें पकड़ता हूँ। तुम ऊपर चढ़ जाओ।” समर ने वीरेन्द्र से कहा।
वीरेन्द्र की भारी कद काठी की वजह से समर उसे संभाल नहीं पाया और वह गिर गया। इस पर वीरेन्द्र ने कहा, “मैं तुम्हें पकड़ता हूँ, तुम ऊपर चढ़ो। अंदर से दरवाज़ा खोल देना।”

वीरेन्द्र के हाथ पर पैर रख कर समर रोशनदान पर चढ़ा। वीरेन्द्र दरवाज़े की तरफ दौड़ा।
कुछ ही देर में दरवाज़े की कुण्डी खुलने की आवाज़ आयी। समर के दरवाज़ा खोलते ही, वीरेन्द्र ने अंदर दौड़ लगा दी। उसने एक एक कर सभी शौचालयों के दरवाज़े खोल दिए।

पहला दरवाज़ा, दूसरा, तीसरा, चौथा… और फिर पाँचवाँ दरवाज़ा खुला।

जसवीर सिंह की लाश अंदर पड़ी थी। उनका गला तेज़ धार वाले हथियार से रेत दिया गया था। समर और उसके पीछे बाकि के सुरक्षाकर्मी अंदर आये। अतुल सिंह भी अंदर आये। सामने जसवीर की लाश देख कर उनका चहरा सफ़ेद पड़ गया।
“गोली सिर्फ ध्यान बटाने के लिए चलायी गयी थी। उसे पता था कि हमारा सारा ध्यान उस हमलावर की तरफ हो जाएगा। उसे इस बात का भी अंदाजा था कि ऐसे हालातों में सुरक्षाकर्मी आपको अकेले अंदर ले जाएंगे और जसवीर अकेले होंगे। हमारा अंदाजा गलत था मंत्री जी। वो हम सब से दो कदम आगे निकला।” वीरेन्द्र ने गंभीर आवाज़ में कहा।

समर मुड़ा और बाहर जाने लगा। अतुल ने उसे रोका।
“समर, कहाँ जा रहे हो?”
“उसने अपने आपको सही साबित कर दिया मंत्री जी। जसवीर सिंह की जान बच सकती थी। मुझे ये पहले ही कर देना चाहिए था।” समर ये कहकर बाहर चला गया।

अतुल और वीरेन्द्र जानते थे कि समर किस बारे में बात कर रहा है।
अगले दिन के दैनिक समाचार के फ्रंट पेज की सबसे बड़ी खबर थी –
“मंत्री अतुल सिंह की जान खतरे में। हमलावर ने धमकी देकर पीऐ जसवीर की हत्या की।”


रोंदू


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कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी बस या रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे हैं, और सामने बैठा व्यक्ति अपनी आँखों की नमी को पौंछ रहा हो? क्या आपने किसी बुज़ुर्ग को रफ़ी के गाने सुनते हुए, भावुक होते देखा है? बाकियों को छोड़िये, क्या स्कूल या कॉलेज में आपके किसी दोस्त को मेज़ पर सिर नीचे किये बैठे देखा है?

रोना, एक भावनात्मक प्रक्रिया है। इंसानों के अंदर स्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने की क्षमता होती है। हम जब बहुत दुखी, बहुत गंभीर, या कई बार बहुत खुश भी होते हैं, तो आँखों से आंसू बह निकलते हैं। लेकिन क्या रो देना, कमज़ोर होने का चिन्ह है? कुछ लोग सोचते हैं कि रोना कमज़ोर होने का प्रतीक है। रोना तो शायद, सिर्फ लड़कियों का काम है। एक लड़का, एक आदमी कभी रो नहीं सकता।

मैं ऐसा नहीं मानता।

मुझे इस बारे में कोई तकनीकी जानकारी नहीं है, पर मेरे अनुसार रोना दो तरह का होता है – एक वो रोना, जिसमें अत्यधिक ख़ुशी, अत्यधिक ग़म, या किसी भी तरह के भावनात्मक चरमोत्कर्ष पर आँखों से आंसू निकल आते हैं। दूसरा रोना, वो रोना जब आप किसी चीज़ को बहुत वक्त तक अपने अंदर दबा के रखते हैं, और दबाते दबाते एक ऐसी स्थिति आती है जब आप का गला रुंध जाता है और आँखे भर आती हैं।

पहले “पहले” रोने की बात कर लेते हैं। बड़े से बड़ा तीस मार खाँ हो, कोई बन्दा जो अपने आपको सबसे बड़ी तोप समझता हो, जिसने सारी उम्र लठ बजाने के अलावा कोई काम नहीं किया, अपनी बेटी की शादी में रो देता है। ये भी बड़ी बात है यारों! बेटी की शादी के सभी कार्यक्रमों में हर कोई एक दो बार रो लेता है, सिवाय बाप के। पिता आदमी है। घर का बड़ा है। उसे सभी को संभालना है। बहुत सारे काम करने हैं। लेकिन जब वो अपनी बेटी को विदा होते देखता है तो 60 वर्ष का बूढा बाप 6 वर्ष के बच्चे की तरह रोने लगता है। बेटी की विदाई पर रोना, उस तीस मार खाँ, उस तोप को कहीं भी कमतर नहीं कर देता। वो उस वक्त की नज़ाकत है।

मुझे ये कहते हुए बिलकुल शर्म नहीं है कि मुझसे ज़्यादा मेरी बहन मेरे पिता का ख्याल रखती है। इस बात में कोई झूठ नहीं है की बेटियां पिता के ज़्यादा करीब होती हैं। माँ जब बीमार होती है, तब पिता भूखे पेट न सोये, इस बात का ख्याल घर की  बेटियों को पहले होता है। और इसीलिए शायद, उसी बेटी की विदाई पर पिता को लगता है कि शायद उसका एक “रखवाला” काम हो गया है। जन्म से लेके अब तक, सारी यादें उसकी आँखों के सामने घूमती है और एक ही पल में घर का सबसे बड़ा मर्द भरी भीड़ में बिलख कर रोता है।

किसी अपने के दुनिया छोड़ जाने पर, आप कितने भी मज़बूत क्यों न हो, आपकी आँखे नम हो ही जाती हैं। आप जैसे ही देखते हैं कि जाने वाला अपने पीछे जिन्हें छोड़ गया है, उनका क्या हाल है, आप का मन अंदर ही अंदर पलटियां खाने लगता है। आप दुनिया को, वक्त को, ज़िन्दगी को, कोसते हैं। और आप रो देते हैं।

गलत नहीं है। रोना, और किसी के लिए रोना, साबित करता है कि आप कितने सच्चे हैं, और लोगों से आपका नाता कितना सच्चा है। आप इसलिए नहीं रोते क्योंकि आप एक कमज़ोर इंसान है, आप इसलिए रोते हैं क्योंकि आप “इंसान” हैं।

अब दूसरे वाले रोने की बात कर लेते हैं। अँधेरे कमरे में अपने बिस्तर पर अकेले बैठा एक लड़का, अपनी ज़िन्दगी के हर छोटे बड़े अनुभव को याद करता है। वो दिन-ब-दिन कोशिश करता है कि अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बना सके। लेकिन हर रोज़ ज़िन्दगी के थप्पड़ अपने गाल पर खाकर घर लौट आता है। कई देर तक खुद को रोकता है, फिर एक दम से उसकी आँखों से आंसू बहने लगते हैं।

पहले और दूसरे वाले आंसुओं में फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वाले आंसुओं को पौंछने के लिए आसपास के लोग होते हैं। दूसरे वाले आँसू आपको खुद पौंछने पड़ते हैं। और उसके लिए हिम्मत चाहिए यार! दूसरे वाले आंसुओं के लिए हिम्मत चाहिए।

“वो इस बात का सबूत नहीं है कि आप कमज़ोर हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि आप बहुत देर तक मज़बूत रहे।”

कई तरह की परेशानियां है। हर बंदे की अपनी परेशानियां हैं। दिन रात वो उनसे लड़ता है। दिन में असल में, रात को सपनों में। लड़ते हुए आँसू छलक जाना लाज़मी है। लेकिन लड़ते हुए रोना, आपको और लड़ने की ताकत देता है। वो एक संकेत है कि सबसे बुरा वक्त आप देख चुके हैं, अब जो भी होगा अच्छा होगा या फिर कम बुरा होगा।

कई बार कोई कारण नहीं होता। आपको बस रोना होता है। आप अपनी ज़िन्दगी में हर चीज़ से इतने ज़्यादा भड़क खाये बैठे होते हैं, कि आपको ज़रूरत होती है आंसुओं के ज़रिये अपने आप को ठंडा करने की। और इसलिए, इसमें लड़का या लड़की होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप रोना चाहते हैं, तो रो दीजिये। मन हल्का होगा। नींद भी अच्छी आएगी। कुछ पल के लिए ये सुकून भी रहेगा कि आज रो लिए, कल एक बार फिर कोशिश करते हैं। तुक्का लग गया तो ठीक, वरना फिर से रो लेंगे।

हंसी और आँसू , दोनों की एक ही खासियत है। दोनों मुफ्त में मिलते हैं।

 


कलियुग की दोस्ती- गालियों की रासलीला


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बदलते ज़माने के साथ ‘ट्रेंड’ बदलता है, लोग बदलते हैं, लोगों की सोच बदलती है, बात करने का लहज़ा बदलता है, शब्दों की अहमियत बदलती है। आज के युवाओं को को देखकर ज़रा सा भी शक नही होता कि हम कलियुग मे हैं। घोर कलियुग।

भारत में एक ऐसा समय हुआ करता था जब एक झूठ बोलने से लड़ाइयाँ हो जाती थी। किसी का अपमान महाभारत जैसे महासमर का कारण बन जाता था। जब शब्दों की महत्ता होती थी। ‘प्राण जाय पर वचन ना जाय’। भले ही आज का भारत बदल चुका हो, पर हर चीज़ की एक सीमा, मर्यादा होती है।

मतलब ‘व्हॉट द हेक डूड? ऐसी बुड्ढों जैसी लैंग्वेज़ कौन समझेगा? आई मीन, इट्स ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरी, या नो?’ हमारे लौंडे आजकल ऐसी ही बोली समझते हैं। जब तक हरेक लाईन में चार पाँच अंग्रेज़ी शब्द ना ठेलो, सामने वाला ेऐसे बात करेगा जैसे आप “देहाती भुच्च” हैं। चलो भाई मान ली तुम्हारी बात। बदलते टाईम के साथ लहज़ा बदलता है। तुम जैसे बोलो, तुम्हारी मर्ज़ी।

लेकिन ये लौंडे और मोहतरमाएँ यहाँ ‘हॉल्ट’ हो जाएँ तब तो! पर इतने में हमारे ‘कूल डूड्स’ और ‘हॉट चिक्स’ खुश हो जाएँ ये संभव कहाँ। इन लोगों को तबतक खुशी नहीं मिलती जबतक ये हरेक लाइन में कम से कम एक बार किसी की माँ-बहन एक न कर दें।

आज कल का तो फैशन बन पड़ा है, एक दूसरे माँ-बहन की गालियाँ देने का। जो जितनी ज़्यादा दे, वो उतना ही ‘कूल’ माना जाता है। पूछो, तो पता चलता है कि ‘दोस्तों के बीच चलता है। हक है हमारा!’ मतलब जो जिसकी जितनी ज़्यादा माँ-बहन करे वो उतना ही अच्छा दोस्त। ये लॉजिक मेरी समझ के तो बाहर है।

दोस्त की माँ अपनी माँ जैसी और दोस्त की बहन खुद की बहन जैसी। अगर कोई दोस्त बने, तो यही होता है। अब ऐसे में आप ही सोच के बताएँ, आप किस मुँह से खुद की माँ बहनों को गाली देते हैं? किस सोच से इसे ‘मज़ाक’ मानते हैं? अगर आपका ‘मज़ाक’ इतना गिरा हुआ है, तो भगवान जाने आपका चरित्र, संस्कार, मानसिकता किस दर्ज़े की है।

खूब माँ-बहन की गालियाँ दीजिये और अपने सांस्कारिक खोखलेपन को पूरी दुनिया को दिखाइये।
हैप्पी न्यू ईयर।


डरपोक


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आज मन नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है जैसे चार दीवारी के अंदर बंद हूँ, और दीवारें मेरी ओर बढ़ रही हैं। कोई बाहर से इन दीवारों पर नाखून रगड़ रहा है। सब धुंधला दिखाई दे रहा है। कुछ समझ नहीं आ रहा। 

इंसान को जब तक अपनी कमियों का न पता चले, तब तक वो कमज़ोर रहता है। लेकिन जब इंसान को अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी का पता लग जाए, तब भी वह तबाह हो जाता है। इस डर में, कि कहीं उसका डर सच न हो जाए। मेरा सबसे बड़ा डर यही है कि मेरा सबसे बड़ा डर कहीं सच न हो जाए। 

बहुत सी चीज़ों से डर लगता है। चीज़ों में दुर्घटनाओं की परिकल्पना करने लगा हूँ। सबसे ज़्यादा डर इस वक्त से लगता है। घडी की सुई वक्त ही नहीं दे रही। चली जा रही है। और उसके साथ दौड़ते दौड़ते कहीं ठोकर खा गया तो? ब्लैक होल का वजूद ब्रम्हांड में कहाँ है? मेरे दिमाग में। मेरी आँखों के सामने। एक बड़ी सी गुफा है, जो सब कुछ निगल रही है। वक्त के साथ दौड़ते हुए कहीं इस गुफा में गुम हो गया तो? अंदर ही अंदर खिंचा चला जाऊंगा। दीवारों से टकराने का खौफ, ठोकर खाकर न जाने किसी तेज़ धार वाले पत्थर पर गिरूँगा या जब गिरूँगा तो नीचे ज़मीन होगी ही नहीं?

अपनी कमज़ोरी का पता लगाने का बड़ा शौक था। आज बस डर लग रहा है। ये लिखते हुए भी उंगलियां काँप रही हैं। सिद्धार्थ में दम था। जब दुनियादारी का ज्ञान हो गया तो उसमें वो ताकत थी कि सबको भूल कर निर्वाण की ओर चले। मैं सिद्धार्थ नहीं हूँ। सिद्धार्थ होना बहुत मुश्किल है। दुनियादारी का तमाचा मुंह पर खाकर, इससे भागने की बजाये, अपनी दुनिया को बचाने के लिए खड़ा हूँ मैं। काश कोई मुझे नहीं जानता। काश मेरा कोई नाम नहीं होता। काश मैं भी भीड़ का एक हिस्सा होता। मुझसे अब नहीं लड़ा जाएगा। मुझसे अब विरोध नहीं होगा। मैं हमेशा से कमज़ोर था। आज असहाय हो चुका हूँ। मुझे अब ज़िन्दगी में कुछ विशेष नहीं चाहिए। 

मुझे मेरी ज़िन्दगी में सब सामान्य चाहिए। बस, आज मन नहीं लग रहा है। डरपोक कहलाने में ही भलाई है। जो खुद को बहादुर समझते हैं, उनको मेरी शुभकामनायें।


मोड़-ऐ-मुलाकात


EDITOR: PANKAJ GAUTAM

घड़ी की सबसे तेज भागती सुई को देख रहे हो ना? भाग तो ऐसे रही है कि ना जाने इसकी कौन सी ट्रेन छूटने वाली हो! शायद भूल जाती है बार बार कि हर 60 सेकंड में इस घूम फिरकर एक ही प्लेटफार्म पर वापस आना है। वापस से वही रेस शुरू करने के लिए, जो कभी खत्म नहीं होगी। हालाँकि, इस रेस में उसकी मुलाकात होती है, कभी घण्टे की सुई से तो कभी मिनट की सुई से… बस पल भर के लिए।

तुम्हें पता है कि ये सुई ऐसे ही भागती रहेगी और देखते ही देखते 5 साल, फिर 10 साल बीत जायेंगे ,ऐसे ही साल, महीने, दिन, वार, घण्टे, मिनट और सेकंड्स बीतते रहेंगे। वक़्त की आंधी में यादों की डायरी पर, ना जाने कितनी सारी जिम्मेदारियों की मोटी परत चढ़ जायेगी। तुम्हारी डायरी में रखे उन गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ भी सूख जाएँगी ना, क्यूंकि एक अरसा हो चुका होगा अश्क़ो की बारिश हुए। क्यूंकि भागती दौड़ती जिंदगी में नमी के नाम पर सुकून के आंसू नहीं है, केवल थकान का पसीना है।

मगर सोचो, इसी भागती दौड़ती जिंदगी में अगर कभी हम और तुम टकरा गये फिर से तो? जी हाँ, ठीक वैसे ही, जैसे सेकंड की सुई टकराती है मिनट की सुई से पल भर के लिए। सेकंड की सुई तो मिनिट की सुई से 60 जगह मिलती है, हम और तुम कहाँ कहाँ मिल सकते हैं… सोचो तो जरा!

मान लो, अगर हम मेट्रो में मिले तो? तुम इन्तजार कर रहे होंगे हुडा सिटी सेंटर वाली मेट्रो का और मैं समयपुर बादली वाली का! मेट्रो में announce होगा, “अगला स्टेशन है याद शहर…. दिल, धड़कन ,और दिमाग को थाम कर रखें।” एक पल के लिए शायद सेकंड की सुई भी थम जायेगी ना? पर हमेशा की तरह इस बार भी मंजिल अलग, सफर अलग। पर इस मुए मोड़ ने तो जैसे कसम खा रखी हो कि मुलाकात को मैं करवाता ही रहूँगा चाहे पल भर की सही!

अच्छा, मेट्रो के अलावा और कहाँ मिल सकते हो तुम? उम्म… सोचने दो ज़रा! शायद किसी ATM/बैंक की लाइन में, हो सकता है फिर से विमुद्रिकरण हो। इस बहाने यारी की गुल्लक में एक और मुलाकात का सिक्का बढ़ जाए। सुबह से लेकर शाम तक लाइन में खड़े खड़े जितनी बार हमारी नजरें तुमसे टकराएंगी उतनी दफ़ा, सच कहती हूँ उतनी दफ़ा सेकंड की सुई थम जायेगी!

वैसे घण्टा ,सुई, सेकंड ,मिनट से याद आया कि तुम तो UPSC की preparation कर रहे हो ना? क्या पता तुमसे मुलाकात हो मसूरी के डिपार्टमेंट ऑफ personnel एंड training में , और क्या पता दोनों की जॉइंट रैंक AIR 1 हो,फिर एक बार आज़कल की ही तरह एक और पोस्ट viral हो ” UPSC Topper Might Have Won The Top Spot But Lost Her Heart To The Rank 2 Holder. What a Story!”

होने को ये भी हो सकता है कि उस वायरल पोस्ट को पढ़कर तुम्हें इस पोस्ट की याद जाए और तुम्हारे ‘लाइक’ का नोटिफिकेशन देख कर सेकंड की सुई मिनट से टकरा कर थम जाए…
या फिर इन सारे बवाल भरे सवालों से दूर एक घड़ी ऐसी भी हो सकती है कि –
“यूँ सर-ए-राह मुलाक़ात हुई अक्सर उससे
उस ने देखा भी नहीं हम ने पुकारा भी नहीं”


इस दुनिया में शोर बहुत है।


THE EDITING STARTUP


ये शब्द मनोज कुमार की फिल्म “शोर” के हैं। पूरी ज़िन्दगी एक पिता दुनिया के इस शोर को कोसता है क्योंकि उसका बेटा बोल नहीं सकता। उसे लोगों का हंसना, लोगों का रोना सब शोर सा लगता है। पूरी ज़िन्दगी वो बस इस चाह में रहता है कि एक बार अपने कानों से अपने बेटे की आवाज़ सुन सके। अपने बेटे की आवाज़ के अलावा उसे दुनिया की हर आवाज़ बस एक शोर लगती है।

ये बात सच है कि इस दुनिया में शोर बहुत बढ़ गया है। या हो सकता है कि मैं भी उस फिल्म के किरदार की तरह अपनी किसी परेशानी में ऐसा उलझा हूँ कि मुझे दुनिया का शोर कुछ ज़्यादा ही सुनाई देने लगा है। आँखों के सामने चारों तरफ की ज़मीन घूम रही है। अलग अलग आवाज़ें कान के परदे से टकराकर बिखर जा रही हैं। क्या आपको भी ये शोर सुनाई दे रहा है?

सड़कों पर, घरो में, बसों में, दफ्तर में…. लोग चिल्ला रहे हैं। हर जगह गुट बंट गए हैं। लोग इतनी बेबाक़ी से अपनी राय दूसरों के सामने रखते हैं और फिर उस राय के बचाव में किसी भी हद तक उतर जाते हैं। आरोप प्रत्यारोप का दौर ऐसा चला है कि कोई किसी की सुनने को तैयार ही नहीं। हर इंसान वक़ील है, और वही इंसान जज भी है। पक्ष और विपक्ष को बांटने के लिए अब कोई लकीर खींचने की ज़रूरत नहीं है। आपकी ख़ामोशी को ही आपका विरोध समझ लिया जाता है। हमारा देश 1947 में जितना बँटा था, उससे ज़्यादा आज बँटा है। 47 में अशिक्षा थी, सामाजिक कुरीतियां थी,तकनीकी तौर पर पिछड़ापन था।

आज नफरत है, कट्टरवादिता है, उन्माद है।

मैंने जब से होश सम्भाला है, तब से अपने सामने कई लोगों के दौर देखे। कुछ 7-8 साल पहले हिमेश रेशमिया का दौर था। “तेरा सुरूर” भारत में सबसे ज़्यादा बिकने वाला एल्बम है। नशा था लोगों को, हिमेश के गानों का। आज, सब उसका मज़ाक उड़ाते हैं। John Cena का भी एक दौर था। साराभाई vs साराभाई का भी दौर था। आसमां और Band of Boys का दौर भी आया। अल्ताफ राजा का भी दौर था। एक दौर रिकी पोंटिंग वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम का भी था। आज JIO का दौर है। एक वक्त वो भी था जब रहमान द्वारा बनाई गयी एयरटेल की धुन हर जगह सुनाई देने लगी थी। एक वक्त DOCOMO का भी आया जिसके कम दामों ने टेलीकॉम उद्योग में हड़कंप मचा दिया था। एक दौर याहू का भी था। एक दौर नोकिया का भी था।

मतलब साफ़ है – दौर आते हैं और दौर चले जाते हैं। मगर ये जो दौर है न, जहां आप राजनीतिक गुटबाजियाँ कर रहे हैं, ये गलत है जनाब! मैं इस दल का, तू उस दल का। दलों की भक्ति का ये दौर, कब रिश्तों में दरार डालने लगा, पता ही नहीं चला। चाय की दुकानों पर राजनीतिक चर्चाएं आम थी। लेकिन आज जब आप चाय की दुकान पर बैठ कर किसी दल की नीतियों की बुराई करें, तो कहीं से एक आदमी निकल कर आता है और आप से भिड जाता है। क्यों? आपका नेता भगवान है? है तो फिर दूसरे भगवान का मंदिर क्यों बनवा रहे हो यार! और नहीं है तो आपके नेता में कमियाँ होना लाज़मी है। अब भगवान का नाम ले दिया तो आप मेरे हिन्दू होने पे शक करेंगे। धर्म का नाम लिया है तो आप हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा उठाएंगे। शर्म आती है जब आप अपने राजनीतिक दलों को सहारा देने के लिए उनके द्वारा करवाये गए दंगों को भी सही बतलाने लगते हैं। अंधभक्ति की भी एकहद होती है!

लोग अपनी बातें कहने में हिचकने लगे हैं। हट्टे कट्टे, ज़ोर से बोलने वाले, हड़काने वाले लोगों का एक तबका आपकी आवाज़ को धीमा करने लगा है। पार्क में एक बेंच पर एक अंकल अकेले बैठे हुए हैं। पहले, उनके साथ कुछ लोग घूमते थे। एक दिन देखा कि सब ऊँची आवाज़ में बातें कर रहे थे। उन अंकल की राजनीतिक सोच बाकियों से मेल नहीं खाती थी। बाकि के लोग बहस के बाद वहां से चले गए, और उसके बाद से अंकल हमेशा पार्क में अकेले ही घूमते हैं। अकेले बेंच पर बैठे हुए, लोगों को अपने सामने से निकलता देख कर, अंकल शायद सोच रहे होंगे कि क्या “सही को सही” और”गलत को गलत” कहनें में हिचकना चाहिए? ज़रूरी नहीं कि आपका सही और दूसरों का सही एक ही हो। लेकिन एक बीच का रास्ता निकाल कर सहमति तो बन ही सकती है।

चुनाव पहले भी होते थे। सरकारें पहले भी बनती थी। लोग अपनी ज़िन्दगी में इतने व्यस्त थे, कि राजनीतिक चर्चाएं 5 साल में 2 बार होती थी। एक बार जब देश के चुनाव होते थे, एक बार जब राज्य के चुनाव होते थे। जो लोग सच में राजनीतिक तौर पर सक्रीय थे, वो भी 24 घंटे राजनीति की बातें नहींकरते थे। आज, 24 घंटे राजनीतिक मारा मारी है। सोचिये, अगर एक व्यक्ति ज़िन्दगी में बहुत सी परेशानियां झेल रहा है। उसने तंग आकर ये कह दिया कि मुझे सरकार की कुछ बातों से परेशानी है, तो आप उसके ऊपर चढ़ जाएंगे? उसकी परेशानी और आपकी परेशानियों में फर्क नहीं हो सकता? और सौ बात की एक बात, अगर वो परेशान है तो आप सवाल उठा ही क्यों रहे हैं? आप उसकी मदद कीजिये। नहीं कर सकते तो उसको उसके हाल पर छोड़ दीजिये।

इस बात में कोई शक नहीं है कि नोटबंदी काले धन और नकली नोटों पर प्रहार करने का एक तरीका है। लेकिन अगर उससे किसी को परेशानी हुई तो क्या वो परेशानी बेमानी है? 56 मौते हुई हैं। लंबी कतारें लगी हैं। कुछ लोगों ने बेहद साहस के साथ सरकार के साथ खड़े रहने का फैसला किया तो कुछ ने आखिरकार अपने दर्द का ज़िक्र कर ही दिया। चोट लगती है तो उफ्फ करना तो बनता है यारों! अगर उस उफ्फ में भी आपको तकलीफ है तो आपके साथ कुछ गड़बड़ है। आप इंसान के भेष में तो हैं, पर इंसान से कुछ अलग हैं।

इंसान और पत्थर में सिर्फ इतना ही फर्क है, कि इंसान के अंदर भावनाएं होती हैं।

कभी कभी लगता है कि जिस तथाकथित सभ्य होने के बंधन में बंधा हूँ, उसे तोड़ दूँ। कसम से, मज़ा बड़ा आएगा। आपको आपकी ही भाषा में जवाब देकर, आपके उतरे हुए मुंह को देखने की प्यास बहुत है मेरे अंदर। पर जिस देश की देशभक्ति की कसमें आप खाते हैं, उसी देश की सभ्यता ने सिखाया है आपसे सहमत होना।

इस एक तरफा सहमति के बोझ में दबे हुए, ज़िन्दगी में हर दिन एक नयी परेशानी से जूझने वाले लोग इस शोर को सुन सकते हैं। ये शोर अब हर जगह है। ये शोर अब कानफोड़ू हो चला है। शायद मुझे बहरा कर देगा।

फिल्म “शोर” में मनोज कुमार का बेटा जिस दिन ठीक होता है, उसी दिन मनोज कुमार के साथ एक हादसा हो जाता है। जिस दिन बेटे की आवाज़ वापस आती है, उसी दिन बाप की सुनने की शक्ति ख़त्म हो जाती है। एक तमन्ना, बस एक तमन्ना थी, कि अपने बेटे को बोलते हुए सुन सके। लेकिन पूरी नहीं हुई। वो बस ये ही कहता रहा कि इस दुनिया में शोर बहुत है।

तो जब तक मेरे कान ठीक हैं, इस शोर के बीच “शोर” फिल्म का ही एक गीत सुनना चाहता हूँ –
“तूफ़ान को आना है, आकर चले जाना है,
बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है।
परछाइयाँ रह जाती, रह जाती निशानी है,
ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है।”