तू सच है

EDITOR: Gyan Akarsh

मैंने खुद की एक कहानी लिखी है
जिसमे तेरा भी एक हिस्सा है
नहीं जानता मैंने तुझे ढूंडा है
या लिखा है
तू सच है
या मेरी एक रचना है?

तेरे इर्दगिर्द घूमती मेरी कहानी
तुझसे मुझे कुछ जोड़ती सी है
मेरा ज़िक्र तुझमें करती सी है
मेरा साया दिखता है तुझमें
तू सच है
या आईना है?

तेरी बातें मुझसे आती हैं
जैसे तूने मुझे पढ़ा है
ये बातें मेरी हैं
या तेरी हैं
तू सच है
या मैंने तुझे गढ़ा है?

तेरी मंज़िल मुझे दिखती है
तेरा सफ़र मुझतक आता है
तेरे रास्ते तूने चुने हैं
या मैंने तुझे दिए हैं
तू सच है
या मेरी वही ख़्वाहिश है?

तेरी अदा में मेरी हरक़त है
तेरी साँसों में मेरी हरारत है
मेरी आहट पे तेरी निगाह भी है
तू मुझसे इतनी जो जुड़ी सी है
तू सच है
या मेरा वोह सपना है?

मैं पहले तुझसे मिला हूँ
तेरी तस्वीर याद है
तेरी आँखों से शुरू हुई
ये बात आज यहां है
मैं जानता हूँ
तू सच है
लेकिन तेरा सच मेरा नहीं
ये कहानी तो मेरी है
लेकिन मेरा किरदार मेरा नहीं।


आस

EDITOR: Aditya Prakash Singh

ख़्वाहिश है दिल की
जब चेहरा दिखेगा
खिलखिलाती हँसी
कानों से होकर
शहद सी लगेगी
जब होगा ये सबकुछ
कुछ अच्छा लगेगा
जब हम मिलेंगे
जब तुम दिखोगी।

तपिश के वो लम्हे
आँखो का फेरा
आफ़त कदमों की
सफ़र ही सफ़र
तेरी नामौज़ूदगी
बस, ‘था’ एक अंधेरा
सब, बस रह जाएँगे
जब तुम दिखोगी।

अंजान होगी
वो जब दिखेगा
कँपकपी उसकी
अलग सी रहेगी
हो आस पूरी
एक दिन आएगा
जब हम मिलेंगें,
जब तुम दिखोगी।


वो मेरे भगवान नहीं

EDITOR: Aditya Prakash Singh

बारूदों के जलने से ही जिनकी पूजा होती है
कैसे वे खुश होते हैं धरती माता जब रोती है
और धरम के नाम पे बकरा जब कट जाता है
सत्य अहिंसा और धर्म का पाठ धरा रह जाता है
कर्म कांड के कचरे का अब गंगा बोझ उठाती है
आडम्बर के कारण ही तो झोपड़ियां जल जाती है
इन्हें कौन बताये मंदिर मस्ज़िद नफरत के पैगाम नहीं
और खून से जिसकी रोटी सिकतीं वो मेरे भगवान नहीं
वो मेरे भगवान नहीं।

तलवारों की नोकों पे अब धर्म दिखाई देते हैं
संग्रामो के शंखनाद और बिगुल सुनाई देते हैं
चुपके चुपके मंदिर में गीता भी अश्रु बहाती है
जब मंदिर से नफरत की ज्वाला सुलगायी जाती है
चरमपंथ के पंथी जन को धर्म सिखाने आते हैं
ढोंगी और पाखंडी सारे अब बाबा बन जाते हैं
इन्हें कौन बताये ज्ञान ध्यान सब बिकने के सामान नहीं
और जो बाज़ारों में बिकते हों वो मेरे भगवान नहीं
वो मेरे भगवान नहीं।


एक कविता मेरी भी


काव्य लिखत है आज हमारे सारे बच्चे, 

क्या खूब लिखत है! दिल हैं इनके सबसे सच्चे। 

दिल है इनके सच्चे, लेखनी बहुत है भारी,

गद्य हो चुका बहुत, अब हैं पद्य की बारी। 

कहे पंकज कविराय, आज कुछ हम भी लिखेंगे,

सबने अपनी कह दी, अब कुछ  हम भी कहेंगे। 

 

“दो बैलों की कथा” उसने हमें ऐसी सुनाई,

हीरा-मोती से सबकी पहचान कराई। 

पहचान कराई उसने, साथ ही ये समझाया,

पशु हुए तो क्या, उन्हें भी स्नेह ही भाया।

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

पशु हो या हो मानव, सबको प्रेम से भर दो। 

 

बाबा भारती ने है हमको यही सिखाया,

“जीत” उसी की हुई है जिसने “हार” को पाया। 

खड़गसिंह के मन को बदला अच्छाई से,

पाया सुलतान को वापस अपनी सच्चाई से। 

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

जितने भी है बुरे, सभी को अच्छा कर दो। 

 

कितना कुछ है लिखा उन्होंने, अमर हो गए,

हिंदी के फूलों के वो तो भ्रमर हो गए। 

भ्रमर हो गए, गद्य का ऐसा रस है निकाला,

तभी तो मैं हूँ लेखक अपनी हिंदी वाला। 

कहे पंकज कविराय, हे प्रभु अब ये वर दो,

हमें चाहिए फिर से, एक और प्रेमचंद कर दो। 


मन की बात


अनंत बेरीवाल

कि रोज़ चमकती थी शामियाने पे मीठी धुप सूरज की,
और रात चाँद से बतियाते निकलती थी।
बादलो की बारिश को तूने चुना है,
मेरे लिए तो सारा आसमां तू ही था।

कभी सीधे मिलते थे दिलो को तेरे मेरे बीच के कच्चे रास्ते,
पगडंडियों पे आज भी हमारे छोड़े निशान मौजूद होंगे।
सरहदें और दीवारे तूने तैयार की है,
मेरे लिए तो सारा जहां तू ही था।

हर याद का एक लम्हा दीवारों पे लगा रखा था
रात तेरे सपने तकिया बना कर सोते थे।
घरोंदो की खिलखिलाहट तूने पीछे छोड़ी है,
मेरे लिए तो आखिरी पनाह तू ही था।


मैं और तुम


अनंत बेरीवाल

कि ज़िन्दगी की छोटी छोटी खुशियों का फ़लसफ़ा कुछ यूँ है…
तेरे साथ सालो में एक बार होने वाली बात ही यादगार हो होती है।

कि मीलों चलने का दम देने वाली ख्वाहिशों की वफ़ा कुछ यूँ है…
तेरे साथ सालो में एक बार होने वाली मुलाकात ही यादगार हो होती है।