मैं कूल हूँ


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“अबे हट! मैं क्यों टाइम वेस्ट करूँ हिन्दी-विन्दी जान कर? इन्ग्लिश का टाइम है ब्रो, हिन्दी यूज़लैस है। इस पर टाइम वेस्ट ना कर। कूल बन, ‘कूल’।” ऐसा कहना था मेरे रूमी भाई साहब का। पर हम भी तो कम बड़े जिद्दी है नहीं, अड़े रहे। “भाई मान लिये इंग्लिश ज़रूरी है, पर मातृभाषा जानना भी तो जानना ज़रूरी है। तुम्हारी कौन सी है?” मेरे ऐसा कहने पर श्रीमान के सर पर बल पड़ गये, भौंएँ संकुचित हो गयीं उनकी। हम भी अपना सर पीट लिये कि किससे पाला पड़ा है।

“भाई मातृभाषा मतलब मदरटंग, ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’, समझे?” ये सुनकर श्रीमान का चेहरा सामान्य हुआ। “अरे तो सीधे सीधे ऐसे नहीं बोल सकता? हिन्दी है मेरी फ़र्स्ट लैंग्वेज।” अब हमको मौका मिला अपना प्वाइंट मारने का। “कहने का मतलब तुमको अपनी ‘फ़र्स्ट लैंग्वेज’ भी लिखनी नहीं आती?” हम पूछे श्रीमान से। सवाल सुनकर वो हमको ऐसा लुक दिये जैसे हम पूछ दिये हों कि पानी गीला क्यों होता है।

“औब्वियसली ब्रो, अब कंपनी वाले मेरे को मदरटंग में थोड़ी ना जॉब देंगे। सब इंग्लिश में होता है अब। क्यों टाइम एण्ड एफ़ोर्ट वेस्ट करूँ हिन्दी पढने में? इट्स यूज़लेस।” ऐसा बोलकर हम पर ‘हे हे हे हे’ कर के हँसने लगे। “तू चोमू है ना, हिन्दी पढ़। कुरते पायजामे में हिन्दी बोलकर जॉब लेना।” एक और ठहाका लगाया साहब ने और किट उठा कर क्रिकेट खेलने निकल गये।

ये सिर्फ मेरे रूममेट की कहानी नहीं है, आजकल मुश्किल से ही कोई ऐसा मिलता है जो किसी भी तरह से मातृभाषा ‘अच्छी’ लिख सकता हो। “भारतीय युवा” (डबल कोट्स पर ध्यान दें) हिन्दी को ‘पिछड़ा’ होने की निशानी मानता है। लेखक अजीत भारती की भाषा में ‘अंग्रेज़ों की टट्टी चाटने’ में हम खुद को बड़ा “कूल” समझते हैं।

ये कहीं से भी गलत नहीं है कि अंग्रेज़ी ज़रूरी है आज के ज़माने मेें। लेकिन इस चक्कर में हम खुद की मातृभाषा को भूलते जा रहे हैं। ये तो वैसी बात हुई, जबतक बच्चे हैं, माँ बाप की उंगली पकड़ कर चले। और जब ज़रूरत नही रही, माँ बाप ‘यूज़लैस’ हो गये और घर में प्रेमिका को घुसा के माँ बाप को ‘पिछड़ा’ और ‘अनकूल’ बोल कर बाहर फेंक दिया।

माने या ना मानें, हमारे युवा; खासकर महानगरों के युवा ऐसे ही होते जा रहे हैं। “मैं कूल हूँ” का टैग लगा कर हमारे इतिहास को यूज़लैस बताते हुए आगे निकल जाना ही अब कूल है।

ऐसा है, तो हम तो सीना ठोक कर खुद को चोमू बोलते हैं।


तन्हाई की गूँज


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मैं भी कभी अकेली थी। मैं भी कभी तन्हा थी।
अकेलेपन का सहारा ही बस अब रह गया था ज़िन्दगी में।

एक आवाज़ मेरी भी थी, एक ख्वाब मेरा भी था।
जाने अनजाने में ही मैंने अपनी पहचान ढूंडली थी।
उस गूँज में जिसकी न आवाज़ था, न कोई धुन ।

आवाज़ मैं अपनी कहाँ ढूंढ़ती, मेरी तरह मेरे रस्ते भी खोए हुए थे ।
न मंज़िल का पता था, न इस रस्ते का और न ही मेरे इस सफ़र का।

अपने आप को शायद खोना इसे कहते हैं।

मैंने अपने आपसे अब कह लिया था की मुझे अपने आप को ढूँढना होगा और मैं अपनी पहचान को इस तन्हाई के गूँज में ढूढंथी हुई चले जा रही हूँ।


6 प्वाइंटर – 9 प्वाइंटर


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रिज़ल्ट आ गया इस सेमेस्टर का। जहाँ देखो वहाँ हड़कम्प मचा है। कोई पास हो जाने पर खुशियाँ मना रहा है तो कोई टॉप ना होने पर गम के आँसू बहा रहा है। पर एक बात तो पक्की है, ‘रिज़ल्ट’ ज़रूर आ गया है।

अब हमारे एक साथी हैं, जिन्होंने अपना पूरा समय बड़ी शिद्दत के साथ शरलॉक और ब्रेकिंग बैड को दिया। उनका 6.3 आया है। एक सिंगल पोज़िशन में बैठ कर सबको गरिया रहें हैं, कन्टिन्युअसली। ‘सालों को कोई काम नहीं मिलता? जब देखो तब किताबों में घुसे रहते हैं। मेरा रिजल्ट तो इन्ही ने खराब कराया है।’ मतलब कि सही है। खुद घुसे रहो ‘लैपी’ के पिछवाड़े में, और मौके पर पूरी गल्ती दूसरों के मत्थे मढ दो। सही है।

एक और साथी है हमारे। पूरे सेमेस्टर में तीन दिन क्लास गये हैं। बाकी टाइम दिन भर सोना और रात भर हॉस्टल वाई-फाई का बर्बरता से शोषण करना, यही इनकी दिनचर्या, ‘रूटीन’ रही है पूरे सेमेस्टर। ‘भाई ये फ़ुद्दू सी चीज़ें मण्णे ना पढनी। मैं तो एयरोस्पेस पढने आया हूँ।’ पूछने पर यही जवाब रहता है उनका। रिज़ल्ट का रत्ती भर असर नहीं पड़ा जवाब पर। अब अरबपति बाप की औलाद हो, तो ना पढो वो भी चलता है।

क्लास टॉपर को ही ले लीजिये हमारे। रिज़ल्ट के बाद सर पकड़ कर सीढियों पर बैठा था। पूछने पर चेहरा ‘माइनस’ में मूव कर गया बंदे का। ‘भाई, बस 8 सब्जेक्ट्स में ‘O’ आया है। 4 बाकी रह गये। अब तो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा मैं।’ ये लीजिये। लड़के को 9.66 GPA आया है, पर फिर भी संड़ रहा है। मतलब हद्द होती है भाई! 

खैर, दीज़ वेयर सम टिपिकल एग्ज़ाम्पल्स ऑफ हाऊ पीपल रिएक्ट टू देयर रिज़ल्ट्स। हर किसी का बर्ताव कहीं ना कहीं उसके जीवन के प्रति उसकी सोच को उजागर करता है। अब ऐसे में हम और आप कहाँ है, और हमारी सोच हमारे जीवन को किस दिशा में ले जा रही हैं ये हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता।


चोमूनामा 2


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ज़माना ‘कूलपंती’ की ओर बढ़ता दिख रहा है। आज का युवा ‘कूल’ बन रहा है। हम नॉर्मल वाले ‘कूल’ की बात नहीं कर रहें हैं। हम ऐसे लोगों के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो फ़ेल होने की शेखी बघारते हैं, जो सामने वाले को ‘गरिया’ के खुद को कूल समझते हैं, जो माँ बाप के पैसे की दारू सिग्रेट फूँक कर खुद को ‘कूल’ समझते हैं। मेरी डिक्शनरी में ‘कूल डूड’ & ‘हॉट चिक’ का प्रयोग ऐसे ही लोगों के लिये किया जाता है। 

आज कूल डूड़स के बारे में बात नहीं करनी। आज बात करते हैं उनके ‘पोलर अपोज़िट्स’-चोमूओं की। यूँ तो चोमू कभी भी, ध्यान रखें; कभी भी खुद को कूल डूड्स से कम नही मानते, पर कुछ ऐसी चीज़ें हैं जहाँ चोमू भी चुप रह जाते हैं। उनमे से एक है ‘प्रेमिका’। 

चोमू भी इंसान ही होते हैं, और ज़िंदगी में एक अदद लड़की की तलाश उन्हें भी होती है। पर समस्याएँ खड़ी तब होती है जब हमारा चोमू ‘मार्केट’ में उतरता है। पहली बात, तड़क भड़क से भरपूर कूल डूड्स के सामने अपना चोमू कहीं ‘इन्विज़िबल’-गायब सा हो जाता है। ‘कूल’ ज़माने के फैशन और तेईस चोंचलों की बराबरी करना उसके लिये संभव नहीं।

अगर गलती से किसी मोहतरमा को कोई चोमू पसंद भी आ गया तो चोमू बेचारा घबरा जाता है, ‘ओवरथिंकिंग’ की प्रथा को मानते हुए ‘फ़र्स्ट कॉन्टैक्ट’ करने से घबराता है। कहने का मतलब किसी भी मोहतरमा से बात की शुरूआत करने में हमारे चोमू की फट जाती है।

अगर मान लिया जाय कि किसी चमत्कार से भावी युगल के बीच संवाद शुरू हो भी जाय, को चोमू यही चाहता है कि उसे कुछ ना करना पड़े, और फिल्मी हिरोईन की तरह सरसो के खेत में बाँहे फैला कर स्लो मोशन में भागती हुई लड़की उससे प्यार का इज़हार कर दे।

इतने में ऊपर वाला भी खीज़ के चोमू से अपनी दया दृष्टि हटा लेता है, और चोमू फिर ‘सिंगल’ रह जाता है। लेकिन…

“सब समझ रहे हैं। सिग्रेट दारू अ सिक्स पैक नहीं है तब न… जिस दिन सही में तैयार होके आ जायें तो यहीं फ्लैट हो जाएगी। वैसे भी इस दिल के प्यार की हकदार कोई और है…”


​सांड बचाओ आंदोलन


EDITOR: ADITYA PRAKASH | READ IN ENGLISH

आप सभी ने रोम के कोलोसियम के बारे में सुना होगा। रोमन शासकों को जब एहसास हुआ कि जनता में उनके प्रति आसक्ति कम होने लगी है, तो उन्होंने एक तरीका खोज निकाला जिससे जनता का ध्यान उनके नाकारेपन से हट जाए। उन्होंने कोलोसियम की स्थापना की। कोलोसियम का इस्तेमाल इंसानों के मल्लयुद्ध, इंसानों का जानवरों से युद्ध और एक योद्धा का कई सारे योद्धाओं से युद्ध कराने के लिए होता था। इंसानों तथा जानवरों की लाशें बिछते देख कोलोसियम में बैठी जनता तालियां ठोकती थी और राजा का आभार प्रकट करती थी कि उन्होंने इतनी दिलचस्प प्रथा की शुरुआत की।

आज मुझे रोमन सभ्यता के अंत का ज़रा भी दुःख नहीं है। दूसरों की लाशों पर हँसने वालों का अंत, जिस बर्बरता से हुआ, उसका विवरण आपको इतिहास की किताबों में मिल जाएगा।

जल्लीकटू या जल्लीकट्टू, प्रमुखतः तमिलनाडु की एक प्रथा है जहां पोंगल के अवसर पर एक सांड को भरी भीड़ में दौड़ाया जाता है। आसपास खड़े लोग उसके कूबड़ और सींग पकड़ने की, या उससे लटकने की कोशिश करते हैं। इस समारोह का नाम दो अक्षरों, “सल्ली” जिसका अर्थ है “सिक्के तथा “कटटू” अर्थात “थैला”, से मिलकर बना है। पुराने समय में सांड के सिर पर सिक्के का थैला बाँध दिया जाता था। बहादुर लोग भागते सांड के सींगों से इस थैले को निकालने की कोशिश करते हैं।

कुल मिला कर बात ये है कि, इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। यह बिलकुल उसी तरह से है जैसे दिवाली पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं। जुआ धार्मिक नहीं है, बस एक प्रथा सी बन गयी है। तो अब ये कहना बंद कीजिये कि जल्लीकट्टू की वजह से किसी की धार्मिक भावनाएं आहात हुई है।

मेरा खुद का अनुभव है कि हमारे देश में सिर्फ उन्हीं लोगों की भावनाएं आहात होती हैं, जिन्हें धर्म का बहुत थोड़ा या बिलकुल भी ज्ञान नहीं।

पिछले 3 दिनों में मैंने कम से कम 50 अलग अलग लोगों से बात की। कुछ लोग कहते थे कि इस समारोह का आयोजन जानवरों से बर्बरता का एक जरिया है। कुछ लोग कहते थे कि इस समारोह पर रोक सिर्फ एक धर्म विशेष की भावनाओं को आहत करने का एक जरिया है। कुछ ने कहा कि इसी आयोजन के ज़रिये सांडों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाया जा रहा है, इसलिए ये उनकी भलाई के लिए ही है। मरीना बीच पर ढेरों लोग इस आयोजन के समर्थन में उमड़ आये हैं।

मैंने सभी के दृष्टिकोण से सोचने की कोशिश की। फिर थोड़ा पढ़ा इसके बारे में। 7 मई 2014 को उच्चतम न्यायालय ने इस पर रोक लगाईं थी। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था “एक जानवर को बहुत देर तक एक छोटी सी जगह में रख कर, उसकी नाक में नकेल बाँध कर खींचना, उसे हर प्रकार के भय और प्रताड़ना के माहौल में रखना, किसी भी तरह से एक जानवर के हित में नहीं है।”

17 जून 2015 को देश के वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह बयान दे दिया कि वे जल्लीकट्टू को फिर से शुरू करने के लिए सरकार कदम उठाएगी। श्री जावड़ेकर वन मंत्री बना तो दिए गए, पर उनका जानवरों से कुछ ख़ास लगाव नहीं है। गौरतलब हो कि उनके मंत्रालय ने अलग अलग राज्यों में विभिन्न वन प्राणियों को जान से मारने की अनुमति दी है। बंगाल में हाथियों, हिमाचल प्रदेश में बंदरों तथा गोवा में राष्ट्रीय पक्षी मोर को मारने के आदेश दिए गए हैं। मज़े की बात ये है कि वन विभाग ने खुद इन प्राणियों को मारने से मना कर दिया है।

शायद आज ये स्थिति आती ही नहीं, अगर केंद्र में बैठी एक ऐसी महिला को ये मंत्रालय सौंप दिया जाता जिसने पशु पक्षियों के बचाव में अनेकों बार आवाज़ें उठायी हैं। पिछले 1 साल में मेनका गांधी ने 3 बार श्री जावड़ेकर को पत्र लिख कर कुछ मुद्दों पर आपत्ति जताई है।

तमिलनाडु की सभ्यता और संस्कृति जल्लीकट्टू तक सीमित नहीं है। भरतनाट्यम, तंजौर चित्रकला और मंदिरों पर की गयी शिल्पकला देखते ही बनती है। जब प्रसिद्ध संगीतकार रहमान जल्लीकट्टू के समर्थन में उतरे तो मुझे हैरानी हुई। रहमान को तमिलनाडु की संस्कृति “नादस्वरम” या “विल्लूपट्टू” में दिखनी चाहिए थी। केले के पत्ते में खाना, मिनाक्षी मंदिर की नक्काशी और न जाने कितना कुछ भरा पड़ा है तमिलनाडु की सभ्यता और संस्कृति में।

एक सांड को भीड़ में दौड़ा कर, कौन सी सभ्यता की बात कर रहे हैं आप?

अब बात दूसरे पहलुओं की। ये बात सच है कि जल्लीकट्टू को निशाना बनाया गया। मैं PETA के किसी भी अधिकारी से सरेआम वाद विवाद के लिए तैयार हूँ, बस वो मुझे ये साबित करके दिखा दे कि जल्लीकट्टू में बकरीद से ज़्यादा बर्बरता है। मैंने इन्टरनेट पर ढूंढने की कोशिश की। मुझे कुछ भी ठोस नहीं मिला जहां किसी भी “पशु प्रेमी” संस्था ने बकरीद के खिलाफ आवाज़ें उठायी हो। सिर्फ बकरीद ही नहीं, हर वो धार्मिक प्रथा जिसमें किसी जीव की हत्या शामिल हो, मुझे उससे गुरेज़ है।

लेकिन इस समस्या का हल जल्लीकट्टू पर लगी रोक हटाने से नहीं, बल्कि बाकि ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाने से निकलेगा।

कुछ लोगों का कहना है कि परम्पराओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। मैं इससे बात से पूर्णतः सहमत हूँ। कुछ किताबों में पढ़ने पर पता चलता है कि पुराने समय में किसान खेत जोतने के लिए बैलों का इस्तेमाल करते थे। शाम ढलने के बाद बैलों की लड़ाई देखना मनोरंजन का साधन होता था। ये सब, उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा था। इसमें न तो बैलों को ज़बरदस्ती उकसाया जाता था, न ही उन्हें तड़पाया जाता था जिससे वो हिंसक हो सकें। मेरा अनुमान है कि जिस स्तर पर जल्लीकट्टू का आयोजन आज के समय में होता है, आयोजकों पर दबाव होना लाज़मी है कि सांड अत्यंत उत्तेजित रहे। कई सबूत मिले हैं जिनसे पता लगता है कि उनके शरीर में नुकीली चीज़े चुभाई जाती हैं। कई तस्वीरें मिली हैं, जहां सांडों के कानों और पैरों को चोट पहुंची है। उनकी पूँछ को मोड़ा या खींचा गया है। यहीं नहीं, कहा जा रहा है कि सांडों को बाहर छोड़ने से पहले उन्हें कुछ मादक पदार्थ खिलाये जाते हैं। हालांकि तमिल सरकार ने जल्लीकट्टू के आयोजन के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किये हुए हैं, लेकिन उनका पालन किस स्तर पर होता है, ये सवाल तो पूछना बनता है।

उच्चतम न्यायालय का आदेश है, कुछ सोच कर ही दिया होगा!

जल्लीकट्टू का आयोजन पुराने समय में अपनी वीरता साबित करने के लिए किया जाता था। मुझे ऐसा लगता है कि वीरता दिखाने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ में एक सांड को छोड़ना उचित नहीं है। वीरता दिखानी ही है तो शहर की गौशाला के बीचों बीच खड़े हो जाइये, अपने पूरे शरीर पर रोटियां लपेट लीजिये, और “हियो” “हियो” चिल्लाइये।


सौ चिट्ठियाँ: पार्ट 1


EDITOR: ADITYA PRAKASH

रात के करीब 1 बज रहे थे। सर्दी का मौसम था तो हल्की ओंस गिर रही थी। सड़क पर कुछ कुछ देर में कोई गाडी निकल रही थी। तभी…

एक व्यक्ति जैकेट, जीन्स और गुलबंद पहन कर, पीठ पर बैग टाँगे हुए सड़क के किनारे पहुंचा। सड़क किनारे बोर्ड लगा था जिसपर लिखा था – “शिक्षामंत्री अतुल सिंह का निवास स्थान दाईं और है।”

वह दाईं ओर बढ़ा और दरवाज़े के सामने जाकर रुक गया।
“भाईसाहब!”
दरवाज़े पर बैठा गार्ड नींद में बोला,”साहब घर पर नहीं है।”
“भाईसाहब, उठिये तो। मुझे आपके साहब से ज़रूरी बात करनी है। “

गार्ड की नींद खुल चुकी थी। झल्लाते हुए उसने घडी की ओर देखा।
“रात के 1 बजे कौन सी ज़रूरी बात होती है बे! भाग यहां से।” गार्ड ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।
“आप समझने की कोशिश करें। मेरा आपके साहब से मिलना बहुत ज़रूरी है।”
गार्ड ने डंडा उठाया और धमकाते हुए बोला, “भाग यहां से। वरना टाँगे तोड़ दूंगा।”
“अरे…. सुनिये तो… भाईसाहब…..”

गार्ड ने धक्का देकर उसे गिरा दिया। वह खड़ा हुआ। गार्ड की तरफ बढ़ा। गार्ड किसी भी हमले के लिए तैयार था। ठीक गार्ड के सामने आते ही, एक दम से वह उसके बगल से दौड़ता हुआ दरवाज़े के अंदर घुस गया। गार्ड उसके पीछे भागा।
“चोर…. चोर…. घर में चोर…. घुस गया.. चोर…. “

अंदर बैठे हुए बाकी गार्ड उसके पीछे भागे। एक ने अपनी लाठी उसके पैरों की तरफ फैंकी। दोनों पैरों के बीच लाठी फंसने से वह व्यक्ति गिर पड़ा। सबने मिलकर उसे दबोच लिया। सारी धरपकड़ में मंत्री जी की नींद खुल गयी। वो अपने कमरे से बाहर आये और आँगन में पहुँच कर देखा कि एक 25-26 साल के नौजवान को सभी गार्ड पकड़ कर खड़े हैं।

“क्या हो रहा है यहां? कौन है ये?” मंत्री जी ने पूछा।
“कुछ नहीं जनाब। चोर है। घर में जबरन घुसने की कोशिश कर रहा था।” गार्ड ने कहा।
“इसे लेकर जाओ यहाँ से।” मंत्री जी मुड़े और वापस अंदर जाने लगे।
“रुकिए मंत्री जी…” लड़के की आवाज़ सुनकर मंत्री रुके।
“आपकी जान खतरे में है।” मंत्री जी के कान खड़े हो गए।
वो पीछे मुड़े।

“तुम्हारा नाम क्या है?” मंत्री जी ने पूछा।
“समर शर्मा।” लड़के ने जवाब दिया।
“तुम वही समर शर्मा हो जो…”
“जी, मैं वही समर हूँ जिसने पिछले 1 महीने में आपको 100 से ज़्यादा पत्र लिखें हैं। आपकी जान खतरे में है मंत्री जी।” लड़के ने जवाब दिया।
“लड़के को अंदर आने दो। ” मंत्री जी मुड़े और अंदर चले गए।

समर सोफे पर थोड़ा आगे की ओर खिसक कर बैठा था। हथेलियाँ आपस में गुथी हुई थी। उसके पैर हिल रहे थे। चारों तरफ मंत्री जी की तसवीरें लगी थी।
अतुल सिंह कमरे के अंदर आते हैं। उनके पीछे कमरे में उनका पीऐ जसवीर अरोड़ा और एक इंस्पेक्टर कमरे में घुसते हैं।

“वीरेन्द्र, यही वो लड़का है जिसकी चिट्ठियों के बारे में जसवीर जी ने आपको बताया था। आप तो कुछ करते नहीं। समर जी आये हैं हमारी रक्षा करने!” अतुल ने इंस्पेक्टर की ओर देखते हुए कहा।
वीरेन्द्र समर की ओर देखता है।
“आप क्या करते हैं समर जी।” वीरेन्द्र ने पूछा।
“मैं दैनिक समाचार में पत्रकार हूँ सर। कई दिनों से मैं मंत्री जी के चुनाव प्रचार को कवर कर रहा हूँ। आपकी रैलियों में आपके कारवां के साथ ही चलता हूँ। आपकी पिछली रैली में आप जब भाषण दे रहे थे, तो किसी ने मेरा बटुआ चोरी कर लिया। 5000 रुपये थे जनाब! लाइसेंस भी था। “
समर चुप हो गया।

“हाँ, हम तुम्हें तुम्हारे पैसे दे देंगे। आगे बोलो।” अतुल ने कहा।
“नहीं मंत्री जी। पैसे तो मिल गए। मतलब, वो बटुआ चोरी हुआ था। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर मिल गया। सारे पैसे, लाइसेंस… सब उसी में था।  लेकिन…”

“एक बार और तूने ये नाटकीय चुप्पी साधी, तो मैं तुझे गोली मर दूंगा।” वीरेन्द्र ने कहा।
“माफ़ कीजिये। जब वो बटुआ दोबारा मिला तो उसमें ये मिला।”

समर ने एक कागज़ वीरेन्द्र को दिखाया। वीरेन्द ने उसे पढ़ा तो उसके चहरे का रंग लाल से पीला और पीले से सफ़ेद हो गया। उसने वह कागज़ अतुल को दिखाया। कागज़ पर काले रंग की शाही से अनगढ़ अक्षरों में लिखा था –
अतुल सिंह की मौत तय है।
सिर में गोली मारूँगा उसे।
अगर चाहते हो कि एक से ज़्यादा जानें न जाएँ,तो इसे अपने अखबार में छाप देना। 

“क्या बकवास है! ऐसी चिट्ठियाँ हमें हर रोज़ मिलती हैं। इसलिए ही तो हमने तुम्हारी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया था।” अतुल ने कहा।
“जी। इस घटना के बाद मैंने सिर्फ एक ही चिट्ठी भेजी थी। बाकि की 99 चिट्ठियां, इसके मिलने के बाद भेजी।”

समर ने एक और कागज़ अतुल के हाथों में दे दिया। जसवीर और वीरेन्द्र मंत्री जी के पीछे खड़े होकर उसे पढ़ने लगे।
रोहतक की रैली में पीऐ जसवीर को मारूँगा।
उससे दुश्मनी नहीं है।
लेकिन शायद इस बार तुम्हें यकीन हो, कि मैं मज़ाक नहीं कर रहा।

“ये मुझे मेरे दफ्तर में भेजी गयी थी।” समर ने कहा।
सभी ने जसवीर की तरफ देखा। वो काँप रहा था। अतुल ने जसवीर को अपने पास बैठाया।
“परेशान मत हो जस्सी। कुछ नहीं होगा। ये सब ऐसे चलता ही रहता है। कुछ नहीं होगा तुझे।” अतुल ने समझाया।
“वीरेन्द्र इसे बाहर छोड़ के आ। इसके साथ एक पुलिस वाले को भेज।” अतुल ने वीरेन्द्र से कहा।

जसवीर और वीरेन्द्र दरवाज़े की ओर बढे।
“समर सच कह रहा है मंत्री जी।”

जसवीर अतुल की तरफ मुड़ा।
“आज जब आपका फ़ोन आया था, तो मैं जानता था कि कुछ अनहोनी होने वाली है। पिछले कुछ दिनों से मेरे घर के आसपास मैं अजनबियों को देख रहा हूँ। कई दिनों से फ़ोन पर घंटी बजती है पर उस तरफ से कोई जवाब नहीं आता। मुझे लगता है कोई मुझ पर नज़र रखे हुए है।” जसवीर ने कहा।

जसवीर की आँखों से आंसू बह रहे थे। अतुल ने जसवीर को गले लगाया और उसका हौंसला बढ़ाने की कोशिश की।
“तुझे कुछ नहीं होने दूंगा जस्सी। तू बिलकुल मेरे भाई जैसा है। वीरेन्द्र इसको छोड़ के आ। “
वीरेन्द्र जसवीर को बाहर छोड़ के आया। कमरे में अतुल और समर बैठे थे।
वीरेन्द्र ने कहा – “सर, मुझे लगता है कि समर जी अब जा सकते हैं। उनका काम हो चुका है।”
अतुल ने हाँ में सिर हिलाया। समर खड़ा हुआ और अतुल को नमस्ते करके बाहर चला गया।

“ये सब चुनाव को लेकर किया गया एक ड्रामा है।” वीरेन्द्र ने समर के जाते ही कहा।
“आप मुझे थोड़ा समय दीजिये। मैं पता लगता हूँ ये गब्बर सिंह है कौन। आप चिंता मत कीजिये।” उसने अतुल से कहा।
“वो तो ठीक है वीरेन्द्र, लेकिन जसवीर?” अतुल ने पूछा।
“जनाब, मुझे जसवीर की चिंता नहीं है। पहले ये तो पता लगा ले कि हमारे पत्रकार महोदय की बातों में कितना दम है।” वीरेन्द्र ने अतुल की तरफ मुस्कुराते हुए कहा।

“भाइयों और बहनों, आप लोगों ने पिछली बार मेरा साथ देकर, मुझ जैसे एक गरीब बाप के बेटे को शिक्षामंत्री के पद पर बिठाया। ये आपके प्यार और सम्मान का ही फल है कि आज सिर्फ हमारे राज्य में नहीं, बल्कि पूरे देश में अतुल सिंह के नाम का डंका बज रहा है।”
अतुल सिंह की रैली चल रही थी। लोग अतुल की हर बात पर तालियां बजा रहे थे। आगे खड़े कुछ कार्यकर्ता ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे। जसवीर सिंह अतुल के पीछे मंच पर खड़े थे।

“क्या हाल है पत्रकार साहब?” समर जो अतुल का भाषण रिकॉर्ड कर रहा था, पीछे मुड़ा।
इंस्पेक्टर वीरेन्द्र समर के पीछे खड़ा था। समर ने वीरेन्द्र से हाथ मिलाया।
“कैसे हैं दरोगा जी! सब ठीक ठाक?” समर ने हल्के फुल्के अंदाज़ में कहा।
“बस लगे हुए हैं आपकी चौकीदारी में। पिछले कई दिनों से आप दिल्ली बहुत जा रहे हैं। क्या बात है?” वीरेन्द्र ने पूछा।
“आप मेरी जासूसी कर रहे हैं?” समर ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा।
“अरे नहीं सर। अब अगर कोई मंत्री जी पर हमला करने की खबर पहले आपको देता है तो हमें आप पर नज़र रखनी ही पड़ेगी।” वीरेन्द्र के चहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।
“आप का जो मन आये वो करें। पर मैं चाहूंगा कि मुझसे ज़्यादा ध्यान आप मंत्री जी और उनके पीऐ पर लगाएं।” समर ने कहा।
“आप पुलिस को मत बताइये कि पुलिस क्या करे समर जी। अपना काम करिये आप।” वीरेन्द्र ने समर की तरफ गुस्से से देखा। समर वापस मंच की ओर मुड़ गया।

तभी…
एक कानफोड़ू आवाज़ ने सबको चौंका दिया। भीड़ के बीचोंबीच खड़े एक आदमी ने मंच की तरफ बन्दूक तान रखी थी। उसने एक ओर गोली मंच की ओर चलाई।

अतुल और मंच पर खड़े सभी लोग नीचे झुक गए। वीरेन्द्र और समर दोनों उस आदमी की तरफ दौड़े। भगदड़ के बीच हमलावर बहुत तेज़ी से भाग रहा था। तभी समर को एक विचार सूझा। उसने पास खड़े एक पुलिस वाले का डंडा लिया और हमलावर के पैरों के बीचोंबीच मारा। हमलावर ठीक वैसे ही लड़खड़ा कर गिर गया जैसे समर मंत्री जी के घर पर गिरा था।

वीरेन्द्र ने उस हमलावर को खूब पीटा और बन्दूक उसके सिर पर तान दी।
“सर, मुझे मत मारिये सर। मैं तो बस हवा में गोली चला रहा था, सर। एक व्यक्ति ने मुझे पैसे दिए थे हवा में दो राउंड फायर करने के लिए। उस आदमी ने रोते हुए अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाल कर दिखा दी।”
वीरेन्द्र और समर ने एक दूसरे की तरफ देखा। दोनों ने मंच की और दौड़ लगायी। अतुल को मंच के पीछे बने सुरक्षागृह में ले जाया गया था। वीरेन्द्र रास्ते में सभी को धक्का मारते हुए आगे बढ़ा और समर उसके पीछे पीछे दौड़ता चला गया। वो दोनों सुरक्षागृह के अंदर पहुंचे।

“मंत्री जी, जसवीर कहाँ है?” वीरेन्द्र ने हाँफते हुए पूँछा।
“मैंने उसे मंच से उतरने के बाद नहीं देखा।” अतुल ने कहा।
“मैंने उन्हें शौचालय की ओर जाते देखा था।” एक सुरक्षाकर्मी ने कहा।
वीरेन्द्र और समर दोनों बाहर भागे। वीरेन्द्र ने अपनी गन निकाल ली। शौचालय का दरवाज़ा अंदर से बंद था। वीरेन्द्र उसे तोड़ने की कोशिश करने लगा। तभी समर ने कहा –
“वीरेन्द्र, इधर देखो।”
उसने एक रोशनदान की ओर इशारा किया।
“मैं तुम्हें पकड़ता हूँ। तुम ऊपर चढ़ जाओ।” समर ने वीरेन्द्र से कहा।
वीरेन्द्र की भारी कद काठी की वजह से समर उसे संभाल नहीं पाया और वह गिर गया। इस पर वीरेन्द्र ने कहा, “मैं तुम्हें पकड़ता हूँ, तुम ऊपर चढ़ो। अंदर से दरवाज़ा खोल देना।”

वीरेन्द्र के हाथ पर पैर रख कर समर रोशनदान पर चढ़ा। वीरेन्द्र दरवाज़े की तरफ दौड़ा।
कुछ ही देर में दरवाज़े की कुण्डी खुलने की आवाज़ आयी। समर के दरवाज़ा खोलते ही, वीरेन्द्र ने अंदर दौड़ लगा दी। उसने एक एक कर सभी शौचालयों के दरवाज़े खोल दिए।

पहला दरवाज़ा, दूसरा, तीसरा, चौथा… और फिर पाँचवाँ दरवाज़ा खुला।

जसवीर सिंह की लाश अंदर पड़ी थी। उनका गला तेज़ धार वाले हथियार से रेत दिया गया था। समर और उसके पीछे बाकि के सुरक्षाकर्मी अंदर आये। अतुल सिंह भी अंदर आये। सामने जसवीर की लाश देख कर उनका चहरा सफ़ेद पड़ गया।
“गोली सिर्फ ध्यान बटाने के लिए चलायी गयी थी। उसे पता था कि हमारा सारा ध्यान उस हमलावर की तरफ हो जाएगा। उसे इस बात का भी अंदाजा था कि ऐसे हालातों में सुरक्षाकर्मी आपको अकेले अंदर ले जाएंगे और जसवीर अकेले होंगे। हमारा अंदाजा गलत था मंत्री जी। वो हम सब से दो कदम आगे निकला।” वीरेन्द्र ने गंभीर आवाज़ में कहा।

समर मुड़ा और बाहर जाने लगा। अतुल ने उसे रोका।
“समर, कहाँ जा रहे हो?”
“उसने अपने आपको सही साबित कर दिया मंत्री जी। जसवीर सिंह की जान बच सकती थी। मुझे ये पहले ही कर देना चाहिए था।” समर ये कहकर बाहर चला गया।

अतुल और वीरेन्द्र जानते थे कि समर किस बारे में बात कर रहा है।
अगले दिन के दैनिक समाचार के फ्रंट पेज की सबसे बड़ी खबर थी –
“मंत्री अतुल सिंह की जान खतरे में। हमलावर ने धमकी देकर पीऐ जसवीर की हत्या की।”


रोंदू


THE EDITING STARTUP

कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी बस या रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे हैं, और सामने बैठा व्यक्ति अपनी आँखों की नमी को पौंछ रहा हो? क्या आपने किसी बुज़ुर्ग को रफ़ी के गाने सुनते हुए, भावुक होते देखा है? बाकियों को छोड़िये, क्या स्कूल या कॉलेज में आपके किसी दोस्त को मेज़ पर सिर नीचे किये बैठे देखा है?

रोना, एक भावनात्मक प्रक्रिया है। इंसानों के अंदर स्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने की क्षमता होती है। हम जब बहुत दुखी, बहुत गंभीर, या कई बार बहुत खुश भी होते हैं, तो आँखों से आंसू बह निकलते हैं। लेकिन क्या रो देना, कमज़ोर होने का चिन्ह है? कुछ लोग सोचते हैं कि रोना कमज़ोर होने का प्रतीक है। रोना तो शायद, सिर्फ लड़कियों का काम है। एक लड़का, एक आदमी कभी रो नहीं सकता।

मैं ऐसा नहीं मानता।

मुझे इस बारे में कोई तकनीकी जानकारी नहीं है, पर मेरे अनुसार रोना दो तरह का होता है – एक वो रोना, जिसमें अत्यधिक ख़ुशी, अत्यधिक ग़म, या किसी भी तरह के भावनात्मक चरमोत्कर्ष पर आँखों से आंसू निकल आते हैं। दूसरा रोना, वो रोना जब आप किसी चीज़ को बहुत वक्त तक अपने अंदर दबा के रखते हैं, और दबाते दबाते एक ऐसी स्थिति आती है जब आप का गला रुंध जाता है और आँखे भर आती हैं।

पहले “पहले” रोने की बात कर लेते हैं। बड़े से बड़ा तीस मार खाँ हो, कोई बन्दा जो अपने आपको सबसे बड़ी तोप समझता हो, जिसने सारी उम्र लठ बजाने के अलावा कोई काम नहीं किया, अपनी बेटी की शादी में रो देता है। ये भी बड़ी बात है यारों! बेटी की शादी के सभी कार्यक्रमों में हर कोई एक दो बार रो लेता है, सिवाय बाप के। पिता आदमी है। घर का बड़ा है। उसे सभी को संभालना है। बहुत सारे काम करने हैं। लेकिन जब वो अपनी बेटी को विदा होते देखता है तो 60 वर्ष का बूढा बाप 6 वर्ष के बच्चे की तरह रोने लगता है। बेटी की विदाई पर रोना, उस तीस मार खाँ, उस तोप को कहीं भी कमतर नहीं कर देता। वो उस वक्त की नज़ाकत है।

मुझे ये कहते हुए बिलकुल शर्म नहीं है कि मुझसे ज़्यादा मेरी बहन मेरे पिता का ख्याल रखती है। इस बात में कोई झूठ नहीं है की बेटियां पिता के ज़्यादा करीब होती हैं। माँ जब बीमार होती है, तब पिता भूखे पेट न सोये, इस बात का ख्याल घर की  बेटियों को पहले होता है। और इसीलिए शायद, उसी बेटी की विदाई पर पिता को लगता है कि शायद उसका एक “रखवाला” काम हो गया है। जन्म से लेके अब तक, सारी यादें उसकी आँखों के सामने घूमती है और एक ही पल में घर का सबसे बड़ा मर्द भरी भीड़ में बिलख कर रोता है।

किसी अपने के दुनिया छोड़ जाने पर, आप कितने भी मज़बूत क्यों न हो, आपकी आँखे नम हो ही जाती हैं। आप जैसे ही देखते हैं कि जाने वाला अपने पीछे जिन्हें छोड़ गया है, उनका क्या हाल है, आप का मन अंदर ही अंदर पलटियां खाने लगता है। आप दुनिया को, वक्त को, ज़िन्दगी को, कोसते हैं। और आप रो देते हैं।

गलत नहीं है। रोना, और किसी के लिए रोना, साबित करता है कि आप कितने सच्चे हैं, और लोगों से आपका नाता कितना सच्चा है। आप इसलिए नहीं रोते क्योंकि आप एक कमज़ोर इंसान है, आप इसलिए रोते हैं क्योंकि आप “इंसान” हैं।

अब दूसरे वाले रोने की बात कर लेते हैं। अँधेरे कमरे में अपने बिस्तर पर अकेले बैठा एक लड़का, अपनी ज़िन्दगी के हर छोटे बड़े अनुभव को याद करता है। वो दिन-ब-दिन कोशिश करता है कि अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बना सके। लेकिन हर रोज़ ज़िन्दगी के थप्पड़ अपने गाल पर खाकर घर लौट आता है। कई देर तक खुद को रोकता है, फिर एक दम से उसकी आँखों से आंसू बहने लगते हैं।

पहले और दूसरे वाले आंसुओं में फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वाले आंसुओं को पौंछने के लिए आसपास के लोग होते हैं। दूसरे वाले आँसू आपको खुद पौंछने पड़ते हैं। और उसके लिए हिम्मत चाहिए यार! दूसरे वाले आंसुओं के लिए हिम्मत चाहिए।

“वो इस बात का सबूत नहीं है कि आप कमज़ोर हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि आप बहुत देर तक मज़बूत रहे।”

कई तरह की परेशानियां है। हर बंदे की अपनी परेशानियां हैं। दिन रात वो उनसे लड़ता है। दिन में असल में, रात को सपनों में। लड़ते हुए आँसू छलक जाना लाज़मी है। लेकिन लड़ते हुए रोना, आपको और लड़ने की ताकत देता है। वो एक संकेत है कि सबसे बुरा वक्त आप देख चुके हैं, अब जो भी होगा अच्छा होगा या फिर कम बुरा होगा।

कई बार कोई कारण नहीं होता। आपको बस रोना होता है। आप अपनी ज़िन्दगी में हर चीज़ से इतने ज़्यादा भड़क खाये बैठे होते हैं, कि आपको ज़रूरत होती है आंसुओं के ज़रिये अपने आप को ठंडा करने की। और इसलिए, इसमें लड़का या लड़की होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप रोना चाहते हैं, तो रो दीजिये। मन हल्का होगा। नींद भी अच्छी आएगी। कुछ पल के लिए ये सुकून भी रहेगा कि आज रो लिए, कल एक बार फिर कोशिश करते हैं। तुक्का लग गया तो ठीक, वरना फिर से रो लेंगे।

हंसी और आँसू , दोनों की एक ही खासियत है। दोनों मुफ्त में मिलते हैं।