तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं


आज आप जहां नज़र घुमाएंगे, वहीँ सीबीएसई के परिणाम की चर्चा है। कुछ लोग उनकी बात कर रहे हैं जो अव्वल आये हैं। कुछ लोग उनकी बात कर रहे हैं जो कुछ ख़ास नहीं कर पाये। एक जगह देखा तो उन बच्चों की प्रशंसा में कसीदे गढ़े गए, जिन्होंने परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन किया। फिर कुछ लोग ऐसे भी मिले जो इस बात से ख़फ़ा है कि अव्वल आने वाले बच्चों को नायक की तरह पेश किया जा रहा है। उनका कहना है कि इससे बाकि बच्चों के मनोबल पर गलत असर पड़ेगा।

दोनों ही अपनी अपनी जगह सही हैं।

मैं हमेशा कहता आया हूँ कि नंबरों से ज़िन्दगी में कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। फ़र्ज़ कीजिये कि मैं आपको साल के 365 में से कोई भी 6 दिन छांटने को कहूं जो आपके 6 सबसे बेहतरीन दिन होंगे, क्या आप छांट पाएंगे? क्या कोई बता सकता है कि साल के किन 6 दिनों में सेंसेक्स सिर्फ ऊपर ही जाएगा? जवाब है, नहीं! हर नया दिन एक नयी चुनौती लेकर आता है। जब तक आप किसी पल को जी न लो, आप ये नहीं कह सकते कि वो पल कैसा जाएगा। परीक्षाएं भी कुछ ऐसी ही होती हैं। साल के 6 दिन तय कर दिए गए, और उन 6 दिनों में आपका प्रदर्शन जो भी होगा, वो आपके पिछले एक साल की मेहनत को प्रदर्शित करेगा।

ये सुनने में जितना हास्यास्पद है, उतना ही बेहूदा!

मैं उन सभी को बधाई देता हूँ जो परीक्षा में प्रथम आए। और फिर उन सभी के बारे में सोचता हूँ जो दूसरे स्थान पर आये। ये वो लोग हैं, जो बुद्धिमत्ता, मेहनत, और लगन के मामले में पहले वालों से कहीं कम नहीं थे। पर शायद एक स्पेलिंग की गलती, या शायद एक सवाल के हल के सामने उसकी यूनिट न लिखने की गलती ने उन्हें एक कदम पीछे चलने को मज़बूर किया। तालियां उनके लिए भी बजेंगी पर शोर थोड़ा कम होगा। फोटो उनकी भी खींची जाएगी पर साइड में खड़े होने की वजह से शायद अखबार में छपते हुए उनकी एक कोहनी काट दी जाए। आप यकीन मानिए जनाब, सब लोग उन्हें बहुत प्यार देंगे। पर रात को सोने से पहले अपने बिस्तर पर लेटे हुए शायद वो यही सोचेंगे कि वो कौन सा सवाल था जिसका जवाब उन्होंने गलत दिया होगा।

बचपन से सुनता आया हूँ कि हाथ की पांच उंगलियां एक बराबर नहीं होती। बिलकुल नहीं होती यार! एक तो अंगूठा ही हो गया। अंगूठा हट्टा कट्टा है, अच्छा खान पीना, अच्छी देख भाल होती है उसकी। उसका बाकी उँगलियों के साथ मुकाबला बेमानी है। और फिर वो छुटकी सी ऊँगली, जो हाथ के सबसे आखिर में अकेली पड़ी होती है, जब घर का कोई काम होता है तो बाकी उँगलियों के साथ मिल कर काम कराती है। अब इस सब काम काज के साथ पढ़ाई भी करती है। लेकिन वो बाकी उँगलियों और उस अंगूठे का मुकाबला कैसे कर पाएगी। आपने एक मछली, एक बन्दर, एक सांप और एक मेंढक को एक ही दौड़ में दौड़ने के लिए कह दिया। मुक्केबाज़ी और कुश्ती में मुकाबला करने से पहले पहलवान का वज़न मापा जाता है। और उसके वज़न के आधार पर ही उसका मुकाबला एक बराबरी के पहलवान से करवाया जाता है।

दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये परीक्षाएं तय नहीं कर सकती कि आप कितने प्रतिभावान है। शायद जब सभी आपकी प्रतिभा को गणित के सवालों में खोज रहे थे, तब आपकी असली प्रतिभा आपके घर के कोने में रखे सफ़ेद बोर्ड, ब्रश और रंगों में आपका इंतज़ार कर रही है। शायद हारमोनियम के सात सुर राह देख रहे हैं कि कब आप अपनी उंगलियां उस पर दौड़ाओगे। शायद…

लेकिन…अब मैं उल्टी गंगा भी बहाना चाहता हूँ।

एक अजीब सी घृणा है लोगों में, उनसे ज़्यादा सफ़ल लोगों और उनकी प्रशंसा करने वालों के प्रति। मैं मानता हूँ कि हमारे यहां व्यक्तिविशेष का महिमामंडन करना आम है। लेकिन ये बच्चे जो इन परीक्षाओं में अव्वल आये हैं, वास्तव में प्रशंसा के लायक हैं। मैं खुद ये सब अपनी आँखों से देख चुका हूँ, इसलिए कह सकता हूँ। ये सब बच्चे बहुत होनहार है। किताबों के पहाड़ को पार करके,परीक्षाओं का बोझ अपने कन्धों पर उठा कर भी जिस दौड़ में ये लोग अव्वल आये हैं, शायद इनकी बड़ाई के लिए शब्द बने ही नहीं। पर लोगों को इनकी प्रशंसा पसंद नहीं। कोई इनके आचरण पर सवाल उठाएगा, तो कोई इनके चाल ढाल पर। कोई इनकी जाति पर सवाल उठाएगा, तो कोई इनके धर्म पर।

अखबार में खबर आई कि फलाना जाति की बच्ची ने अच्छे अंक प्राप्त किये इसलिए उनकी जाति के लोग उसे सम्मानित करेंगे। फिर कहीं सुना कि किसी ने आरोप लगाया कि इन बच्चों को तो हमेशा से आरक्षण मिलता आया है। सरकार द्वारा सुविधाएं मुहैया कराई गयी हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या इस सब से उस बच्ची की सफलता पर सवाल उठाये जा सकते हैं?

आईएस परीक्षा में प्रथम स्थान लाने वाली टीना डाबी को इसलिए बदनाम किया जा रहा है क्योंकि वो SC कैटेगरी से हैं। मुझे बस एक बात समझाइये, अगर वो SC हैं तो क्या उनका प्रथम स्थान पर आना कोई मायने नहीं रखता? हर पढ़े लिखे इंसान को पता है कि परीक्षा परिणाम में प्रथम आने वाले हर कैटेगरी में प्रथम आते हैं। SC कैटेगरी में प्रथम आने वालों का नाम अलग से बताया जाता है। फिर ये हाय तौबा क्यों? हमारे देश में UPSC और CBSE का परिणाम आते ही सबसे पहला काम यही होता है कि अव्वल आने वाले छात्रों की FAKE ID बना दी जाती है। फिर उनके नाम से पता नहीं क्या क्या फैलाया जाता है।

दुनिया जानती है की परीक्षाओं में नंबर लाना कोई आसान काम नहीं। सीबीएसई और यूपीएससी न सिर्फ बुद्धि की परीक्षा लेती है, बल्कि एक बच्चे के धैर्य और उसके मानसिक संतुलन को भी झकझोड़ देती है। ऐसे में सलाम कीजिये उन बच्चों को जिन्होंने इस आग के दरिये को पार किया। कम से कम आज के दिन तो उनके लिए मेरे दिल में कोई गलत विचार लाना भी गुनाह समझूंगा!

जब हम उन लोगों की बुराई करते हैं जो इन बच्चों की प्रशंसा कर रहे हैं तब शायद हम ये भूल जाते हैं कि परीक्षा के परिणाम आने से पहले आप अपने बहन, भाई, बेटी, बेटे के लिए यही प्रार्थना करते हैं कि वो अच्छे अंकों के साथ परीक्षा में अव्वल आये। और इसीलिए मैं एक गम्भीर मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ। परीक्षा में 40 प्रतिशत अंक कोई मायने नहीं रखते। आप परीक्षा में पास ज़रूर हो जाएंगे पर न ही आपको किसी अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिलेगा, और एक अच्छी नौकरी ढूंढने के लिए भी आपको दूसरों से ज़्यादा मेहनत करनी होगी। ये परीक्षाएं कहने के लिए परीक्षाएं हैं पर आपके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। आनेवाले कुछ सालों में हर दूसरे फॉर्म पर इन्हीं परीक्षाओं के अंक लिखे जाएंगे, जो आपको रह रह कर याद दिलाएगा कि काश कुछ मेहनत और कर ली होती तो सब ठीक हो जाता।

खैर, मेरा यही मानना है कि सभी किसी ने किसी तरीके से विशेष हैं। कमी बच्चों में नहीं, उन्हें जांच करने के लिए बनाये गए मापदंडों में हैं। जब 40 प्रतिशत अंकों का कोई मोल ही नहीं है, तो पास करते ही क्यों हैं? बढ़ाकर कर दीजिये पास होने का मापदंड 75%। आपका EDUCATION SYSTEM, आपके बोर्ड और उनकी परीक्षाएं, सब के सब ढकोसले है।

पहली बार मैं अपने ब्लॉग में समझ ही नहीं पाया कि सही क्या है और गलत क्या। पर ये वक्त सही और गलत का फैसला लेने का नहीं है। आँखे बंद कीजिये, गहरी सांस लीजिए और उन बच्चों के बारे में सोचिये। वो, जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया, शायद अपने सपनों की उड़ान को थोड़ी और ऊँची कर देना चाहेंगे। वो, जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया पर अव्वल नहीं आ पाये, शायद एक रोटी काम खाएंगे। भगवान को धन्यवाद करेंगे पर फिर ये गुज़ारिश भी करेंगे कि अगले बार और अच्छा करने की ताकत दे। वो, जो इस परीक्षा में अच्छा नहीं कर पाये, शायद जान पहचान वालों के सामने नहीं आना चाहते होंगे कि कोई उनका परिणाम न पूछ ले। ये कुछ दिन, एक पूरी GENERATION के लिए भारी पड़ने वाले हैं। कुछ जो अपने जीवन में बहुत खुशिया पाने वाले हैं, और कुछ जो जीवन में गलत रास्तों पर चलना चाहेंगे।

100 अंकों के मापदण्ड में बच्चों की ज़िन्दगी का फलसफा लिखने वाले लोग भूल गए, ये परीक्षाएं सिर्फ इन बच्चों की नहीं, बल्कि हमारे समाज की, हम सब की है। और ये परिणाम भी, सिर्फ इन बच्चों के नहीं, हम सब के हैं। और शायद ये परीक्षाएं हैं ही नहीं। ये बच्चों की मासूमियत की हत्या का एक तरीका है। विडम्बना ये है कि हम सब इसके कातिल हैं और ये इकलौता ऐसा अपराध है जो सरेआम होता है पर फिर भी इसकी कोई सज़ा नहीं।

और कुछ लिखने का मन नहीं है। इसे बंद करके थोड़ी देर शान्ति से बैठना चाहता हूँ। फिल्म ‘मासूम’ का गाना सुनना चाहता हूँ –

“तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं।
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं।”

THE EDITING STARTUP

वो नहीं, तो हम कुछ भी नहीं!


“Mother’s Day”, एक दिन जो माँ को समर्पित है।

सुबह से देख रहा हूँ कि लोग अपनी DP बदलकर, Facebook पर स्टेटस लिखकर अपनी माँ के प्रति सम्मान जता रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि Social Media पर जताए गए सम्मान का कोई मोल नहीं। मैं नहीं मानता। कम से कम आज के दिन तो बिलकुल नहीं।

कहीं सुना था “There is nothing in this world which Google doesn’t know.”
अगर आप गूगल पर mother का मतलब ढूंढेंगे तो ये जवाब मिलेगा- “a woman in relation to a child or children to whom she has given birth”. यानि वो महिला जिसने जन्म दिया हम उसे माँ कहते हैं। मैं भी हैरान था। गूगल कैसे गलत हो सकता है? सोचा कि कहीं “See More” का option होगा। कुछ तो और लिखा होगा!

गूगल ने निराश किया तो हिंदी साहित्य की तरफ कदम बढ़ाये, पर निराशा ही हाथ लगी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है “नारी तुम केवल श्रद्धा हो”। नारी केवल श्रद्धा नहीं है यार! नारी को सिर्फ एक विशेषण में बांधना सरासर नाइंसाफी है। शायद इसीलिए मैं इन सब दिनों पर ठीक से कुछ कह नहीं पाता। Mother’s Day, Women’s Day… इतना सब होता है मन में, पर कभी कुछ बोल ही नहीं पाता।

माँ का अर्थ गूगल कभी इसलिए नहीं बता पाएगा क्योंकि उसके database में इतनी जगह ही नहीं है, जो इन शब्दों को अपने अंदर समाहित कर सके। हिंदी क्या, किसी भी भाषा के साहित्य में इतने शब्द नहीं है कि माँ और नारी का अर्थ समझा सके। लोग पूछते हैं कि क्या पुरुष और महिलाएं बराबर हैं? मैं कहता हूँ, “नहीं”। पुरुष और महिला कभी समान नहीं हो सकते। पुरुष हमेशा कमतर ही रहेगा। बुरा मत मानिए, पर मैं ये साबित कर सकता हूँ।

ज़रा सोचिये, आपके दिमाग में ‘चमत्कार’ शब्द सुनते हीं क्या विचार आता है? इतने पेड़ पौधे हैं, इतनी सारी ऋतुएं हैं, इतनी बेहतरीन तकनीक हैं, इंसान अंतरिक्ष में पहुंच चुका है। ये सब चमत्कार ही तो है। पर इस दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार क्या है ? आपके लिए चाहे कुछ भी हो, मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार किसी को नयी ज़िन्दगी देना है। ज़रा सोचिये, अगर मैं आपको कहूं कि क्या आप किसी नयी ज़िन्दगी को जन्म दे सकते हैं तो आप का उत्तर क्या होगा? भगवान के अलावा किसी में ताकत नहीं किवो किसी नयी ज़िन्दगी की शुरुआत कर सके।

पर वो कर सकती हैं। दुनिया की सब शक्तियां एक तरफ, और एक इंसान को जन्म देने की शक्ति एक तरफ! मैंने सुना है, एक बच्चे को जन्म देते हुए एक महिला को हज़ारों सुईयां चुभने जितना दर्द होता है। पर वो सारा दर्द सिर्फ उस क्षण तक रहता जब तक उसे उसके बच्चे का चेहरा नहीं दिख जाता।

सिर्फ यही नहीं, आप जितना दर्द माँ बनते वक्त सहती हो, उससे ज़्यादा तकलीफें एक बीवी, एक बेटी बनकर सहती हो। मैं भारत में रहता हूँ। मेरे देश में लाख खूबियां हैं, पर जब बात लड़कियों की आती है, हमें कुछ हो जाता है। चाँद पर पहुँच चुके हैं हम! पर आज भी गावों में छोटी छोटी बच्चियों का विवाह कर दिया जाता है। हमारे देश के परिधान, जो हमारी पहचान है, कब आपकी बेड़ियां बन गए पता हीं नहीं चला। राजस्थान मेरा पसंदीदा राज्य है। बहुत सारी यादें जुडी हैं इस राज्य से। छोटा सा था तब से वहां आना जाना था। आज जब मेरी उम्र के साथ साथ धरती का तापमान भी बढ़ गया है, राजस्थान की महिलायें आज भी वही लाल रंग के घूँघट वाला परिधान पहनती हैं। ठसाठस भरी भीड़ में जहाँ इंसान सांस लेने में दिक्कतें महसूस करता है, वहां ज़ेवरों से लदी हुई लम्बे घूँघट में मुंह छिपाए उन महिलाओं का क्या हाल हो रहा है, सोचने में भी दिमाग घूम जाता है। इस बात का एहसास तब हुआ जब हमारे सामने उनमें से कुछ महिलाएं चक्कर खा कर गिर पड़ी। चेहरे से घूँघट हटा तो पता चलता था कि जिस उम्र में उनके हाथ में किताबें होनी चाहिए थी, उन हाथों में कोहनी तक चूड़ियां पहनाकर उनके भाग्य का फैसला कर दिया गया है।

मैं नौकरी करने अपने घर से दूर एक शहर में रहता हूँ। कई बार जब रात को नींद नहीं आती है तब अँधेरे में अपने बिस्तर पर बैठे बैठे आँखे बंद करके अपने घर को याद करता हूँ। अपने मोहल्ले की गलियों को याद करता हूँ। घर पर फ़ोन करता हूँ तो सब बहुत अपनेपन से बात करते हैं। एक एहसास रहता है कि आज भी घर वहीँ हैं और घरवाले भी। पर आपको तो अपने ही पराये कर देते हैं। समझना चाहता हूँ मैं कि आप लोगों में अपनों को छोड़ कर किसी और को अपना बना लेने का हौसला कहाँ से आता है? कई बार अपने धर्म और संस्कृति के नियम समझ से बाहर हो जाते हैं।

खैर, मेरी माँ मेरे सामने बैठ कर खाना खा रही हैं। आज से 28 साल पहले जब मेरे पापा मेरी माँ को ब्याह कर लाये थे, तब से आज तक उनमें बहुत फर्क आ चुका होगा। सुना है पुराने घर में रसोईघर चारदीवारी से घिरा था जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। राजस्थान की जड़ें थी तो जीभ पर मिर्ची का स्वाद ज़्यादा ही जचता है। कढ़ाई में लाल मिर्च का छौंक मारते मारते कब दमे की बीमारी को अपने गले से लगा लिया पता ही नहीं चला। आज भी रात को उन्हें होमियोपैथी की पांच सफ़ेद गोलियां लेते हुए देखता हूँ तो मन में अपने ही घरवालों के लिए झुंझलाहट उठती है।

कई बार रास्ते में चलते हुए वो पीछे छूट जाती हैं। घुटने और कमर का दर्द सिर्फ उन्हें ही नहीं, हमें भी महसूस हो जाता है। घर की छत पर कपडे सूखाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी पर एक हाथ में कपड़ों की बाल्टी लेकर चढ़ते हुए उनकी कमर की मांसपेशियों खींच गयी थी। फिर भी जब परिवार के काफी लोग इकट्ठे हो जाते हैं, तो भाग भाग कर काम करती है।

मेरी माँ एक Rockstar है।

मैं आप सबके सामने नतमस्तक इसलिए हूँ क्योंकि मेरी माँ ने मुझे नारी शक्ति की इज़्ज़त करना सिखाया है। मुझे अपने हाथ से तोड़े हुए रोटी के निवाले में कभी इतना स्वाद नहीं आया, जितना माँ के हाथों से तोड़े हुए रोटी के निवाले को खा कर आता है। मेरे जीवन में सुकून के पल बहुत से हैं, पर उस पल का सुख अलग ही है जब माँ सुबह सुबह “मंगल भवन अमंगल हारी” वाली चौपाई गाती हैं।

मन कर रहा है कि उन्हें Mother’s Day की बधाइयाँ दूँ। पर उन्हें सुकून से खाना खाते हुए देखना अच्छा लग रहा है। मैं इस पल में कुछ भी बदलाव नहीं चाहता। जैसा है, बस सब वैसा ही रहे। माँ का मतलब न तो गूगल समझा पाएगा, न ही मैं। जाइये, और अपनी माँ, बीवी, बेटी, सभी को गले लगा कर उनका धन्यवाद कीजिये। वो हैं, तो हम हैं। वो नहीं, तो हम कुछ भी नहीं!


मन की बात


अनंत बेरीवाल

कि रोज़ चमकती थी शामियाने पे मीठी धुप सूरज की,
और रात चाँद से बतियाते निकलती थी।
बादलो की बारिश को तूने चुना है,
मेरे लिए तो सारा आसमां तू ही था।

कभी सीधे मिलते थे दिलो को तेरे मेरे बीच के कच्चे रास्ते,
पगडंडियों पे आज भी हमारे छोड़े निशान मौजूद होंगे।
सरहदें और दीवारे तूने तैयार की है,
मेरे लिए तो सारा जहां तू ही था।

हर याद का एक लम्हा दीवारों पे लगा रखा था
रात तेरे सपने तकिया बना कर सोते थे।
घरोंदो की खिलखिलाहट तूने पीछे छोड़ी है,
मेरे लिए तो आखिरी पनाह तू ही था।


मैं और तुम


अनंत बेरीवाल

कि ज़िन्दगी की छोटी छोटी खुशियों का फ़लसफ़ा कुछ यूँ है…
तेरे साथ सालो में एक बार होने वाली बात ही यादगार हो होती है।

कि मीलों चलने का दम देने वाली ख्वाहिशों की वफ़ा कुछ यूँ है…
तेरे साथ सालो में एक बार होने वाली मुलाकात ही यादगार हो होती है।


देखते ही देखते ये क्या हुआ


मैं गुडगाँव गुरुग्राम में हूँ और अभी जब नल चलाया तो 3 बूँद टपकने के बाद पानी चला गया। मैंने फटाफट अपने बाथरूम में बाल्टी नीचे लगा कर नल चलाया तो उसकी तली गीली करने के बाद वो नल भी खाली हो गया। नीचे जाकर मकान मालिक से बात की तो पता चला, पानी तो कल सुबह 2 बजे आएगा। सीढ़ियों पर पैर पटकते हुए मैं वापस ऊपर आया और एक आदमी को फ़ोन किया कि पानी का 20 लीटर वाला कंटेनर घर दे जाए। भला हो उस आदमी का, 5 मिनट में 1.5 बाल्टी पानी भर गया। जैसे तैसे काम चलाया और बिस्तर पर छलांग लगा दी। खिड़की से धूप आ रही थी। बंद करने उठा तो देखा कि नीचे कुछ महिलायें सिर पर बर्तन लेकर, कुछ आदमी साइकिल पर ड्राम रख कर ले जा रहे थे।

काश शहर का नाम बदलने से पहले सरकार पानी के हालात बदल देती। सड़क के उस पार की ऊँची इमारतों की तस्वीर दिखा कर विकास का झूंझना बजाने वाले, सड़क के इस पार की झुग्गियों को ऐसा नज़रअंदाज़ करेंगे सोचा न था। आज द्रोणाचार्य होते तो हरियाणा सरकार का अंगूठा नहीं काटते..!

खिड़की बंद करने के बाद अपने कमरे में अकेला बैठकर बस एक ही चीज़ के बारे में सोच रहा था –
“मेरा तो आज का काम चल गया। पर लातूर वालों का क्या हाल हो रहा होगा?”

यकीन मानिए, जब देश में लोग देशभक्ति और राष्ट्रवाद का लाइसेंस बाँट रहे थे तब अख़बार के कोने में छोटे अक्षरों में लिखी खबर पर नज़र पड़ी कि मराठवाड़ा में एक और किसान ने आत्महत्या की। थोड़ा गूगल किया तो पता चला कि पिछले दो ढाई साल से ऐसे ही हालात है। ज़्यादातर तालाब और कुएँ सूख चुके हैं। लोग उन तालाबों से पानी भर के पी रहे हैं जिनमें भैंसे नहाती हैं। कुएं की दीवार से रिस रहे पानी को भरने के लिए लोग जान जोखिम में डाल कर कुएँ के अंदर उतर रहे हैं। 1 घंटे में पानी रिस रिस कर तली में इकठ्ठा होता है जिससे 1 बाल्टी पानी तो भर ही जाता है।

मैंने अपना लैपटॉप एक तरफ रखा और आँखे बंद करके लम्बी साँसे लेने लगा। मैं नहीं चाहता था कि गुस्से में आके अपने कमरे में तोड़फोड़ करूँ। ब्लॉग लिखते हुए गाली भी नहीं दे सकता। पर आप समझ जाइये। पिछले 2 साल से बुंदेलखंड और मराठवाड़ा में किसान सूखे की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं। इंसान और जानवर एक ही तालाब का पानी पी रहे हैं और यहाँ हम सरदार पटेल के “स्टेचू ऑफ़ यूनिटी” से लेकर विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने में लगे हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि हमारे अंदर की इंसानियत कहाँ मर गयी है? क्या आप एक प्यास से सूखे गले से “भारत माता की जय” बुलवा पाएंगे? बुलवा भी लेंगे तो ऐसी राष्ट्रभक्ति पर थू है।

ये मत सोचिये कि मैं इस समस्या को राजनीतिक अमलीजामा पहना रहा हूँ। नहीं! अभी मेरा आपकी राजनीतिक भक्ति पर लाँछन लगाने का कोई विचार नहीं है। मैं तो बस इतना पूछना चाहता हूँ कि हमारी प्राथमिकता क्या है? बेमतलब देशभक्ति की ट्यूशन देना? या सूखे और क़र्ज़ से दबे किसानों की ज़िंदगियों को बचाना? इस सूखे के कई कारण हैं- धरती का तापमान बढ़ रहा है, प्रदूषण भी बढ़ रहा है, वर्षा नहीं हुई है। सब मान लिया। पर ढाई सालों से एक जगह पर सूखे के हालत है जनाब! ढाई साल आप इसे नज़रअंदाज़ करते रहे? जितनी बार मैं “ढाई साल” बोलता हूँ, उतना ही मेरे खून में उबाल आ रहा है।

आंबेडकर की 125वी जयंती पर सभी नेताओं ने भाषण दिए। रैलियां की। सभी ने आंबेडकर को अपना बताने की कोशिश की। कितना आसान है न ये सब? गरीब, दलित और किसान बिलकुल उसी तरह अपनाए जाते हैं जैसे स्कूल के बच्चे क्रिकेट खेलने से पहले अपनी टीम बांटते हैं। “तू मेरी साइड, तू उसकी साइड”! आंबेडकर की रैली में “दलित हमारे साथ हैं” और द्रोणाचार्य जयंती और परशुराम जयंती पर “ब्राह्मण हमारे साथ है”! काश मुझ में ऐसी शक्ति होती कि मैं आंबेडकर, द्रोणाचार्य और परशुराम को नीचे धरती पे बुलाता। द्रोणाचार्य और परशुराम तो धनुष और फरसा निकाल लेते। पर आंबेडकर?

आंबेडकर सीधे संसद भवन जाते और उस हीलियम के बक्से को तोड़ कर उसमें से संविधान की असली प्रति निकालते और राजपथ पर फाड़ कर उसके टुकड़ों में आग लगा देते।

माफ़ करे अगर आपको ये बात चोट पंहुचा गयी। मैं भावुकता में ये सब नहीं कह रहा। क्या फायदा ऐसे संविधान का जहां आज़ादी के 68 साल बाद भी आपके यहां एक राज्य के अंदर 3 महीने में 273 किसान आत्महत्या कर रहे हैं? इस पंक्ति को टाइप करते हुए जितनी ज़ोर से मैं मेरे कीबोर्ड को दबा रहा हूँ, उतनी ही ज़ोर से मैं ये दुआ कर रहा हूँ कि एक और किसान अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म करने के बारे में न सोच रहा हो।

आज सुबह एक और किसान ने आत्महत्या की। उड़ीसा का एक किसान जिसने अपने कोल्ड स्टोर के लिए 80 लाख रुपया बैंक से उधार लिया था, फसल चौपट होने की वजह से सब गवां बैठा। प्रशासन ने 50 प्रतिशत सब्सिडी का वादा भी नहीं निभाया। किसी तरह 6 लाख रुपये बैंक में जमा किये पर बाकि पैसों का जुगाड़ न कर सका। जिस क़र्ज़ के पैसे से कीटनाशक खरीदा था, क़र्ज़ न चुकाने की वजह से वही कीटनाशक खा कर उसने अपनी जान दे दी। आप लोग माल्या को लंदन जाने देते हैं जिसने क़र्ज़ के हज़ारों करोड़ नहीं चुकाए? एक किसान 6 लाख रुपये चुकाने के बाद भी अपनी जान दे देता है।

अब मैं और कुछ नहीं बोलना चाहता। दिमाग बहुत ज़्यादा ख़राब हो चुका है। शायद मुझे सो जाना चाहिए। सपनों की दुनिया में बहुत पानी होगा। हरे भरे खेत होंगे। कोई किसान आत्महत्या नहीं कर रहा होगा। पर जैसे ही आँख बंद करता हूँ, एक दृश्य दिमाग में आता है। दूर क्षितिज तक जहाँ सूरज अस्त हो रहा है, धरती बिलकुल सूख चुकी है, बड़ी बड़ी दरारे हैं और एक किसान हल कंधे पर टांग कर उस क्षितिज की तरफ बढ़ रहा है।

हर ब्लॉग में अंत में मैं एक गाने की पंक्तियाँ लिखता हूँ। आज खानदान फिल्म का एक गाना याद आ रहा है-

“कल चमन था, आज एक सहरा हुआ। देखते ही देखते ये क्या हुआ।”


सपनों की कीमत


कुछ दिन पहले मैं शहर के मुख्य चौराहे पर खड़ा था। चौराहे के एक ओर किताबों की बहुत सारी दुकानें हैं। तपती धूप में जहाँ मैं जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहता था, वहीं करीब 50 लोगों की भीड़ उन दुकानों को घेरे हुए खड़ी थी। पहले तो समझ नहींआया कि इतनी भीड़ कहाँ से आ गयी ? फिर याद आया कि स्कूलों का नया सत्र शुरू हो गया है। हम भी अप्रैल के पहले हफ्ते ऐसे ही किताबों की दुकानों के चक्कर लगाया करते थे।

मुझे याद आया कि मुझे भी एक पेन लेना है। बार बार गर्मी में शहर के चक्कर कौन लगाएगा? मैं भी उन दुकानों की ओर बढ़ चला। भीड़ जब दूर से नज़र आये तो भीड़ होती है। पास जाने पर भीड़ के अलग अलग चेहरे हैं। अलग मजबूरियाँ हैं।

” भैया, एक कणिका भाग-2 देना।” एक महिला ने दुकानदार से कहा।
“अरे छोटू, आठवीं की हिंदी की NCERT दे मैडम को!” दुकानदार ने बिना अपनी नज़रे उठाये किसी छोटू को आवाज़ लगाई।
वो दुकानदार एक कागज़ के टुकड़े पर हिसाब कर रहा था। उसने कुछ अंकों का जोड़ किया। एक बार उस जोड़ को दोहराया और फिर सामने खड़े आदमी की तरफ देख कर बोला,”3000 हो गए आपके।” सामने खड़ा आदमी अपनी जेब से पैसे निकालकर गिनने लगा। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि किताबों का खर्च 3000 को छू जाएगा।

“बाबूजी, 3000 तो नहीं है। अभी पिछली दूकान पर कॉपियों के पैसे देकर आया। उसने भी जिल्द समेत कॉपियां देने के 500 रुपये मांग लिए। अभी मेरे पास सिर्फ 2700 हैं।” उस व्यक्ति ने कहा।
“भाईसाहब, 3000 से एक कम नहीं लूंगा मैं।” ये कहकर दुकानदार ने किताबों की थैली उठा कर एक तरफ रख दी।
“जब पैसे हो तब ले जाना।” ये कहकर दुकानदार दूसरे ग्राहकों के साथ व्यस्त हो गया।
वह व्यक्ति बार बार अपने पैसों को गिनता है। अंदर बाहर की सारी जेबें टटोलता है। फिर भारी मन के साथ वहां से चला जाता है। मैं उसकी बोली और लिबास से अंदाज़ा लगा पाया कि वो शहर का नहीं है। उस आदमी के आँखों से ओझल होने के साथही मेरे मन के अंदर भी कुछ डूब गया।

अपना पेन लेकर मैं अपने घर की ओर बढ़ने लगा।

नागरिक शास्त्र की जिन किताबों को बच्चे आज खरीद रहे होंगे, उसमें लिखे शिक्षा के अधिकार की धज्जियाँ मेरी आँखों के सामने ही उड़ रही थी। बेवजह ही हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते हैं। बेवजह ही गरीबी और अशिक्षा कारोना रोते हैं। मैंने 2015 की तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट पढ़ी जिसमें 47 रुपये दैनिक कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इसका मतलब महीने में 1410 रुपये कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है, पर वो अपने बच्चे को 11वी की पढाई नहीं करा सकता।”पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा अपनी आँखों के सामने मटियामेट होते देख संविधान से मेरा विश्वास ही उठ गया। मन किया कि उन सब लोगों का गला पकड़ लूँ जो ज़ोर शोर से भारत की तरक्की का बिगुल बजा रहे हैं। 100 रुपयेदैनिक भत्ते पर काम करने वाले मनरेगा के मज़दूर का बच्चा जब पीली टोपी वाले इंजीनियर को देख कर उसके जैसा बनने का सपना देखता है, तो वो गलत है। उसका कोई हक़ नहीं है कि वो सपने देखे।

“सपने देखने के लिए रोकड़ा लगेगा यार! जो तेरे बाप के पास नहीं है।”

घर पहुँचते पहुँचते हर उस लड़के, लड़की के लिए मन में सम्मान हुआ जो बिना मोटी किताबों के, बिना महंगी ट्यूशन के, तपती गर्मी में बिना AC के, एक धीमे धीमे घूमते पंखे के नीचे बैठ कर, प्याज और धनिया की चटनी के साथ रोटी खा कर,अपनी पढाई पूरी करने में लगे हैं। सम्मान हुआ उन माँ बाप के लिए जो सुबह से शाम तक सिर्फ इसलिए मेहनत कर रहे हैं ताकि उनका बच्चा भी किसी JEE, PMT या UPSC की परीक्षा पास कर दे और ज़िन्दगी में वो सब खुशियाँ पाये जो उन्हें नहींमिल सकी।

ये लड़ाई नंबरों की नहीं है जनाब, ये लड़ाई सपनों की है। कौन कहता है सपनों की कीमत नहीं होती? तीन तीन हज़ार में किताबों की दुकानों पर बिक रहे हैं सपने। मन करे तो खरीद लीजिए!

THE EDITING STARTUP

अनोखी फरमाइश


तेज़ बारिश की बूंदे सड़क पर तड तड करके गिर रही हैं। बारिश की बूंदों और तेज़ हवा के अलावा सड़क पूरी तरह खामोश है। सड़क के पास वाले घर के पहली मंज़िल की खिड़की पर खड़े आनंद शर्मा, बाहर की बारिश देख रहे हैं। आनंद शर्मा एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर है। उम्र कुछ 75 की होगी। सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने शर्मा जी, हल्की सी खिड़की खोलते हैं। ठंडी हवा और कुछ बारिश की बूँदें उनके चेहरे पर पड़ती हैं। और तभी…

“खिड़की बंद कर दो जी। इतनी रात को भूतों की तरह क्या खड़े हो खिड़की पर।” पीछे से आवाज़ आती है।
“भूतों की तरह नहीं श्रीमती जी, भूत ही कहिये। आपके साथ रहके जीता जागता इंसान भी भूत ही हो जाए। “

मिलिए श्रीमती बिमला शर्मा जी से। आनंद जी की धर्मपत्नी। सफ़ेद बाल और झुर्रियां उनकी उम्र का अंदाज़ा देती है। वो घर की मुखिया है। 52 साल हो गए हैं शादी को, पर पति पत्नी की नौकझौंक आजतक चल रही है।

“मेरे साथ की बात छोडिए। सर्दी लग गई तो कुछ दिनों में आप हम सब का साथ छोड़ देंगे। ” बिमला जी ने जवाब दिया।
“यार तुममें कुछ शर्म लिहाज है कि नहीं। कोई ऐसे बोलता है क्या अपने पति को। मन करता है तलाक दे दूँ। पर लोग कहेंगे इस उम्र में बुढ़िया को बेसहारा छोड दिया।” शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“बुढ़िया की फ़िक्र न करो। ये कहो कि बुड्ढे को कोई और नहीं मिलेगी इसी उम्र में।” बिमला जी ने फिर तंज कसा और चद्दर मुंह पर डाल कर सो गयी।

शर्मा जी का चाय पीने का मन हुआ तो सोचा किसी और को उठाने की बजाय खुद ही बना लें। नीचे पहुँच कर जैसे ही रसोई की तरफ बढे, बिट्टू के कमरे से रोशनी आती हुई दिखाई पड़ी। शर्मा जी ने हल्का सा दरवाज़ा खोला तो बिट्टू एक कागज़ पर कुछ लिख रहा था। जैसे ही उसने शर्मा जी को देखा कागज़ को छुपाते हुए खड़ा हुआ –
“दादाजी, आप इतनी रात को मेरे कमरे में? नींद नहीं आई ? या दादी ने कमरे से बाहर निकाल दिया।”
“बेटा, मेरी नींद की बात छोड। ये बता कि किसके नाम पे प्रेम पत्र लिखे जा रहे हैं। ” शर्मा जी ने कहा।
“नहीं दादू , ऐसी कोई बात नहीं है। ” बिट्टू नीचे देखते हुए बोलता है।
“बिट्टू, अब तो ये FACEBOOK, WHATSAPP जैसी चीज़ें आ गयी हैं। प्रेम पत्र तो तेरे बाप ने भी नहीं लिखे थे, तेरी माँ को। तू इतना पुराना तरीका क्यों आज़मा रहा है।” शर्मा जी ने छेड़ते हुए कहा।
“अरे नहीं दादू। ये प्रेम पत्र नहीं है। ये चिट्ठी रेडियो स्टेशन पर भेजनी है। रीमा का जन्मदिन है। तो मैं कुछ विशेष करना चाहता था। RJ को चिट्ठी लिख कर उसे एक गीत समर्पित करूँगा। वो खुश हो जाएगी। ” बिट्टू ने बड़ी सरलता से कहा।
“अरे वाह! तू तो हम सब से 10 कदम आगे निकला। बस चिट्ठी लिखनी होती है ? और वो गाना सुना देते हैं ? फरमाइशी नगमों का प्रोग्राम है क्या?” शर्मा जी ने हँसते हुए पूछा।
“(हँसते हुए) हाँ। एक तरह का फरमाइशी प्रोग्राम। क्यों? आपको दादी के लिए भेजना है कुछ? कहो तो भिजवा दूँ? ” बिट्टू शरारती अंदाज़ में कहता है।
“हाँ हाँ। क्यों नहीं। तेरे बाप को भी जगा देता हूँ। क्या पता उसे भी तेरी माँ के लिए कुछ समर्पित करना हो!” शर्मा जी ने बिट्टू के कान खींचते हुए कहा।

शर्मा जी अपने कमरे में वापस आ जाते हैं।

अगली सुबह…
बिट्टू अपनी बाइक निकाल रहा होता है। इतने में शर्मा जी आ जाते हैं।
“अरे दादू , Good Morning!” बिट्टू ने कहा।
“Good Morning मेरे बच्चे। रेडियो स्टेशन जा रहा है?” शर्मा जी ने पूछा।
“जी। बस निकल रहा हूँ। बारिश की वजह से बाहर पानी बहुत भरा है। ” बिट्टू ने बाहर झांकते हुए कहा।
“तू एक काम कर। चिट्ठी मुझे दे दे। मैं उसी तरफ जा रहा हूँ। पैदल पैदल डाल आऊंगा डब्बे में। ” शर्मा जी ने कहा।
“दादू आप? आप तकलीफ क्यों कर रहे हैं। ” बिट्टू पूछता है।
“क्यों बे। भरोसा नहीं हैं मुझपे क्या? फ़िक्र मत कर। तेरी चिट्ठी पहुँच जाएगी। कहे तो रीमा के घर भी दे आऊं ? उसके दादाजी से अच्छी पहचान है मेरी। ” शर्मा जी ने बिट्टू के छेड़ते हुए कहा।
“अच्छा अच्छा। ठीक है।” और बिट्टू अपनी चिट्ठी शर्मा जी को दे देता है।

शाम 6 बजे।

शर्मा जी, उनका बेटा रतन और बिट्टू खाने की मेज़ पर बैठे हैं। बिट्टू ने रेडियो चालू कर दिया। साथ ही रीमा को फोन किया कि वो भी अपना रेडियो चला ले। रतन अपने पिता की ओर देखते हुए कहा,”देख रहे हो पिता जी? आजकल के बच्चे! बाप के आगे ही रेडियो पर अपनी गर्लफ्रेंड के लिए गाने चलवा रहे हैं।”
“ज़्यादा संस्कारी बनने की ज़रूरत नहीं है। कम से कम तेरी तरह नहीं है, जो बहू से मिलने उसके घर की छत पर कूद जाता था। वो तो भला हो पांडे जी का जो उन्होंने तुझे पसंद कर लिया। वरना पूरे पड़ोस में नाक कट जाती।” शर्मा जी ने तंज कसा।

रतन की बोलती बंद हो गई। बिट्टू उन्हें देख कर हँस रहा है।

“आपको बिलकुल भी शर्म नहीं है। पोते और बहू के सामने कोई ऐसी बाते करता है क्या?” बिमला जी रसोई से निकलते हुए आई। शर्मा जी ने बिना जवाब दिए उन्हें मुस्कुरा के देखा। बिमला जी गुस्से से देखते हुए वापस रसोई में चली गयी।
“नमस्कार! स्वागत है आपका हमारे इस स्पेशल प्रोग्राम में, जिसका नाम है – “चिट्ठी आई है”।” रेडियो से आवाज़ आती है। सब अपना काम छोड़ कर रेडियो के पास आ जाते हैं। पहली चिट्ठी समस्तीपुर के किसी सुमित की थी। फिर ऐसे ही 2-3 चिट्ठियों के बाद…

“और अब हमें एक पत्र मिला है दिल्ली के बिट्टू शर्मा की तरफ से, जो अपनी ख़ास दोस्त रीमा को उनके जन्मदिन पर बधाई देना चाहते हैं। बिट्टू कहते हैं कि रीमा उनके लिए बहुत ख़ास हैं। रीमा के साथ होने से उन्हें जीवन में सकारात्मकता मिलती है। बिट्टू रीमा के साथ अपने सभी खट्टे मीठे अनुभवों को याद करते हुए उनके लिए एक गीत समर्पित करना चाहते हैं। गीत है “तुम मिले” फिल्म का। अभिनय किया है इमरान हाशमी और सोहा अली खान ने। संगीत दिया है प्रीतम ने और आवाज़ दी है शफ़्क़त अमानत अली ने। गाने के बोल हैं – “तुम मिले तो जादू छा गया”। रीमा आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ। सुनते हैं ये बेहतरीन गाना।”

जैसे ही गाना शुरू हुआ, बिट्टू के मोबाइल की घंटी बजी। रीमा बिट्टू के इस सरप्राइज से बहुत खुश थी। बिट्टू की माँ रसोई के दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। बिमला जी अभी भी अंदर रोटियां बेलने में व्यस्त थी। रतन ने अपने बेटे की पीठ थपथपाई। और तभी…

“और अब आज के कार्यक्रम की आखिरी फरमाइश। मैंने अपनी ज़िन्दगी में इससे अच्छी चिट्ठी कभी नहीं पढ़ी। ये किसी कॉलेज के छात्र या किसी नवविवाहित जोड़े की नहीं, बल्कि दिल्ली के रहने वाले 75 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर आनंद शर्मा जी की है।”

रतन के हाथ से चाय का कप छूट जाता है। बिट्टू रीमा से बात करते करते रुक जाता है। बिट्टू की माँ भाग कर रसोई से बाहर निकलती है। और बिमला जी रोटी बेलते बेलते स्तब्ध हो जाती है।
“उम्र के आखिरी पड़ाव पर आने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मेरे जीवन में एक चीज़ अधूरी ही रह गई। मैंने अपने बचपन में अपने पिता की इच्छानुसार पढ़ाई में ध्यान लगाया। नौकरी लगते ही पिता जी ने रिश्ता पास के ही गाँव की एक लड़की से तय कर दिया। 2 साल बाद जब बेटा रतन पैदा हुआ तो उसकी माँ उसकी देखभाल में और मैं उन दोनों के लिए कमाने में लग गया। बेटे को बड़ा किया। उसकी शादी की। अब हमारा पोता भी बड़ा हो गया है। मैंने मेरी लाइफ का हर काम नियम से किया। लेकिन इस चक्कर में कभी बिमला को ठीक से प्यार ही नहीं कर पाया। उसने भी कभी मुझसे बदले में कुछ नहीं माँगा। जब से आई, तब से सिर्फ काम ही किया। मुझे सम्भाला। अपने नालायक बेटे को सम्भाला। फिर पोते को बड़ा करने में बहू की मदद की। थोड़ी सी खड़ूस ज़रूर है , पर हम सब को इतना प्यार करती है कि रोटी आज भी अपने हाथों से बना कर खिलाती है। मुझे नहीं पता कि मेरे जैसे बाकि लोग क्या करते हैं या उन्होंने क्या किया। मुझे सिर्फ इतना पता है कि ये मेरी फिल्म है और मैं अपनी फिल्म का हीरो हूँ और बिमला मेरी हीरोइन। हम लोग हमेशा सही वक्त का इंतज़ार करते रहे और सही वक्त कभी आया ही नहीं। मैं नहीं चाहता कि जब मैं अपने आखिरी दिन अपने बेड पर पड़ा हूँ तो मन में ये सोच कर मलाल हो कि मौका था और कह नहीं पाया। तो आज, मैं सरेआम, खुल्लम खुल्ला, अपनी 71 साल की प्रेमिका से प्यार का इज़हार, यानि प्रोपोज़ करना चाहता हूँ। ये गाना उसे बहुत पसंद है और वो अक्सर रोटी बेलते हुए ये गान गुनगुनाती है। मेरा आपसे आग्रह है कि इस गाने को अपने कार्यक्रम में ज़रूर जगह दें। “

RJ ने हल्का सा विराम देकर थोड़े भरे हुए गले से फिर से बोलना शुरू किया –

“बिमला जी, आप जहाँ भी हैं, मैं सिर्फ आपसे ये कहना चाहता हूँ कि मैंने अपने पूरे करियर में इतना प्रेम भरा पत्र कभी नहीं पढ़ा है। आनंद जी आपसे बहुत प्यार करते हैं और आप इस प्यार की हकदार हैं। मैं अपने पूरे रेडियो स्टेशन की तरफ से आप दोनों को बधाई देता हूँ। आपके लिए जिस गीत की फरमाइश हुई है वो “जब प्यार किसी से होता है” फिल्म से है। अभिनय किया है देवानंद और आशा पारेख ने। संगीत है शंकर जयकिशन का। आवाज़ दी है मुहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर ने।”

आनंद जी अपने टेबल से खड़े होते हैं और बिमला जी के पास जाकर उन्हें गले से लगा लेते हैं। बिट्टू भी दादा दादी से चिपक जाता है। रतन और उसकी बीवी भी आगे बढ़कर उन्हें गले लगा लेते हैं। सभी की आँखों से ख़ुशी के आंसू छलक पड़े हैं। रेडियो पर गीत चल रहा है –
“सौ साल पहले हमें तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। “