Dear You


Dear You,

You feeling down? Like something is missing? Like you just cannot go through another day pretending to be happy? Like everything is falling apart in your life and you are just observing from above? Like your hands are tied and your voice is gone and all you want to do is scream but you just can’t? Like all you want to do is fall apart and cry but you are just not able to? Do you feel this way?

Like you are the only one who is going through this?

Look, there comes a point in everyone’s life when a dark cloud magically pops over their head, never seeming to leave, raining negativity and just trying to bring them down. Hundreds and hundreds of people have fallen prey to it. And, no matter what they do, it clings to them like a sinister being sucking the life out of them till there is nothing left. At least that is what it wants them to believe.

‘It will get better’, people tell you, but that sinister being, it whispers contradictory things. And it is easier to believe this negative entity because it has disguised itself as you. And you start believing it. You believe that everything is a lie, that you cannot be happy, that the beautiful smile of yours is gone forever, that you can only pretend to be happy so that people won’t ask you what’s wrong, that you are alone, that you can’t do this any more, that there is this perpetual hollowness in you, that you are done.

You may turn to alcohol, to cigarettes, to drugs or to any other thing that you think might numb the pain or make you feel again. You may not return from this and that is what that evil entity wants. It wants you.

And instead of giving into this, instead of letting it win, you need to fight, you need to fight with everything you have, for only then can this evil which has entered you soul will be kept at bay, though never quite gone.

You and I both know in our hearts that things will change. That things will get better. Sweetheart, this is a phase. I promise. I promise that your brilliant smile will be back. I know that right now with everything that’s going on in your life, you don’t believe this. But, babe, I want you to hold on, I want you to have faith, I want you to have hope.

I want you to know that I believe in you. I believe that everything will be okay even if you don’t. I believe.

I know that you want to be truly happy again but happiness is not a destination, like other emotions it is fleeting. It is temporary, just like the feeling that you have right now.

I want you to know that you are not alone in this rainy season, that you have me holding an umbrella for you, over you. Even if this entity has you convinced otherwise. I am there for you. Always.

Remember, I am with you.

Love, Smriti.

P.S. If winter comes, can spring be far behind?

THE EDITING STARTUP

अनोखी फरमाइश


तेज़ बारिश की बूंदे सड़क पर तड तड करके गिर रही हैं। बारिश की बूंदों और तेज़ हवा के अलावा सड़क पूरी तरह खामोश है। सड़क के पास वाले घर के पहली मंज़िल की खिड़की पर खड़े आनंद शर्मा, बाहर की बारिश देख रहे हैं। आनंद शर्मा एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर है। उम्र कुछ 75 की होगी। सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने शर्मा जी, हल्की सी खिड़की खोलते हैं। ठंडी हवा और कुछ बारिश की बूँदें उनके चेहरे पर पड़ती हैं। और तभी…

“खिड़की बंद कर दो जी। इतनी रात को भूतों की तरह क्या खड़े हो खिड़की पर।” पीछे से आवाज़ आती है।
“भूतों की तरह नहीं श्रीमती जी, भूत ही कहिये। आपके साथ रहके जीता जागता इंसान भी भूत ही हो जाए। “

मिलिए श्रीमती बिमला शर्मा जी से। आनंद जी की धर्मपत्नी। सफ़ेद बाल और झुर्रियां उनकी उम्र का अंदाज़ा देती है। वो घर की मुखिया है। 52 साल हो गए हैं शादी को, पर पति पत्नी की नौकझौंक आजतक चल रही है।

“मेरे साथ की बात छोडिए। सर्दी लग गई तो कुछ दिनों में आप हम सब का साथ छोड़ देंगे। ” बिमला जी ने जवाब दिया।
“यार तुममें कुछ शर्म लिहाज है कि नहीं। कोई ऐसे बोलता है क्या अपने पति को। मन करता है तलाक दे दूँ। पर लोग कहेंगे इस उम्र में बुढ़िया को बेसहारा छोड दिया।” शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“बुढ़िया की फ़िक्र न करो। ये कहो कि बुड्ढे को कोई और नहीं मिलेगी इसी उम्र में।” बिमला जी ने फिर तंज कसा और चद्दर मुंह पर डाल कर सो गयी।

शर्मा जी का चाय पीने का मन हुआ तो सोचा किसी और को उठाने की बजाय खुद ही बना लें। नीचे पहुँच कर जैसे ही रसोई की तरफ बढे, बिट्टू के कमरे से रोशनी आती हुई दिखाई पड़ी। शर्मा जी ने हल्का सा दरवाज़ा खोला तो बिट्टू एक कागज़ पर कुछ लिख रहा था। जैसे ही उसने शर्मा जी को देखा कागज़ को छुपाते हुए खड़ा हुआ –
“दादाजी, आप इतनी रात को मेरे कमरे में? नींद नहीं आई ? या दादी ने कमरे से बाहर निकाल दिया।”
“बेटा, मेरी नींद की बात छोड। ये बता कि किसके नाम पे प्रेम पत्र लिखे जा रहे हैं। ” शर्मा जी ने कहा।
“नहीं दादू , ऐसी कोई बात नहीं है। ” बिट्टू नीचे देखते हुए बोलता है।
“बिट्टू, अब तो ये FACEBOOK, WHATSAPP जैसी चीज़ें आ गयी हैं। प्रेम पत्र तो तेरे बाप ने भी नहीं लिखे थे, तेरी माँ को। तू इतना पुराना तरीका क्यों आज़मा रहा है।” शर्मा जी ने छेड़ते हुए कहा।
“अरे नहीं दादू। ये प्रेम पत्र नहीं है। ये चिट्ठी रेडियो स्टेशन पर भेजनी है। रीमा का जन्मदिन है। तो मैं कुछ विशेष करना चाहता था। RJ को चिट्ठी लिख कर उसे एक गीत समर्पित करूँगा। वो खुश हो जाएगी। ” बिट्टू ने बड़ी सरलता से कहा।
“अरे वाह! तू तो हम सब से 10 कदम आगे निकला। बस चिट्ठी लिखनी होती है ? और वो गाना सुना देते हैं ? फरमाइशी नगमों का प्रोग्राम है क्या?” शर्मा जी ने हँसते हुए पूछा।
“(हँसते हुए) हाँ। एक तरह का फरमाइशी प्रोग्राम। क्यों? आपको दादी के लिए भेजना है कुछ? कहो तो भिजवा दूँ? ” बिट्टू शरारती अंदाज़ में कहता है।
“हाँ हाँ। क्यों नहीं। तेरे बाप को भी जगा देता हूँ। क्या पता उसे भी तेरी माँ के लिए कुछ समर्पित करना हो!” शर्मा जी ने बिट्टू के कान खींचते हुए कहा।

शर्मा जी अपने कमरे में वापस आ जाते हैं।

अगली सुबह…
बिट्टू अपनी बाइक निकाल रहा होता है। इतने में शर्मा जी आ जाते हैं।
“अरे दादू , Good Morning!” बिट्टू ने कहा।
“Good Morning मेरे बच्चे। रेडियो स्टेशन जा रहा है?” शर्मा जी ने पूछा।
“जी। बस निकल रहा हूँ। बारिश की वजह से बाहर पानी बहुत भरा है। ” बिट्टू ने बाहर झांकते हुए कहा।
“तू एक काम कर। चिट्ठी मुझे दे दे। मैं उसी तरफ जा रहा हूँ। पैदल पैदल डाल आऊंगा डब्बे में। ” शर्मा जी ने कहा।
“दादू आप? आप तकलीफ क्यों कर रहे हैं। ” बिट्टू पूछता है।
“क्यों बे। भरोसा नहीं हैं मुझपे क्या? फ़िक्र मत कर। तेरी चिट्ठी पहुँच जाएगी। कहे तो रीमा के घर भी दे आऊं ? उसके दादाजी से अच्छी पहचान है मेरी। ” शर्मा जी ने बिट्टू के छेड़ते हुए कहा।
“अच्छा अच्छा। ठीक है।” और बिट्टू अपनी चिट्ठी शर्मा जी को दे देता है।

शाम 6 बजे।

शर्मा जी, उनका बेटा रतन और बिट्टू खाने की मेज़ पर बैठे हैं। बिट्टू ने रेडियो चालू कर दिया। साथ ही रीमा को फोन किया कि वो भी अपना रेडियो चला ले। रतन अपने पिता की ओर देखते हुए कहा,”देख रहे हो पिता जी? आजकल के बच्चे! बाप के आगे ही रेडियो पर अपनी गर्लफ्रेंड के लिए गाने चलवा रहे हैं।”
“ज़्यादा संस्कारी बनने की ज़रूरत नहीं है। कम से कम तेरी तरह नहीं है, जो बहू से मिलने उसके घर की छत पर कूद जाता था। वो तो भला हो पांडे जी का जो उन्होंने तुझे पसंद कर लिया। वरना पूरे पड़ोस में नाक कट जाती।” शर्मा जी ने तंज कसा।

रतन की बोलती बंद हो गई। बिट्टू उन्हें देख कर हँस रहा है।

“आपको बिलकुल भी शर्म नहीं है। पोते और बहू के सामने कोई ऐसी बाते करता है क्या?” बिमला जी रसोई से निकलते हुए आई। शर्मा जी ने बिना जवाब दिए उन्हें मुस्कुरा के देखा। बिमला जी गुस्से से देखते हुए वापस रसोई में चली गयी।
“नमस्कार! स्वागत है आपका हमारे इस स्पेशल प्रोग्राम में, जिसका नाम है – “चिट्ठी आई है”।” रेडियो से आवाज़ आती है। सब अपना काम छोड़ कर रेडियो के पास आ जाते हैं। पहली चिट्ठी समस्तीपुर के किसी सुमित की थी। फिर ऐसे ही 2-3 चिट्ठियों के बाद…

“और अब हमें एक पत्र मिला है दिल्ली के बिट्टू शर्मा की तरफ से, जो अपनी ख़ास दोस्त रीमा को उनके जन्मदिन पर बधाई देना चाहते हैं। बिट्टू कहते हैं कि रीमा उनके लिए बहुत ख़ास हैं। रीमा के साथ होने से उन्हें जीवन में सकारात्मकता मिलती है। बिट्टू रीमा के साथ अपने सभी खट्टे मीठे अनुभवों को याद करते हुए उनके लिए एक गीत समर्पित करना चाहते हैं। गीत है “तुम मिले” फिल्म का। अभिनय किया है इमरान हाशमी और सोहा अली खान ने। संगीत दिया है प्रीतम ने और आवाज़ दी है शफ़्क़त अमानत अली ने। गाने के बोल हैं – “तुम मिले तो जादू छा गया”। रीमा आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ। सुनते हैं ये बेहतरीन गाना।”

जैसे ही गाना शुरू हुआ, बिट्टू के मोबाइल की घंटी बजी। रीमा बिट्टू के इस सरप्राइज से बहुत खुश थी। बिट्टू की माँ रसोई के दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। बिमला जी अभी भी अंदर रोटियां बेलने में व्यस्त थी। रतन ने अपने बेटे की पीठ थपथपाई। और तभी…

“और अब आज के कार्यक्रम की आखिरी फरमाइश। मैंने अपनी ज़िन्दगी में इससे अच्छी चिट्ठी कभी नहीं पढ़ी। ये किसी कॉलेज के छात्र या किसी नवविवाहित जोड़े की नहीं, बल्कि दिल्ली के रहने वाले 75 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर आनंद शर्मा जी की है।”

रतन के हाथ से चाय का कप छूट जाता है। बिट्टू रीमा से बात करते करते रुक जाता है। बिट्टू की माँ भाग कर रसोई से बाहर निकलती है। और बिमला जी रोटी बेलते बेलते स्तब्ध हो जाती है।
“उम्र के आखिरी पड़ाव पर आने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मेरे जीवन में एक चीज़ अधूरी ही रह गई। मैंने अपने बचपन में अपने पिता की इच्छानुसार पढ़ाई में ध्यान लगाया। नौकरी लगते ही पिता जी ने रिश्ता पास के ही गाँव की एक लड़की से तय कर दिया। 2 साल बाद जब बेटा रतन पैदा हुआ तो उसकी माँ उसकी देखभाल में और मैं उन दोनों के लिए कमाने में लग गया। बेटे को बड़ा किया। उसकी शादी की। अब हमारा पोता भी बड़ा हो गया है। मैंने मेरी लाइफ का हर काम नियम से किया। लेकिन इस चक्कर में कभी बिमला को ठीक से प्यार ही नहीं कर पाया। उसने भी कभी मुझसे बदले में कुछ नहीं माँगा। जब से आई, तब से सिर्फ काम ही किया। मुझे सम्भाला। अपने नालायक बेटे को सम्भाला। फिर पोते को बड़ा करने में बहू की मदद की। थोड़ी सी खड़ूस ज़रूर है , पर हम सब को इतना प्यार करती है कि रोटी आज भी अपने हाथों से बना कर खिलाती है। मुझे नहीं पता कि मेरे जैसे बाकि लोग क्या करते हैं या उन्होंने क्या किया। मुझे सिर्फ इतना पता है कि ये मेरी फिल्म है और मैं अपनी फिल्म का हीरो हूँ और बिमला मेरी हीरोइन। हम लोग हमेशा सही वक्त का इंतज़ार करते रहे और सही वक्त कभी आया ही नहीं। मैं नहीं चाहता कि जब मैं अपने आखिरी दिन अपने बेड पर पड़ा हूँ तो मन में ये सोच कर मलाल हो कि मौका था और कह नहीं पाया। तो आज, मैं सरेआम, खुल्लम खुल्ला, अपनी 71 साल की प्रेमिका से प्यार का इज़हार, यानि प्रोपोज़ करना चाहता हूँ। ये गाना उसे बहुत पसंद है और वो अक्सर रोटी बेलते हुए ये गान गुनगुनाती है। मेरा आपसे आग्रह है कि इस गाने को अपने कार्यक्रम में ज़रूर जगह दें। “

RJ ने हल्का सा विराम देकर थोड़े भरे हुए गले से फिर से बोलना शुरू किया –

“बिमला जी, आप जहाँ भी हैं, मैं सिर्फ आपसे ये कहना चाहता हूँ कि मैंने अपने पूरे करियर में इतना प्रेम भरा पत्र कभी नहीं पढ़ा है। आनंद जी आपसे बहुत प्यार करते हैं और आप इस प्यार की हकदार हैं। मैं अपने पूरे रेडियो स्टेशन की तरफ से आप दोनों को बधाई देता हूँ। आपके लिए जिस गीत की फरमाइश हुई है वो “जब प्यार किसी से होता है” फिल्म से है। अभिनय किया है देवानंद और आशा पारेख ने। संगीत है शंकर जयकिशन का। आवाज़ दी है मुहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर ने।”

आनंद जी अपने टेबल से खड़े होते हैं और बिमला जी के पास जाकर उन्हें गले से लगा लेते हैं। बिट्टू भी दादा दादी से चिपक जाता है। रतन और उसकी बीवी भी आगे बढ़कर उन्हें गले लगा लेते हैं। सभी की आँखों से ख़ुशी के आंसू छलक पड़े हैं। रेडियो पर गीत चल रहा है –
“सौ साल पहले हमें तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। “


Individuality


I can only feel, am unable to see
Due to the vile veil that has been glued to me
The definition of grief is different for me,
It is what I perceive it to be.
Grief as fury, grief as pain
Grief, as a howling cry in vain

My jaws are aching, my chords are quivering to say,
But silence abounds as my lips are taped and gagged this way
It stops me from speaking up and about
Against all that enrage me and i feel riled about.
Anger as grief, anger as hurt
Anger, as a useless black-holed rut

I wish to escape and I see a route,
Cutting through the fire, a most merciless brute.
The fire rages on and my confusion grows,
In or out, which way the fire blows
Fire, as the grief outside
Or fire as the anger inside

A torrent of rain suddenly surrounds me,
All raging fires die and cease to be.
Perplexed as i think, a split second passes
Suddenly, I see me stand in a box as a crowd amasses.
Guilty as charged, I am convicted,
Of the most gruesome crime ever committed

My fault only one, I dared to be free,
I dared to rip off the veil, I dared to see
I dared to un-gag myself, I dared to be me.

We all want to conform to our society. We want to fit in and we yearn for approval. Being different is like a gamble which no one wants to take. It’s not a ‘character defect’ or evidence of weak personality as some high powered hot-shots make it out to be.

We were born that way, to be like everyone and keep everyone happy, fuelling the herd mentality. That’s how evolution wired our brains. While our ancestors foraged, hunted and moved about in caves, the Tribe was everything. Being left alone meant death, and starvation before that. Not remotely enticing.

So we copied. Tried to be the same. No weird ideas. No toes out of pre-determined lines.

But individuality is a very strong force. Try as we might, it bursts free. There are no shackles strong enough to restrain its force. I honestly have no idea how the oldies managed to do it. I guess when survival was a moot point, creative forces and personality really didn’t figure on the list.

And if somebody does try to hold it in, bad things happen. There’s pain, hurt, confusion and all the other lovely things that go into the making of a truly human life. In all of this, what’s interesting is that the chains built by others for holding us down are nothing compared to the prisons we make for ourselves. The problem with these prisons is that they are abstract, made up of ideas we knit. A web of thoughts which we willingly spin around ourselves and then cry hoarse that we’re not happy. That we are not free.

It’s not our fault. We just want to be accepted and adored. That’s why we don’t do all the weird things we think other people don’t do. And you what happens? We grow up, and realize that it doesn’t matter. Because nobody cares what we are doing, no one’s looking. Everyone’s winging it with their own weirdness hidden somewhere. Finally, we are able to be at peace with ourselves. And since we’re humans we set on to find something which will steal our peace.

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Escape


‘Trust.’

The word is almost as beautiful as the feeling of being able to completely rely on someone. The feeling that you can hand a gun to someone citing all the reasons why they should pull the trigger but knowing well, that they never will even if their own life depended on it. Amazing, right? A tad bit exhilarating too.

But, in this day and age, how many people do you trust? How many do you think would pick up your call at three in the morning and be there, no questions asked? How many do you think would shield you from the harm’s way? How many do you think would catch you when you fall? You could probably count them off on the fingers of just one hand.

All because you once trusted someone so much that they used it against you. They pulled the trigger of the gun which you handed over to them with the ammo. They corrupted your safe haven which you both built together. They left you alone and vulnerable with nothing to protect yourself with. They left you dejected and feeling miserable with walls higher and stronger than before.

In 2004, it all began when Anika was just three years old.

She was his baby girl, his angel, she always did as he asked, listening to him more than her own mother, always trying to please him. For in him, she had finally found a father. He didn’t have any children of his own which made him extremely protective of his little angel. She was the apple of his eye.

He always made sure that she never went anywhere without his permission. Anika’s mother used to mock him that she came second in his life after Anika. But, in reality, she was just proud of him for loving someone else’s child this deeply. Maybe, that was because she wasn’t quite aware of the depth of his feelings for her daughter…

He used to get up every night after making sure that everyone had gone to sleep, to make his way to Anika’s room, where she laid waiting for him. She used to get rewarded with chocolates afterwards for being his special girl. She felt joy in knowing that her father ‘loved’ her more than her mother.

It wasn’t until she began school and started speaking to her friends that she realized how wrong it was. How the other girls weren’t their daddy’s ‘special girls’, how they slept with their clothes on and in a different room from their fathers, how they weren’t given chocolates for letting their fathers touch their special places.

She started feeling disgusted with herself and with him. She began to hate him with an inexplicable fury. She thought she could escape it by telling her mother. But, even she dismissed her as a call for attention.

She was trapped and so very lost. She felt like running away but where could she go? She felt so alone in this world with no one to save her. Not even her own mother believed her. She wanted to escape this and it seemed that there was only one solution left. But, could she bring herself to do it?

Yes. She had to.

On the morning of 3rd October 2015, Anika’s mom found her daughter lying in a pool of blood, a note next to her.

‘This was the only way to be free.’


मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा


“मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा, वो खेत में चारा चरती थी। तेरे बाप का वो क्या करती थी, मेरी भैंस को डंडा…”

“पगला कहीं का” फिल्म का ये गाना उस वक़्त याद आ गया जब टीवी Debate में दो राजनैतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं को एक दूसरे के साथ बहस करते हुए सुना। कई बार मुझे अहसास होता है कि हम भारतीय सच में कितने सहनशील (Tolerant) हैं। हर पांच साल बाद हम गधों की एक ऐसी फ़ौज संसद में भेजते हैं, जो अगले पांच साल हम लोगों को ही उल्लू बनाते रहते हैं। गौरतलब हो कि मैंने भैंस, गधा, उल्लू जैसे शब्दों का प्रयोग किया। गाय का नाम नहीं लूँगा, क्या पता संचार मंत्री हमारे Domain को भी Ban कर दें। नयी नयी Startup है भई, रोजी रोटी का सवाल है।

वाद विवाद, भाषा की एक ऐसी विधा जहाँ दो पक्ष हों और तर्क वितर्क के ताने बाने में बुनकर एक निष्कर्ष निकाला जाए। मैंने स्कूल में बहुत सी वाद विवाद प्रतियोगिताएं देखी। खुद एक ऐसी प्रतियोगिता का हिस्सा रहा जिसे खुद सरदार वल्लब भाई पटेल ने शुरू किया था। लेकिन यकीन मानिए, जिस प्रकार का वाद विवाद आजकल देखने को मिलता है, कसम उड़ान झल्ले की, वो बंदा ज़हर खा के जान दे देगा, जिसने इस मानव जाति में वाद विवाद की शुरुआत की। टीवी चैनल पर किसी को गला फाड़ते हुए देखता हूँ तो मन में उस Sound Director के लिए दयाभाव आता है, जिसके Sound System की ये लोग बैंड बजा रहे होते हैं।

पर ज़रा ठहरिये! अगर आपको टीवी की Debate से नफरत है तो ये जान लेना बेहद ज़रूरी है। टीवी पर प्रवक्ता कम से कम चैनल का माइक उठा कर एक दुसरे पर नहीं फैकते। क्योंकि ऐसे आत्मीय सीन देखने के लिए आपको लोकसभा टीवी की ओर रुख करना पड़ेगा। अहा! क्या प्यार है लोगों के बीच। इतने प्यार से एक दूसरे को गाली तो फैजल और MLA रामधारी सिंह भी नहीं देते थे।

और फिर, मज़े की बात ये नहीं है कि ये लोग कैसे वाद विवाद कर रहे हैं। मज़े की बात तो ये है कि ये लोग किस Topic पर वाद विवाद कर रहे हैं। हिंदी भाषा के शब्द आपस में बातचीत कर रहे होंगे-

असहनशीलता (सीना चौड़ा कर के) – “देख रहे हो? Market में कितनी Demand है मेरी आजकल।”
गरीबी – “वो भी क्या दिन थे, जब लोगों के मुंह से मैं कभी हटता ही नहीं था।”
आरक्षण – “अमा छोड़ो! आज भी मंडल कमीशन वाले दिन याद आते हैं।”
Anti National– “Hey guys, don’t forget me. I am from NRI quota.”

किसी के खांसने की आवाज़ आती हैं।

सभी – “लो आ गया। हम सब की दूकान बंद करवाने वाला।”
आज़ादी – “मैंने क्या किया यार। 1947 से मेरी ही ले रहे हैं सब। अब तो उम्र हो चली है फिर भी हाथ मुँह धो के मेरे ही पीछे पड़े हैं।”

आपको वाद विवाद का शौक है न? आइये देखते हैं आपके वाद विवाद के तरीके। जैसे ही आपको वाक्य में मोदी सुनाई देता है, आप अपने अपने कमेंट्स ले कर तैयार रहते हैं। कमेंट्स, जिनमें गालियाँ, सामने वाले का चारित्र चित्रण आदि इत्यादि शामिल है। मीडिया आपके लिए Presstitute है। आपके नेता के खिलाफ बोलने वाला हर व्यक्ति राष्ट्रदोही है। कुल मिला के, वाद विवाद में जो सब चीज़ें नहीं होनी चाहिए, आप वहीँ सब चीज़ों का इस्तेमाल करके वाद विवाद करते हैं। *Slow Claps*

तर्क सुनना है आपको? तो सुनिए-

  • श्री श्री के Circus पर NGT ने जुर्माना लगाया। श्री श्री ने कहा कि वो जुर्माना नहीं भरेंगे। प्रधानमंत्री उनके Circus का उदघाटन करते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री उनके सामने नतमस्तक होते हैं। ये बिलकुल वैसा ही है कि आपने Principal की लड़की छेड दी और अगले दिन वही Principal आपको Best Student का award दे देता है। तो बताओ बच्चों, अगली बार पद्म अवार्ड किसे मिलेगा!
  • पद्म अवार्ड की बात आई तो मुझे अनुपम खेर याद आ गए। “गलत बोलो पर जोर से बोलो” इनके जीवन का ध्येय है। इन्हें लगता है कि असहनशीलता का मुद्दा बेबुनियाद है। “ये लोग तब कहाँ थे, जब कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किया गया?” वाह। जवाब? “माँ के पेट में” All is well बोलने पे Kick मार रहे थे। आपको दिक्कत? अगर शर्मा जी वर्मा जी से लड़ रहें हैं क्योंकि वर्मा जी का कुत्ता शर्मा जी के घर के आगे रोज़ सवेरे भौंकता है तो शर्मा जी गलत हैं। शर्मा जी, आप तब कहाँ थे जब भटनागर जी का कुत्ता अनुपम जी के घर के आगे भौंका करता था! ये गलत है। ये सुनियोजित विद्रोह है।
  • विद्रोह से याद आया, JNU के विद्रोही भवन के लड़के राजद्रोह पर उतर आये हैं। उन्होंने नारे लगाए, “अफज़ल हम शर्मिंदा है, तेरे कातिल ज़िंदा है”। गलत बात! अफज़ल तो आतंकवादी था। उसका समर्थन नहीं करना चाहिए। राजद्रोह का आरोप तो हार्दिक पटेल पर भी लगा था। पर हार्दिक और JNU वालों ने किसी की दुकानें लूटी? किसी के घर जलाये? किसी राज्य को 20 हज़ार करोड़ का नुकसान किया? फिर जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मालिक पर राजद्रोह का आरोप क्यों नहीं लगा ? ओहो, इस Angle से तो सोचा ही नहीं आपने। कोई नहीं, अब सोच लेना।

आपकी वाद विवाद और आपके तर्क उतने ही खोखले हैं जितनी वो बोरवेल थी जिसमें प्रिंस गिर गया था। हाँ। याद आया? आप लोग भूल जाते हैं जनाब। हम नहीं भूलते। आप कहते हैं भूल जाओ 1984, 1992, 1993, 2002। पर हम नहीं भूलेंगे। एक पूरा राज्य कई दिनों तक जलता रहा और आप कहते हैं कि बिना मुख्यमंत्री की शह के हुआ? अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने वालों, बाबरी विध्वंस के कुछ दिन पहले वाजपेयी ने भाषण में कहा था – “सामने की ज़मीन बड़ी उबड़ खाबड़ है। इसे सपाट कर दो।” तुम भूल गए। मुझे याद है। पता हैं क्यों? क्योंकि मैं हिन्दू हूँ। और मुझे पता है –
“कसरत और ताकत के दम पर मंदिर तो बन सकता है, लाशों पर बुनियाद हो जिसकी उसमें राम नहीं आते।”

जो लोग हिटलर के Concentration Camps को दुनिया के सबसे अमानवीय स्थल बताते हैं, उन्हें याद दिला दूँ कि हमारे यहाँ एक गाँव हैं जहां एक आदमी को भीड़ पीट पीट कर जान से मार देती है क्योंकि उसके घर के फ्रिज में गोमास होने का शक है।

जाइए जनाब, प्राइम टाइम देखिये। फ़र्ज़ी Intellectual होने का ढोंग कीजिए। देखिये दो पक्ष के वक्ताओं को, जो screen के अलग अलग frames में दिख रहे हैं, पर दोनों ही कहीं न कहीं एक ही राजनितिक तवे पर रोटियां सकते हैं। फिर एक गाना याद आ गया। 1970 की फिल्म, गोपी। अभिनेता, दिलीप कुमार। स्वर, मोहम्मद रफ़ी। बोल हैं –

“जिसके हाथ में होगी लाठी, भैंस वही ले जाएगा। हंस चुगेगा दाना दुनका, कौआ मोती खाएगा।”

THE EDITING STARTUP

Ripe, Raw, or Rotten?

The Editing Startup

Are you mature yet?
If you are above 18, don’t ignore this. Chances are, you are more immature than the kid next door. It’s our experiences that determine if we have crossed that mental barrier yet, and even though experience increases with age, it’s pretty fluid. That’s because maturity involves learning from our experiences which sadly, a few people do.

We tend to think that every great thing in life happens with a lot of fanfare. It couldn’t be less true.
The first time you saw your special someone, remember? No violins rang out, butterflies didn’t flit and nobody announced on a mike “Person X here is in LOOOVE!”

Have you ever experienced hate?
Rhetorical question. I know you have, it’s a part of humanity. But what comes after hate is acceptance and an author once wrote

…I wondered if that’s how forgiveness budded, not with the fanfare of epiphany, but with pain gathering it’s things, packing up, and slipping away unannounced in the middle of the night.

The same goes for maturity but there, a new consciousness enters your thoughts. The realization that some time ago you wouldn’t have done a particular thing, which now you think is ‘mature behaviour’. You’d expect maturity to notify you when it comes. A status update at the least, it is after all an occasion to celebrate.

But it doesn’t. The onus to know whether you are mature or not, lies with you. It lies not in wizened beards or in your driver’s licence. It’s not when you are legally qualified to drink that you become mature. It’s when you are out one night partying and you see all your friends getting wasted and you decide not to drink so that others can get home safely, that you become mature.

But the biggest test of maturity is when you can decide whether you are mature or not, in an unbiased manner.
Sounds kooky? Let me explain. But first, a detour.

What is maturity?
I have a definition for it. I will personally become mature the day I can, after procrastinating on some work for three months and then miraculously pulling it off, say to myself that my actions were horrible and immature rather than patting myself for pulling it off.
You can have another definition for it. The point of maturity is self-understanding. It’s your universe, so it’s your rules. You make your rules after understanding the world around you, and when you can follow those rules, presto! You are a kid no more. So easy, right?

But wait. Didn’t I mention a word ‘unbiased’? What’s that doing here?
Our analysis of a situation is what helps us to determine whether our actions were mature or not. If you think judging yourself is easy, you are deluded. It’s like being the victim, accused and the judge, all that the same time. No easy pass, this.

The results of our actions can very easily cause a bias. If you behave immaturely yet it all goes well, it’s very hard to tell your brain to stop the frat party and realize what you’ve done, and analyze it so that it’s not repeated. Again, it’s no joke. I have a choicer name for it: Thought Chemotherapy. You have to purge the wrong thoughts, and make sure you don’t hit the right thoughts. This, while all the thoughts are running amok. Sounds eerily like a videogame description, but I digress.

You can’t ask anyone else to do this for you because they wouldn’t be free of bias either. Their view of you as a person can easily colour their thoughts and hence their judgement about you and your maturity. Also, what one person thinks as mature might not be the same for you. It’s a mare’s nest out here.

Are there any shortcuts, you ask? No. There aren’t. No cheat sheets. It’s all trial and error, folks.

How to figure it all out, you ask? Well, live.
Figuring this out is life, isn’t it? Live, make mistakes, learn. And finally one day, while going home from office and thinking about your day, you’ll realise that you could have broken a rule but you didn’t. You stood by it. Congratulations! But still, no violins will ring out.