Taken


EDITOR: ADITYA PRAKASH

Do you know how it feels to have your hands tied by the circumstances? Do you know how it feels to be helpless? Do you know how it feels to be so strong yet not be able to do anything? 
Do you?
I think not.
But I’ll tell you how it feels.

This is my story. It wasn’t all bad. I was a happy person, cheerful even. I had everything that a person could ask for, a family, a roof to live under, money to sustain us and love. I was content. I was at  peace. But as always, there is dirt on the cleanest of things. Everybody has skeletons, it is all about hiding them. I had a secret, a secret so dark it could destroy everything that I had built. It could also destroy who I called my family, the people that I loved, my mother, my father, my little sister. Only if they knew.

Everything changed on that fateful day of November. We lived near the countryside, it was beautiful and a peaceful place. It was a perfect place for someone with a past like me, a perfect place to start afresh was noon and I had gone to collect some wood from the forest. Usually my ‘father’  was the one who went out  to collect the wood but today I was sent for the very first time. I could feel something wanted me out of my house. Something was off about today. Anyway, I left reluctantly.

After five long hours of collecting wood, I realized it was going to be dark soon. So, I started making my way back home.  I was around six hundred yards away from home and I could feel an eerie silence surrounding my house. Suddenly I felt anxious. I could feel something was wrong, very wrong. I dropped the tree branches and started to run towards my house. 

Now I was sure that something WAS wrong. The door, it was broken. There had been a struggle. Blood was everywhere.  Without delay I started looking for my family. I found my ‘parents’ in the living room. They were seated on the sofa and their back was facing me. I made my way towards them and gasped. Their throats had been slit. There were stab wounds all over the body. I knew they were dead without checking for any pulse.

Suddenly my heart jumped to my sister. Where was she? How was she? Was she even alive? I could not lose her. She was my responsibility. I searched and searched but couldn’t find her. 

It has been ten very long years, but I still haven’t found her. I know that she is alive because her blood wasn’t spilled that day. I know that they have my sister because I had something of their’s. So her being kidnapped is all my fault.

If her family hadn’t taken me in, they would have been alive today and she would’ve been with them. So I can never stop searching for her. I owe this to her parents.


जीन्स वाला प्रिंसिपल


EDITOR: ADITYA PRAKASH

चारों तरफ खामोशी छाई हुई थी। खाली प्रांगण में कोई कदम बढ़ाते हुए बड़े कमरे की ओर बढ़ रहा था। हल्के हरे रंग की कमीज और नीली जीन्स डाले, कमर पर पिट्ठू बैग टाँगे हुए वह आदमी कमरे के बाहर आकर रुक गया। पीछे से एक और आदमी भाग कर आया। उसके हाथ में चाबियों का गुच्छा था। 
“नमस्ते सर। माफ़ कीजियेगा। इतनी सुबह कोई आता नहीं है वरना मैं पहले ही दरवाज़ा खोल देता।”
“कोई बात नहीं, भैया। आज पहला दिन है तो नींद नहीं आयी। इसलिए जल्दी आ गया। “
“आप अंदर बैठिये सर। मैं चाय भिजवाता हूँ।” दूसरे व्यक्ति ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा। 
अंदर एक बहुत बड़ी मेज़ रखी थी। चारों तरफ कुर्सियां डली थी। मेज़ पर कहीं कहीं कुछ किताबें रखी थी। दरवाज़े के पास चॉक के डिब्बे रखे थे। वह कोने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। 
आम तौर पर वह इतनी सुबह नहीं उठता है। उसे तो देर रात तक जाग कर कोडिंग करनी होती है। रात को 12 बजे मैनेजर को ईमेल डालने के बाद ही कहीं सो पाता है वो। आज सुबह 6 बजे ही यहां आ गया। आना भी था। एक नयी शुरुआत जो करनी है। उसके अंदर बहुत से तूफ़ान उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल जो उसके मन में हैं, वो यही है कि क्या वो ये सब कर पाएगा?
हाथ बांधे हुए, सिर नीचे किये हुए, वह कुछ सोच रहा है। उसके अंदर का डर और उत्सुकता उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही है। अपने आप ही उसके पैर हिल रहे हैं जैसे किसी रेस में दौड़ने से पहले धावक के पैर हिलते हैं। कुछ देर बाद बाहर बच्चों का शोर आने लगा। कमरे में कुछ और लोग भी आने लगे। पर वह अभी भी सिर नीचे करके सोच में मग्न था। 
ठीक 8 बजे घंटी बजी। सभी लोग स्कूल के प्रांगण में इकठ्ठा हुए। बच्चे पंक्तिबद्ध होकर एक बाँह की दूरी पर खड़े थे। सभी अध्यापक, अध्यापिकाएं बच्चों के पास खड़े थे। बस अब उसी का इंतज़ार था। 
 
“सर, सब आ गए हैं।” ये वही आदमी था जिसने सुबह दरवाज़ा खोला था। 
“धन्यवाद रमेश। मैं आता हूँ।” 
पैरों का हिलना बंद हो गया। ठोस कदम ज़मीन पर पड़े और वह खड़ा हुआ और प्रांगण की ओर बढ़ने लगा। सभी चेहरे उसकी ओर मुड़े। जैसे जैसे वो माइक की तरफ बढ़ता गया, सभी की गर्दनें भी साथ साथ मुड़ती गयी। 
” Good Morning everyone. मेरा नाम मोहन शर्मा है।  मैं आपका नया प्रिंसिपल हूँ।”
कुछ लोगों के मुंह से आह निकल गयी। कुछ एक दूसरे की तरफ देखने लगे। कोने में खड़े दो अध्यापक एक दूसरे को इशारों इशारों में कुछ समझाने लगे। 
 
“मैं जानता हूँ कि मेरा लिबास एक आम प्रिंसिपल जैसा नहीं है। पर मैंने सारी ज़िन्दगी जीन्स ही पहनी है। मैं बाहर कुछ और अंदर कुछ नहीं हो सकता। इससे पहले में एक विदेशी कंपनी में काम करता था। इस स्कूल के ट्रस्टी और मेरे पिता, श्री बनवारी लाल शर्मा ने इस स्कूल की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी है। मुझे नहीं पता कि मैं कितने अच्छे से इसे निभा पाउँगा। लेकिन निभाने को कोशिश ज़रूर करूँगा।” मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा। 
“इस सभा के तुरंत बाद आप सब अपनी अपनी क्लास में जाएंगे और चुपचाप बैठेंगे। मैं आपके सर और मैडम लोगों से एक मीटिंग करना चाहता हूँ। इजाज़त है?”
सभी बच्चे एक दूसरे की तरफ देखने लगे। मोहन ने फिर से हँसते हुए पूछा, “इजाज़त है?”
सभी बच्चों ने एक साथ जवाब दिया,”इजाज़त है।”
थोड़ी देर बाद सारा स्टाफ प्रिंसिपल ऑफिस में इकठ्ठा हुआ। सभी वहां रखी कुर्सियों पर बैठ गए। मोहन अपने टेबल पर कमर टिका कर खड़ा था। 
“मैं आप लोगों का ज़्यादा वक्त नहीं लूंगा। मुझे आपसे थोड़ी बहुत बातें करनी हैं। आप सभी अपने अपने विषय के धुरंदर हैं। सारा सिलेबस आप लोगों को मुंह ज़ुबानी याद है। किताबों के पन्नों का नंबर भी याद होगा अब तो शायद।” मोहन ने हँसते हुए कहा। 
“मैं आपसे ज़्यादा बदलाव नहीं चाहता। मेरी आप सब से ये गुज़ारिश है कि जो पाठ आप बच्चों को पढ़ाने वाले हैं, उसके बारे में थोड़ा और रिसर्च करें। मैंने आप सभी के लिए लैपटॉप का फण्ड पास कर दिया है। हफ्ते भर में WIFI भी लग जाएगा। हमारे कंप्यूटर के अध्यापक, धीरज जी से मेरी पहले ही बात हो चुकी है। आप सभी को कल एक छोटी सी वर्कशॉप में आना होगा। वहां आप सभी को लैपटॉप चलाने की जानकारी, अलग अलग विषयों को गूगल पर ढूंढने के तरीके सिखाये जाएंगे।”
सभी लोग हैरानी से मोहन की तरफ देख रहे थे। अब उन्हें लगने लगा था कि ये बच्चा असल में अपने काम को बहुत अच्छे से जानता है। तभी साइंस की प्राध्यापिका शालिनी ने एक सवाल उठाया-
“सर, आपका ये सुझाव क्लास के लिए तो अच्छा है। पर लेबोरेटरी में जो प्रैक्टिकल करवाना होता है, उसके लिए क्या किया जाए?”
“बेहतरीन सवाल, शालिनी मैडम! कल की वर्कशॉप में आपको यूट्यूब पर विडियो देखना भी बतलाया जाएगा। वहां आपको भाँति प्रकार के प्रयोगों के विडियो मिलेंगे। तो अगली बार जब आप किसी को बर्नोली थ्योरम समझाएंगी तो पहले यूट्यूब पर उसके कुछ विडियो देखेंगी। अगर आपको विडियो के अनुरूप कोई भी सामान चाहिए जो हमारी लेबोरेटरी में नहीं हैं तो आप मुझे या शरद सर को मेल कर सकती हैं।”
“एक आखिरी बात, मैं खुद हफ्ते में एक बार हर क्लास का एक लेक्चर लेना चाहता हूँ। आप सभी को आपके टाइम टेबल दुबारा से बनाकर दे दिए जाएंगे। कोई भी सवाल हो, या परेशानी हो, आप सीधे मेरे ऑफिस में आ सकते हैं। बिना दरवाज़ा खटखटाये!”
 
“अब गणित के अध्यापकों को छोड़ कर बाकि सभी अपनी अपनी कक्षाओं में जा सकते हैं।”
4 – 5 लोगों को छोड़ कर सभी बाहर चले गए। 
मोहन ने फिर बोलना शुरू किया,” मैं आप लोगों से इसलिए मिलना चाहता था क्योंकि आप लोग एक खतरनाक विषय पढ़ा रहे हैं।” सभी हंस दिए। 
“मैंने अभी एक सर्वे पढ़ा था जिसमें ज़्यादातर बच्चों को गणित सबसे कठिन विषय लगता है। मैं जानता हूँ कि आप लोग बच्चों के साथ बहुत मेहनत कर रहे हैं। पर थोड़ा सहयोग और चाहिए मुझे आप लोगों से। जो सुझाव  मैंने शालिनी मैडम को दिया है, मैं चाहूंगा आप लोग उसका अनुसरण करें। इन्टरनेट पर बहुत कुछ है जिससे आप लोग गणित को थोड़ा और दिलचस्प बना सकते हैं। मैंने मेरे कॉलेज के प्रोफेसर से बात की है। महीने में एक दो दिन वो आप लोगों के साथ अपने अनुभव साझा करेंगे। मैं चाहूंगा कि आप सभी अगर अब तक अपना 100 प्रतिशत दे रहे थे तो अब 110 प्रतिशत देना शुरू करें।” 
कुछ ही हफ़्तों में स्कूल का वातावरण बिलकुल बदल गया। बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा वक्त कक्षाओं में बिताने लगे। पूरा स्कूल जैसे एक यूनिट बन कर काम करने लगा। मोहन खुद कक्षाओं में जाते हैं और बच्चों को पढाई के साथ साथ ज़िन्दगी के फ़लसफ़े बताते हैं। 
“तुम लोग डरते बहुत हो। मम्मी पापा से, टीचर से, मुझसे भी! कोई मुझसे कैसे डर सकता है यार! मैं तो एक दम डम्बलडोर जैसा हूँ।” मोहन ने हँसते हुए कहा। 
“डम्बलडोर कौन है, सर।” जिगिशा ने पूछा। 
“अरे, तुम लोगों को डम्बलडोर नहीं पता? हैरी पॉटर नहीं पढ़ी क्या तुम लोगों ने?” और फिर हैरी पॉटर की कहानियां शुरू हुई। मोहन ने जिगिशा से वादा किया कि वह उसे हैरी पॉटर का पहला भाग लाकर देगा। और तो और, मोहन ने लाइब्रेरी में ढेर सारे नॉवेल मंगवा लिए। वो बच्चों को खुद जाकर बताते थे कि कौन से नॉवेल पढ़ने चाहिए। धीरे धीरे लाइब्रेरी में बच्चों का आना जाना बढ़ने लगा। 
 
सभी खुश थे, सिवाय एक आदमी के। स्पोर्ट्स के अध्यापक मिश्रा जी। मिश्रा जी खुद राज्य स्तरीय क्रिकेट खेल चुके हैं। एक बहुत ही बेहतरीन कोच रहे हैं वो। आजकल मिश्रा जी के पास बच्चों का आना जाना कुछ कम हो गया है। मिश्रा जी भी ये सोच कर चुप हैं कि आखिर में पढाई ही काम आएगी बच्चों को। यह बात मोहन को पता चल गयी। 
अगली सुबह नोटिस बोर्ड पर एक रंगीन नोटिस लगा था। 
“CRICKETMANIA – On 26th January 2017, we are going to celebrate the Republic Day with a cricket match between the teams of Mr. Balram Mishra and Mr. Mohan Sharma. Those who are interested may give their names to the sports secretary.”
 
मिश्र जी ने जब वह नोटिस पढ़ा तो खिलखिला के हंस पड़े। यही नहीं, मोहन ने प्रार्थना सभा में सभी के आगे मिश्रा जी को चुनौती भी दे दी। जो हारेगा, वो पूरे स्कूल को मोतीचूर के लड्डू खिलाएगा। बच्चों में भी उत्सुकता इतनी बढ़ गयी कि सभा के अंदर “मिश्रा सर” और “मोहन सर” के नारे लगने लगे। 
26 जनवरी को तय समय पर मैच शुरू हुआ। दोनों ही टीमों ने बेहतरीन खेल खेला। पर मिश्रा जी की टीम 10 रनों से जीत गयी। मोहन ने शर्त के मुताबिक़ पूरे स्कूल में मोतीचूर के लड्डू बटवाये। 
कई साल बीत गए। स्कूल का माहौल एक दम बदला बदला सा है। शहर क्या, पूरे राज्य में मोहन के स्कूल की चर्चा है। मोहन अपने बिस्तर पर लेटा हुआ है। ज़िन्दगी कहाँ से कहाँ पहुँच गयी। कुछ साल पहले अपनी प्राइवेट नौकरी से परेशान हो कर अपनी जान देना चाहता था। अब वो सौ साल और जीना चाहता है क्योंकि उसे बच्चों से प्यार हो गया है। यही सोचते सोचते उसकी आँख लग जाती है। 
“मोहन उठो। मोहन, ऑफिस नहीं जाना है क्या?” मोहन के पिताजी की आवाज़ आयी। 
मोहन एक झटके के साथ उठा। “ऑफिस?” उसने पूछा। 
“हाँ। और नहीं तो क्या? छुट्टी है क्या आज? रात को कोडिंग करते करते लैपटॉप चलता हुआ छोड़ कर सो गया। मैंने उठकर बंद किया उसे।” 
मोहन ने मोबाइल उठाया। उसके मैनेजर की एक मिस्ड कॉल थी। उसने कैलेंडर खोल कर तारीख़ देखी तो पाया – 17 अक्टूबर 2016 । उसने अपने सिर पर हाथ रख लिया। उसका दिमाग घूम चुका था। 
 
फिर वह हल्के से मुस्कुराया और अपने पिता को आवाज़ लगाईं। 
“पा, मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ।”
उसके पिताजी दौड़ कर कमरे में आये।
“क्या?” उन्होंने पूछा। 
“मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ। मैं पढ़ाना चाहता हूँ। आपके स्कूल में कोई जगह खाली है ?” मोहन ने मुस्कुराते हुए पूछा। 
“हाँ, हम एक प्रिंसिपल की तलाश में है।” उसके पिता ने जवाब दिया। 
“मुझे मंज़ूर है। बस एक शर्त हैं!” मोहन ने कहा। 
“कैसी शर्त?” उसके पिता ने पुछा। 
“मैं स्कूल में जीन्स पहन कर जाऊंगा।” मोहन ने हँसते हुए कहा।

Bihari Ninja Goat- The Beginning


EDITOR: NAYANIKA GHOSH 

He was bleeding heavily from the shoulder wound. His thigh ached and throbbed with each small step. He knew he was going to be burning very soon. But he didn’t have anywhere to rest. As he dragged his way through the mountains of rubble, the encounter with scavengers played itself in front of his eyes.

It was a fresh morning for him, going through the rubble, collecting pieces of junk here and there, enjoying the warm rays of sun and with a set of iPod and headphones. He didn’t even realize when he walked into their camp. They were a bunch of battered and tired looking people. As he came to a sudden halt, each one of them scrambled and jumped for a weapon with a lot of cussing. He stood as still as a statue and willed his fear to die down. He wasn’t even half a mile from the farthest sentry point and scavengers were present here. He felt a bead of sweat trickling down his whiskers and gulped audibly.

“Don’t move, Demon spawn.” A voice said right behind him. All his instincts wanted him to jump and bound away as fast as he could, but this was the first time he had actually met with one of the scavengers. His curiosity overcame his fear and he lost his chance as the cold barrel of a gun touched the back of his neck. Every moment of his training came swirling before his eyes. How to escape such situation, how to disable the enemy, how to move fast; everything. But he chose not to do so. Instead, he said aloud clearly and loudly for all of them to hear. “I am not a Demon spawn. I am no threat to you. My name is Robin Polluski.”
Shocked silence followed his words. It was broken with a loud clattering as one of the scavengers; a girl around 12-13 years dropped her weapon (Which turned out to be a battered umbrella) and stared at him with eyes wide open. The hand holding the gun flinched and jabbed him in the neck. Hard. “Wh… what are you?” The girl asked in a quavering voice. The man holding the gun jabbed him harder in the ribs and shouted at the girl. “Don’t let the demon’s magic fool you! He is only controlling this… animal!” His voice broke into a squeal at the end and the gun trembled. Robin took a deep breath. He slowly raised his arms up in the air and very slowly turned towards the man who had captured him.

The gun was shaking in his face. The person behind it was shaking much more than the gun. He was a human of no more than 16 years. Robin saw in his eyes fear, desperation, tiredness, determination and… anger. He suppressed his own emotions and said in a clear voice. “Look, there are 15 of you, and I am only one. I mean no harm to any of you.” Robin was surprised by the firmness of his own voice. He was glad that he had a backpack on, or everyone could have seen his quivering tail. The boy-man with the gun tightened his hands on the grip and retreated slowly. Robin was about to let out a relaxed breath but exactly at that moment, he heard the baying of the scouts. That was when everything went to hell.

Staggering upon a stone, Robin plodded forwards slowly. His thigh ached more than ever and the fever was coming on. 3000 years after the World War 3, and his people still remembered their origin. He was a Bihari, and he was proud of it. He sat on the portion of a wall and closed his eyes to rest.
Just as the baying started, several things happened at once. He used up all the etherea stored, and jumped as high and far he could have with his hooves. But he wasn’t quick enough to evade the rifle shot at his shoulder, a poison arrow in his thigh and a sword slash at his tail. He fell through the roof of a building far away, and immediately lost consciousness. When he woke up, he witnessed what his kin has done. There were bodies littered all over that clearing. No one had found him yet, but some movement was still seen from the place he had hidden himself. He slowly climbed forward atop the rubble and was barely able to suppress a wave of nausea when he saw what his kin were doing. They weren’t from his base, as he had presumed, but were from the northern peninsula. And they were… eating the corpses.

He didn’t remember very well what he had seen. But when he had come back to his senses, every one of the other goats was dead. The killing style was his, Nin-jitsu mixed with ethereal summoning. He had left the bodies as they were, found his cut tail, buried it, and had started walking away. To where, he had no idea. But he has promised himself one thing. He will not let this happen to anyone else. Scavenger or human or not.

He was a Bihari Ninja Goat, and he intended to cleanse any dirty spots the Northerners had put upon his kin.


Independent Thoughts


SMRITI SHARMA

A few days ago, I went to an extremely posh hotel with my family for my grandmother’s birthday. I had an interesting encounter, which is what this piece is loosely about. So, I will start from the very beginning.

The plan was to meet my family after college directly at the place. I reached there at around Three and while waiting for the checking, I saw that the manager was busy giving instructions to the security and valet staff after which they all looked visibly annoyed. I put my bag down for the security check and went towards the ladies’ checking area where a female guard was sitting. I smiled with a nod so as to acknowledge her, she responded with her own set of pearly whites. I asked her what the whole deal was.

She told me that the manager wanted the security detail tightened with the Independence Day approaching, she even told me that because of this job, she had missed her child’s birthday and couldn’t even get him a cake. I got upset and the only thing that I could say to her at that point was a simple ‘Thank you, ma’am. Because of people like you, we are able to remain safe.’ She laughed it off and I left, still thinking.

We have become so oblivious and complacent to the contributions made by people like her. They are out there breaking their backs, missing their kids’ birthdays, their anniversaries and how are they usually treated? Like absolute crap and an utter waste of space. When was the last time you acknowledged the security guard at your office? When was the last time you showed your gratitude to a policeman?

A few days back I read how a soldier had to drag his bike for a good two hours in scorching heat on the expressway before anyone stopped to help him. How disheartening it is to find out that this man who has been away from home for his duties towards his nation is being treated like this by the people of that very nation.

Any person’s first and topmost priority is his/her family. But, there exist people like her, other security guards, policemen, soldiers, who make it possible for us to be with our own families, safe and sound.

These men and women are missing out on festivals, anniversaries and a lot of other special moments which civilians get to enjoy with their families. Sometimes, they may not even get to speak to their family members depending upon the geographical location or mission sensitivity.

While people like you and me are enjoying holidays and festivals, the family members of such people are forever gripped with the fear of losing their loved ones doing their duty, in case they get to know about the terrorist or violent disturbance or worse, a war breaking out. Can you even imagine going through that?

I have seen students of my college treating the guard at the gate of the college like utter crap. This man stands in scorching heat and is just doing the job of checking the id cards so that no one gets duped by outsiders (there was an incident where students were cheated by people who entered the college to ask money for fake charity). The least we can do is to acknowledge the man and just greet him with a ‘namaste’.

I know I seem to have been rambling. But, I just want you all to recognize the contribution that these men and women have been making to make all of your lives easier and safer. And in return to be kinder to them and by showing gratitude towards them. I will not tell you the story of India’s Independence struggles. I will not show you the glory of our freedom fighters. I would only wish you a very Happy Independence Day!

THE EDITING STARTUP


उलझन सुलझन


वाद-विवाद।

यह पहली नज़र में एक हिंसक शब्द सुनाई देता है, पर इसकी मूल संरचना ही इसलिए की गयी ताकि जिन मुद्दों पर सहमति न हो, उन्हें साथ बैठ कर मौखिक बहस से सुलझाया जा सके। मैं ख़ुद ऐसी कई बहसों का हिस्सा रहा हूँ। वाद विवाद प्रतियोगताओं को बहुत सम्मान की नज़रों से देखा जाता है। पुराने समय के विद्वानों से लेकर आज के प्रबुद्ध लोगों तक, सभी वाद विवाद का हिस्सा रहना पसंद करते हैं।

 वाद विवाद के कुछ नियम हैं। सबसे पहले तो सदन के पटल पर एक मुद्दा रखा जाता है। कुछ लोग उसके पक्ष में बोलते हैं, कुछ उसके विपक्ष में। हर व्यक्ति को किसी भी दूसरे व्यक्ति के विचारों का खंडन करने की पूरी स्वतंत्रता होती है। निष्पक्षता के लिए पक्ष में बोलने वाले पहले व्यक्ति को सबसे अंत में बोलने का मौका मिलता है, ताकि वो अंत में बाकि सभी प्रतिभागियों के विचारों का खंडन कर सकें।

ऐसा लग रहा है जैसे मैं धार्मिक प्रवचन दे रहा हूँ। पर यकीन मानिए, आगे लिखने से पहले केवल भूमिका बाँध रहा था। तो…..

जब मैंने सदन, पटल, पक्ष, विपक्ष जैसे शब्दों का प्रयोग किया, तो आप भी समझ गए होंगे कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ। बड़े सोच विचार के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि सभी देशों की संसद, वाद विवाद के मूल ढाँचे का ही अनुसरण करके बनायीं गयी थी। संविधान बनाने वालों ने सोचा होगा कि हमारे नेता आपस में बैठ समझ कर मुद्दों पर बहस करेंगे और उनका हल निकालेंगे। पर वो कहते हैं न, गधे को घोडा बनाकर दौड़ाओगे तो रेस जीतना तो दूर, लात अलग से खाओगे। पिछले 60 सालों से हमारा देश ऐसे ही गधों की लात खाता आ रहा है।

मैं खुद कई बार सोचता हूँ कि किसी दिन संसद में गया तो ख़ुशी के मारे रो पडूंगा। वाद विवाद करने का सबसे बड़ा मंच आपके सामने हो, और पूरी ज़िन्दगी आपने वाद विवाद के अलावा कुछ किया ही न हो (ये मेरे भौतिकी के अध्यापक ने कहा था), तो आंसू अपने आप निकल ही आएंगे।

पर….. नोटों की गड्डी लहराने से लेकर, एक दूसरे पर बेहूदी टिपण्णियां करना, हमारी संसद की विशेषता है। वाद विवाद के सभी नियमों को तोड़ते हुए हमारी संसद अपने मूल ढांचे से बहुत दूर जा चुकी है। न ही आप पक्ष और विपक्ष में अंतर कर पाएंगे, न ही बहस के असल मुद्दे को। अभी कुछ दिनों पहले विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का एक वीडियो सामने आया जिसमें वो कथित तौर पर सामने बैठे किसी नेता को गाली दे रहे हैं। हालाँकि, जो उन्होंने कहा वह साफ़ सुनाई नहीं दिया, पर जिस लहज़े से उन्होंने बोला, वह कतई सम्माननीय नहीं था।

एक बार हमारी एक प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल के सदस्य ने सभी को समझाया कि वाद विवाद जुमलों के दम पर नहीं, तर्क और तथ्यों के दम पर जीता जाता है। जहाँ तक मुझे समझ आया, हमारे सांसदों ने जुमलेबाज़ी में मास्टर्स की है, पर तथ्य सदैव नदारद ही रहे। 

खैर, आप कहेंगे कि नेताओं को वाद विवाद करना आता हो यह ज़रूरी नहीं। एकदम ठीक बात है। अब उनकी बात करते हैं जो ये दावा करते हैं कि उन्हें “डिबेट” करनी/करवानी आती है। प्राइमटाइम डिबेट के नाम पर टीवी पर बनी 8 खिड़कियों में बैठे भांति भांति के लोग एक दूसरे के ऊपर चिल्लाते हैं। कोई भी एक दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं होता। इतने पर भी, हर दिन रात को 9 बजे आठों वेल्ले लोग फिर से मुंह उठा कर आ जाते हैं। लेकिन ये उनका ‘टैलेंट’ नहीं है। ‘टैलेंट’ तो उनका यह है कि मुद्दा चाहे अर्थशास्त्र का हो, राष्ट्रीय सुरक्षा का हो, या शिक्षा नीतियों का हो, बहस में शामिल होने यही 8 लोग आते हैं। वाद विवाद के सभी नियमों की धज्जियां उड़ाते इन लोगों पर सिविल सोसाइटी को मानहानि का केस ठोक देना चाहिए। ‘डिबेट’ शब्द का जितना अपमान इन तथाकथित बुद्धिजीविओं ने किया है, एक मुकदमा तो बनता है इन पर! 

कई बार सोचता हूँ कि क्या सही और क्या गलत है, इसका फैसला करने वाला कौन है। हर दिन मेरे सामने कई बहसें होती हैं। कुछ में मैं खुद एक पक्ष होता हूँ और कुछ में दर्शक। लोग पूर्वाग्रह से इतना ग्रसित हैं कि सामने वाले की बात सुनने को तैयार ही नहीं है। ऐसे में ये फैसला करना बहुत कठिन है कि पक्ष सही है या विपक्ष।  

एक छोटी सी कहानी याद आ गई। एक बच्चा था। बहुत ही समझदार! उसके माँ बाप ने उसे हमेशा अच्छी बाते ही सिखाई। बच्चा हमेशा कोई भी काम करने से पहले माँ बाप द्वारा दी गई सीख को याद करता था। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। दरवाज़े पर घंटी बजी। बच्चा जैसे ही दरवाज़ा खोलने को उठा, उसकी माँ ने कहा कि कह देना कि हम घर पर नहीं हैं। बच्चा आँगन तक पहुंचा पर उसके कदम अपने आप रुक गए। उसे एक बार फिर माँ बाप द्वारा दी गयी सीख याद आ गयी। 

“झूठ बोलना पाप है।” 

बच्चा वापस अंदर जाने के लिए मुड़ा पर तभी उसे एक और सीख याद आ गयी। 

“माँ बाप की आज्ञा का सदैव पालन करना चाहिए।”

बच्चा अब धर्म संकट में था। एक सीख को मानेगा तो दूसरे सीख की अवज्ञा होगी। क्या सही है, क्या गलत, इसका फैसला करना उस बच्चे के बस में नहीं था। आगे बढे या नहीं, इसी उलझन में बच्चा वहीं आँगन में बैठ जाता है।

मुझे इस कहानी का अंत नहीं पता। बस सही गलत के फेर में फसना नहीं चाहता था। जब भी किसी उलझन में फंसता हूँ, तो इस कहानी का अंत सोचता हूँ। अपनी सहूलियत के अनुसार बच्चे से दरवाज़ा खुलवा देता हूँ, या उससे झूठ बुलवा देता हूँ। आप भी करिये कोशिश, अपनी उलझनों को सुलझाने की। एक बच्चे की कहानी से उलझनें सुलझाना, छद्म वाद विवाद में बहस करने से बेहतर है।  

THE EDITING STARTUP


खुशियों का साँचा


ज़ोर ज़ोर से गाडी का हॉर्न बजाते हुए, 2-3 गालियाँ देने के बाद, आशीष की गाड़ी थोड़ी सी आगे बढ़ी।

“यार, सारे देश की गाड़ियां इसी सड़क पर उतर आई है क्या?” आशीष खुद से ही बात कर रहा था। गाड़ी के अंदर A.C. की ठंडक थी। FM पर कोई तड़कता भड़कता आइटम नंबर चल रहा था। आशीष ने अपनी कमीज की बाजूओं को मोड़ कर ऊपर कर दिया था। एक हाथ गाड़ी के स्टेयरिंग पर था, दूसरे हाथ से गियर पर रखा था। शाम का समय था, सभी लोग दफ्तर से वापस घर की ओर बढ़ रहे थे। सड़क पर लम्बा जाम लगा था।

“तेरी माँ की…… इस बैलगाड़ी को आगे बढ़ा ले।” आशीष सामने वाली गाड़ी के ड्राइवर पर चिल्लाया और ज़ोर से हॉर्न दबाने लगा। फिर थक हार कर अपना सिर सीट पर टिका लिया और जाम खुलने का इंतज़ार करने लगा।

“क्या ज़िन्दगी है ये? सुबह से शाम तक नौकरी। दफ्तर में बॉस से झगड़ा। इससे अच्छा तो सरकारी नौकरी ही कर लेता। कम से कम एक लाल बत्ती होती, तो गाड़ियों की भीड़ में फसना न पड़ता।” आशीष ने सोचा। उसे दफ्तर की सभी बाते याद आ रही थी। आज का दिन ज़्यादा अच्छा नहीं गया था। एक के बाद एक मीटिंग और फिर अपने बॉस से झगड़ा। आशीष बस जल्दी से जल्दी घर पहुँच कर आराम करना चाहता था।

खिड़की पर किसी के दस्तक देने की आवाज़ हुई। आशीष ने गर्दन मोड़ कर देखा तो एक छोटा सा बच्चा था। कपडे फटे थे। बाल भी मिटटी से अटे थे। उसकी नाक बह रही थी, जिसे वो बार बार एक हाथ से पोंछ रहा था। आशीष ने इशारे से पूछा कि उसे क्या चाहिए। बच्चे ने इशारे से उसे कुछ पैसे देने को कहा। आशीष ने अपनी खिड़की के शीशे को नीचे किया और उसे 5 रुपये थमा दिए।

जैसे ही वो शीशे को ऊपर करने लगा, बच्चे ने कहा,”क्या साहब, 5 रुपये? इतनी बड़ी गाड़ी है। इतना पैसा है, फिर भी 5 रुपये?”
“अच्छा बे? तुझे बड़ा पता है मेरी अमीरी का?”, आशीष को उस बच्चे से बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी पर खाली बैठे कुछ तो करना था।
“बिलकुल साहब, आप बड़े आदमी लगते हो। इतने अच्छे कपडे पहने हैं। कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं बैठी गाडी में। इतने पैसों का क्या करोगे?” बच्चे ने कहा।

आशीष को हँसी आ गयी। उसने 10 का नोट निकाला और बच्चे के हाथ में रख दिया और शीशा ऊपर कर लिया।
आशीष को प्रिया की याद आ गयी। आमतौर पर प्रिया आशीष के साथ ही घर के लिए निकलती है, पर आज आशीष को कुछ ज़्यादा ही काम था। काम के चक्कर में उसने प्रिया से ठीक से बात भी नहीं की। आशीष जानता था कि प्रिया को बुरा लगा, पर वो काम में इतना ग़ुम था कि उस वक़्त वो किसी से भी बात करने की हालत में नहीं था। उसने मोबाइल निकाला और प्रिया को मैसेज भेजा,”कहाँ हो?”

गाड़ियां धीरे धीरे आगे बढ़ी तो आशीष ने भी अपनी गाड़ी को आगे बढ़ाया। थोड़ा आगे जाकर फिर से सभी गाड़ियां रुक गयी। आशीष ने मोबाइल देखा तो प्रिया ने जवाब भेजा था,”जहन्नुम में! तुमसे मतलब?”

आशीष को फिर से गुस्सा आ गया। उसने मैसेज का जवाब नहीं दिया। गाड़ियां धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। तभी बाहर बिजली चमकने लगी। बादल गरजने की आवाज़ आई और थोड़ी ही देर में बारिश शुरू हो गई। स्ट्रीट लाइट और धीरे धीरे आगे बढ़ती गाड़ियों की हेडलाइट की रौशनी में बारिश की बूंदे चमकने लगी। आशीष ने वाइपर चला दिए ताकि शीशे के बाहर साफ़ दिखाई पड़े। उसकी नज़र फुटपाथ पर चलते लोगों पर पड़ी।

एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ जल्दी जल्दी चल रहा था। दोनों एक छतरी के नीचे नहीं आ पा रहे थे इसलिए उसने छतरी अपनी पत्नी के सिर के ऊपर की हुई थी, और खुद भीग रहा था। वो बच्चा जिसे आशीष ने पैसे दिए थे, वह अपने यार दोस्तों के साथ सड़क पर भरे हुए पानी में पैर छपछपा रहा था। उसकी नाक अब भी बह रही थी पर उसके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती थी। कुछ लोग एक दुकान की शेड के नीचे खड़े थे।

ज़िन्दगी भी इस बारिश के पानी की तरह हो चली थी। पानी को जिस साँचे में डालो, वो उसी आकर में बदल जाता है। ज़िन्दगी को भी अगर ख़ुशी के साँचे में डालोगे तो हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ हैं। बड़ी बात ये थी कि इन साँचों की कोई कीमत नहीं होती। बल्कि, अमीरियत में ये साँचे ढूँढना बड़ा मुश्किल है। वो लोग जो गाड़ी के बाहर दिखाई दे रहे हैं, उन्होंने अपनी खुशियों का साँचा ढूंढ लिया है। अब बारी गाड़ी के अंदर बैठे आशीष की थी।

आशीष ने A.C. बंद किया और खिड़की का शीशा नीचे खिसका दिया। ठंडी हवा का झोंका, बारिश की कुछ बूँदों के साथ उसके चेहरे पर पड़ा। आशीष ने अपना चेहरा खिड़की से बाहर निकाला और बूँदों को अपने चेहरे पर गिरने दिया। बंद आँखों पर पड़ती बूँदों की ठंडक में आशीष को उसकी खुशियों का साँचा मिल गया था।

उसने अपना मोबाइल उठाया और प्रिया को मैसेज भेजा,”आलू कचौड़ी या ढोकला?” और मुस्कुराते हुए जवाब का इंतज़ार करने लगा।
तुरंत जवाब आ गया,”ढोकला! और कचौड़ी भी ले ही आना। गुस्से में भूख ज़्यादा लगती है मुझे।”

आशीष हल्के से हँसा। जाम खुल गया था। आशीष ने गियर बदला और गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी। चलते चलते उसने रेडियो की आवाज़ बढ़ा दी और उसके साथ साथ गाने लगा।

“ये रात भीगी भीगी, ये मस्त फ़िज़ाएं,
उठा धीरे धीरे, ये चाँद प्यारा प्यारा। “

EDITOR: GYAN AKARSH

सुकून

The Editing Startup

घुटने से फटी हुई जीन्स, सफ़ेद रंग की आधी बाजू की कमीज़ पहनकर, कानों में फ़ोन की लीड लगाए, गौरव एक छोटे से घर की और बढ़ रहा है। कमर पर एक बस्ता लटका हुआ है, जिसके आकार से पता चलता है कि उसके अंदर एक गिटार बंद है। पास पहुंचने पर उसकी नज़र घर के बाहर लगी तख़्ती पर पड़ती है।

“SUKOON – THE MUSIC SCHOOL”

वह दरवाज़े पर दस्तक देता है। अंदर से किसी बच्चे के गाने की आवाज़ सुनाई दे रही है। साथ में शायद हारमोनियम भी बज रहा है। गौरव एक बार फिर दरवाज़ा खटखटाता है। इस बार गाने की आवाज़ बंद हो जाती है। दरवाज़ा खुलता है। सामने “सुकून” के संचालक, रमेश शर्मा खड़े थे।

“नमस्ते। मैं गौरव, आपसे फ़ोन पर बात हुई थी।” गौरव ने अपना परिचय दिया।
“हाँ। आओ, अंदर आओ।” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
गौरव रमेश के पीछे पीछे अंदर चला गया। रमेश अपने ही घर में संगीत सीखाते हैं। पेशे से वो स्टेट बैंक के रिटायर्ड क्लर्क रह चुके हैं। फिर भी संगीत के क्षेत्र में उनकी ख्याति दूर दूर तक फैली है। घर ज़्यादा बड़ा नहीं था। बाहर का दरवाज़ा सीधे घर के आँगन में खुलता था। आँगन के दूसरी ओर दो कमरे हैं। रमेश ने गौरव को दाहिनी ओर के कमरे में बैठने के लिए कहा।

कमरे की दीवारों का रंग उतरा था। एक कोने में सरस्वती की तस्वीर रखी थी और उनके सामने जलती धूप की सुगंध कमरे में फैली थी। कमरे में पुराने संगीतज्ञों, वाद्यों की तस्वीर लगी थी। रमेश जी की भी कई तस्वीरें लगी थी। कुछ में वो मंच पर बैठ कर गा रहे थे, कुछ में सम्मानित होते दिखाई दे रहे थे। एक मेज़ पर बहुत सारी ट्रॉफियां रखी थी और नटराज की मूर्ति भी। “पानी…”, रमेश पीछे से आये और गौरव के हाथ में पानी का गिलास दे दिया।
“पार्थ, आज की क्लास ख़त्म। तुम घर जाके प्रैक्टिस करना।”

जो बच्चा हारमोनियम पर उँगलियाँ फिरा रहा था, वह खड़ा हुआ और उसने अपना बैग उठाया। रमेश जी के पैरों को हाथ लगाकर बाहर चला गया। गौरव को ग्लानि का एहसास हुआ और उसने भी रमेश जी के पैरों को हाथ लगाया। रमेश ने उसे हँसते हुए आशीर्वाद दिया।
“तुमने पहले कभी संगीत सीखा है?” रमेश ने पूछा।
“जी? थोड़ा बहुत।” गौरव ने जवाब दिया।
“अभी एक दम से मुझसे संगीत सीखने की तलब कैसे उठी?” रमेश ने फिर पूछा।
“गुरूजी, मुझे बस सीखना है। कैसे भी करके, मुझे 2 महीनों में सब कुछ सीखना है।” गौरव ने धीरज खोते हुए कहा।
वह रमेश के पैरों की तरफ देखने लगा। रमेश ने उसे बोलने का मौका दिया।
“2 महीने बाद यूथ फेस्टिवल है। मैं उसमें हिस्सा लेना चाहता हूँ। उसे जीतना चाहता हूँ। मैं जी-तोड़ मेहनत करूँगा। दिन रात प्रैक्टिस करूँगा। मुझे बस सीखना है।” गौरव की आवाज़ थोड़ी कांपने लगी।
“तुम्हें ये गिटार बजाना कैसे आया?” रमेश ने माहौल को हल्का बनाने के लिए पूछा।
“वो… मैंने YOUTUBE पर देख देख कर गिटार बजाना सीखा।” गौरव ने अपने आंसू पौंछते हुए जवाब दिया।
“सच में? भई वाह। फिर तो बहुत लगन है तुममें। फिर तो संगीत की थोड़ी बहुत समझ भी भी होगी। हम कोशिश करेंगे। बस कल से कपड़े ढंग के पहन कर आना।” रमेश ने हँसते हुए कहा।
गौरव मुस्कुराया। उठा, रमेश जी के पैर छुए और बाहर चला गया। रमेश उसे बाहर जाते हुए देख रहे थे। वो अब भी समझ नहीं पाये थे कि गौरव के दिमाग में क्या चल रहा है। लेकिन शायद उन्हें कुछ अंदाजा था।

अगले दिन से गौरव की संगीत शिक्षा शुरू होती है। रमेश हारमोनियम बजाकर गाते, और गौरव उनके साथ साथ गिटार बजाते हुए सुर मिलाने की कोशिश करता। रमेश जी बहुत ही सुलझे हुए इंसान हैं। उन्हें पता है, कि कब क्या करना है। पहले दिन उन्होंने गौरव को संगीत में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के बारे में बताया। ठाठ, राग, तान, ताल, सात स्वर, तीव्र और कोमल स्वर आदि इत्यादि।
फिर सात सुरों का अभ्यास। “सा रे गा मा पा धा नि सा।”

“पर ये तो आठ सुर हुए!” गौरव ने पूछा।
“आखिरी ‘सा’ अगले सात सुरों का पहला स्वर है।” रमेश ने समझाया। “हम पूरा एक OCTAVE गाते हैं। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खां ऐसे 6 OCTAVE तक गा पाते थे। आओ देखें, उस्ताद गौरव अली खां कितने OCTAVE गा पाते हैं।”
गौरव ने गाना शुरू किया, “सा रे गा मा पा धा नि सा.. सा रे गा मा प….. अह!”

गौरव खांसने लगा। उसका मुंह लाल हो गया था। काफी ज़ोर लगाने पर भी वह अगले पा से ऊपर नहीं जा पाया।
“बस, बस। कोशिश करो मगर इतनी नहीं कि गला ही दर्द करने लगे।” रमेश ने समझाया।
“चाय पियोगे?” उन्होंने पूछा और गौरव के हाँ करने से पहले ही चाय बनाने चले गए।

गौरव ने आँखे बंद की। उसे बहुत दर्द हो रहा था। फिर उसने एक लम्बी सांस खींची और गाना शुरू किया।
“सा रे गा मा पा धा नि सा.. सा रे गा मा पा धा नि सा।” और फिर वह रुक गया। इससे आगे वो नहीं गा सकता था।
“शाबाश मेरे बच्चे!” रमेश जी पीछे से चाय लेकर आये। “तुमने तो कमाल कर दिया। पहले ही दिन 2 OCTAVE सफलता के साथ गा दिए!”

गौरव ने रमेश के पैर छुए और चाय का कप पकड़ लिया। रमेश उसके सामने आकर बैठ गए।
“गौरव, मैं जानना चाहता हूँ कि तुम्हारी इस लगन के पीछे क्या वजह है।” रमेश ने पूछा।
“सर, मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊंगा। पर अभी मैं वो सब बताने की स्थिति में नहीं हूँ। वक्त आने पर मैं ज़रूर बता दूंगा।”
रमेश ने पलट कर दोबारा नहीं पूछा। वो गौरव पर दबाव नहीं बनाना चाहते थे।
“सर, एक बात पूछूं?” गौरव ने भोलेपन से कहा।
“हाँ, ज़रूर।” रमेश ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
“हमारे स्कूल का नाम सुकून क्यों हैं?” गौरव ने पूछा।
“हाहा… इसका जवाब तुम्हें खुद मिल जाएगा।” रमेश ने जवाब दिया।

डेढ़ महीना बीत जाने के बाद गौरव को कई रागों और तालों के बारे में पता चल गया था। पर अभी भी कुछ कमी थी।
“दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अखियाँ प्यासी रे…..” रमेश ने गाना शुरू किया। गौरव ने साथ साथ गाना शुरू किया।
“दर्शन दो घनश्यामनाथ मोरी अखियाँ…” रमेश ने उसे बीच में रोक दिया।
“ऐसे नहीं, गौरव। ‘घनश्याम’ और ‘नाथ’ दोनों अलग अलग शब्द हैं। इक्कठे जाओगे तो एक ताल छोड़ दोगे। और तुम बीच में हरकते क्यों नहीं लेते। बिलकुल सपाट मत गाओ। बंदिश से थोड़ी छेड़छाड़ करो। हरकतें लेकर तुम अपने गीत को और खूबसूरत बना सकते हो।” उन्होंने समझाया।

गौरव ने बहुत कोशिश की। उसने कुछ हरकतें रमेश जी से सीखी भी। पर वो उन्हें ठीक से नहीं गा पाया। यह पहली बार हुआ था, जब गौरव को कुछ सीखने में दिक्कत पेश आ रही थी। गौरव का चेहरा एकदम उतर सा गया। वह ज़रूरत से ज़्यादा कोशिश कर रहा था। कुछ भी सही न होते देख, रमेश ने गौरव को जाने के लिए कहा।
“आज के लिए बहुत हुआ। थोड़ा आराम करो। चाय पियोगे?” रमेश ने पूछा।
“नहीं। गुरूजी, ये हरकतें कैसे सीखी आपने।” गौरव ने पूछा।
“सीखी नहीं। कोई सिखा भी नहीं सकता। ये तो बस अपने आप से होती हैं। मन कहता है कि ये सुर लगाओ, तो लगा देते हैं। बस। सब काम दिल का है। है न गौरव?” रमेश ने गौरव की तरफ देखा।

गौरव उनसे नज़रे चुरा रहा था पर रमेश ने अपनी नज़रों को उसके चेहरे से नहीं हटाया।
“अच्छा। जाओ अब। शाम हो गई है। यूथ फेस्टिवल के फॉर्म आ गए हैं। तुम याद से भर देना।”
गौरव उठा। रमेश जी के पैर छुए और चला गया। रमेश जी ने किवाड़ बंद किये और अपने कमरे में चले गए।
यूथ फेस्टिवल से एक दिन पहले, गौरव रमेश जी के घर की और बढ़ रहा था। रमेश ने अब तक गौरव को नहीं बताया था कि उसे यूथ फेस्टिवल में क्या गाना है।
“तुम सिर्फ गाने का अभ्यास करो। वहां जाकर कोई भी शब्द चुनना और सुरों के धागों से बुन देना।”

गौरव ने दरवाज़ा खटखटाया। किसी ने जवाब नहीं दिया। एक बार फिर खटखटाया। फिर उसकी नज़र बाहर लगे ताले पर पड़ी। गौरव के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। रमेश उसे आखिरी वक़्त पर छोड़ कर कैसे जा सकते हैं? उसने अपना सिर पकड़ लिया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मदद के लिए वो इधर उधर देखने लगा।
वो तख्ती, जिसपर “सुकून” लिखा था, उसके साथ एक कागज़ का टुकड़ा चिपका हुआ था। गौरव ने आगे बढ़ कर उस कागज़ को निकाला और पास में बने चबूतरे पर बैठ कर पढ़ने लगा।

“प्यारे गौरव,
आज आखिरी क्लास है। तुम्हारे मन में कई सारे सवाल हैं। क्या गाना है? कैसे गाना है? शायद मुझे तुम्हें पहले ही बता देना चाहिए था। पर इन सब सवालों के जवाब मेरे पास नहीं है। कैसे गाना है, वो मैं तुम्हें पिछले 2 महीनों में सिखा चुका। क्या गाना है, ये तो तुम बहुत पहले ही सोच चुके हो। शायद उसी दिन, जिस दिन तुमने मुझसे सीखने का फैसला किया। शायद उसी दिन, जब वो तुम्हें छोड़ कर इस दुनिया से चली गयी।”

गौरव के चहरे का खून उतर चुका था। उसकी आँखें चौड़ी हो गयी थी। उसने आगे पढ़ना शुरू किया।

“मुझे कैसे पता चला? इसका जवाब तो मुझे भी नहीं पता। वो जो संगीत वाले कमरे में दाहिनी तरफ नीचे एक तस्वीर रखी है, वो मेरी बीवी की है। एक दिन जब में बैंक से काम करके वापस आया तो देखा कि घर का दरवाज़ा खुला हुआ है। अंदर गया तो घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। धीरे धीरे मैंने अपने कमरे की तरफ कदम बढाए। वो फ़र्श पर पड़ी हुई थी। डॉक्टर ने कहा कि उसे दिल का दौरा पड़ा। वो चली गयी थी। मैं अकेला अपने घर में पड़ा उसकी याद में खोया रहता। फिर एक दिन उसके संगीत वाद्यों पर नज़र पड़ी। उसका हारमोनियम, उसका तानपुरा, उसकी बंदिशों वाली किताब।

मैंने ऐसे ही हारमोनियम में एक हाथ से हवा भरी। जैसे ही दूसरे हाथ की ऊँगली हारमोनियम पर पड़ी, बिलकुल वैसी ही आवाज़ आई जैसे वो बजाती थी। जब मैं अपने कमरे में अपना काम कर रहा होता था, तब वो हारमोनियम पर इसी तरह का कुछ बजाती थी। उसको गाते बजाते सुन कर थोड़ा बहुत मैंने भी सीख लिया था। मेरा YOUTUBE वही थी।”
गौरव की आँखों में आंसू थे पर चेहरे पर मुस्कान थी। रमेश हर बात बिना कहे समझ चुके थे। उन्हें पहले ही दिन सब समझ आ गया था। वो सब मुश्किलें जो उसे सीखने में आई, वो सब मुश्किलों से रमेश जी भी गुज़र चुके थे। फ़र्क सिर्फ उतना था कि उन्हें ये सब समझाने के लिए कोई नहीं था।

“वो जो भी थी। बहुत ही अच्छी होगी। तभी तो तुम्हें पसंद आई। तुम एक बेहतरीन साथी रहे होगे। एक बेहतरीन विद्यार्थी तो तुम हो ही, साथ ही तुम एक बेहतरीन इंसान भी हो। कल प्रतियोगिता में हार जीत से फर्क नहीं पड़ता। भले ही उसका सपना उस प्रतियोगिता को जीतना था। पर क्या यही काफ़ी नहीं होगा कि कल जब तुम गाओ तो सिर्फ उसी के लिए गाओ? वही गीत जो तुम दोनों हमेशा गुनगुनाते होगे। वही गाना जो शायद उस समय रेडियो पर बज रहा होगा जब तुमने उसे पहली बार देखा।”

गौरव अब किसी दूसरी दुनिया में ही था। रमेश जी ने उसके दिल को पढ़ लिया था। उसने आँखे बंद कर ली। एक बार फिर वही चेहरा दिखा जो उसने तब देखा था जब पहली बार सरगम का अभ्यास कर रहा था।

“कल के परिणाम की चिंता मत करना। मुझे तुम पर गर्व है। उसे भी होगा। बस आखिर में इतना ही कहूंगा, संगीत के सभी सुर दिल से जुड़े हैं। दिल के चारों हिस्से, मिल कर ये फैसला लेते हैं कि कब कौन सा सुर लगाना है। दुनिया में हर कोई, कभी न कभी धोखा देता है, बस एक दिल ही है जो अपना है। इसलिए कल अपनी आँखें बंद करके, अपने दिल पर सब छोड़ देना। वो सब सम्भाल लेगा।

मैं कल नतीजों के वक्त तुम्हें वहीं मिलूंगा।
तुम्हारा,
रमेश शर्मा”

गौरव अपनी आँखे खोलता है। अपने सामने इतने लोगों की भीड़ देख कर उसे डर लग रहा है। उसने आँखे फिर से बंद कर ली। हाँ। अब ठीक है। अब उसे सिर्फ वो दिखाई दे रही है जिसके लिए उसे गाना है। उसके दिल का बोझ काम होता महसूस हुआ। उसने सब कुछ भूल कर गाना शुरू किया।

“तू जहाँ जहाँ रहेगा, मेरा साया साथ होगा। मेरा साया…”

गौरव ने हर सुर एक दम सटीक लगाया। वह बीच बीच में ताल छोड कर, हरक़त लेता और फिर दोबारा ताल पकड़ लेता। एक दम से अगलेOCTAVE में पहुँच जाता और फिर सुर पर वापस आ जाता। सामने बैठा हर शख्स उसके सुरों को सुनकर गदगद हो रहा था।

गौरव ने गाना ख़त्म किया। सभी ने उसका खड़े होकर अभिवादन किया। तालियों की गूँज तब तक सुनाई देती रही जब तक वह मंच से उतरकर वापस अपनी कुर्सी पर नहीं बैठ गया।
नतीजे का वक्त आ गया था। संचालक ने माइक हाथ में लिया और बोलना शुरू किया- “आज की शाम एक बेहतरीन और सुरमई शाम थी। सभी ने बेहतरीन प्रस्तुतियां दी। फिर भी एक लड़का है जिसने आज हम सबको अपने सुरों के बंधन में ऐसा बाँध लिया है कि अब तक मेरे कानों में उसी की आवाज़ गूँज रही है। यूथ फेस्टिवल की इस संगीत स्पर्धा के विजेता हैं – गौरव सक्सेना।”

तालियों की गूँज के बीच गौरव एक बार फिर खड़ा हुआ। उसकी नम आँखें रमेश को ढूंढ रही थी। पर वो कही नहीं दिखाई दे रहे थे। वह धीरे धीरे अपने क़दमों की तरफ देखते हुए मंच की ओर बढ़ा।

“गौरव को ट्रॉफी और चेक देकर सम्मानित करने के लिए मैं बुलाना चाहूंगा, हमारे आज की प्रतियोगिता के जज, प्रसिद्ध संगीतज्ञ श्री रमेश शर्मा को!”
गौरव ने आँखे उठाकर देखा, पहली पंक्ति में बैठे रमेश शर्मा मुस्कुराते हुए खड़े हुए। गौरव दौड़ कर उनके पास गया और उनके गले लग गया। दोनों की आँखों में आंसू थे।
“सर, मुझे मिल गया।” उसने आंसू पोंछते हुए धीरे से कहा।
“क्या? इनाम? वो तो मिलना ही था।” रमेश जी ने पूछा।
“नहीं, इनाम नहीं। जवाब। पता चल गया कि हमारे स्कूल का नाम सुकून क्यों है।” गौरव ने मुस्कुराते हुए कहा।